चल निकलो घूमने…

-अलका कौशिक-

सैर-सपाटे की दुनिया काफी फैलती जा रही है। खासकर दो तीन दशकों से तो और भी ज्यादा। घुमक्कड़ी के शौकीन तलाश रहे हैं नई-नई सैरगाहें और नवेले पयर्टन ठिकाने। मजेदार बात है कि मध्यम वर्ग इसमें खूब दिलचस्पी ले रहा है। गर्मियों की छुिट्टयों में अभी वक्त है। एयर फेयर और होटलों के दाम अभी तक बजट में ही है। बुक करा लीजिए और कर डािलए प्लान अपनी हॉलीडेज को। ढूंढ़िए ऐसी जगह जहां आप पहले कभी नहीं गये हों। कुछ ऐसी सैरगाहें तलाशने में पाठकों को हमारा भी सहयोग।

दार्जलिंग

साल में बस एक दफा वैकेशन पर निकलने की परंपरा जब तक कायम थी तो गर्मियों की छुट्टियां सैर-सपाटे के लिए सबसे मुफीद समझी जाती थीं। गुजरे वक्त में थोड़ा और पीछे जाएं तो सैर-सपाटे की मंजिल तब सिर्फ नानी या दादी का घर हुआ करती थी। फिर वक्त ने मिजाज बदला, हिंदुस्तान के मध्यम वर्ग की जेबें कुछ भरीं, एक पीढ़ी जवान हुई और देखते ही देखते यात्राओं का संसार फैलता गया। उसमें वीकेंड गेटअवेज, लॉन्ग वीकेंड, स्लो टूरिज्म, रूरल टूरिज्म, रोड ट्रिप, वॉलनटूरिज्म (वॉलन्टियरिंग और टूरिज्म का मेल) जैसी जाने कितनी ही नई संकल्पनाएं जुड़ने लगी यात्राओं की मंजिलें बढ़ने लगीं हैं। अब लोगों के लिए गर्मियों का मतलब सिर्फ चार धाम की यात्रा कर आना नहीं रह गया है, गर्मियों में घरों से निकलने के मायने सिर्फ वैष्णो देवी के दर्शन नहीं रह गए हैं। मध्यम वर्ग ने अपने पंख पसारे हैं, परवाज उंची हुई है, सफर के तौर-तरीके भी बदले हैं। लेकिन इन तमाम बदलावों के बावजूद सफर का रोमांस बरकरार रहा है। जो सफर कभी रेल के स्लीपर में कटता था या एलटीसी यात्रियों के लिए टू-थ्री टियर या प्रथम श्रेणी के सहारे होता था वो अब एक पायदान उठकर हवाई यात्राओं में तब्दील हो चुका है। सफर के साथ एडवेंचर का दामन भी जुड़ा है, यानी सफर अब सिर्फ सालाना रिवायत नहीं रहा है बल्कि एक्सपीरियेंशियल हो गया है। हर कोई अपनी यात्राओं को मैकेनिकल बनाने की बजाय उसमें कोई नया दिलचस्प पहलू शामिल करना चाहता है। और इस चलन को भुनाने के लिए देखते ही देखते बीते सालों में कितनी ही ट्रैवल कंपनियां, होटल एवं टूर एग्रीगेटर्स ट्रैवल बाजार में छा चुके हैं।

मेंगलूर

इसका एक बड़ा फायदा यह हुआ है कि आपको हर मौसम, हर अवसर, हर बहाने के लिए कस्टमाइज्ड ट्रैवल विकल्प सुझाने वाले पेशेवर बाजार में आ चुके हैं। ट्रैवल पैकेजों की रेल-पेल है, एयरलाइनों की आॅफर्स हैं, तरह-तरह के आकर्षण हैं, होटलों-रेसोर्टों में आयोजनों का शोर है और राज्यों के टूरिज्म बोर्डों द्वारा समय-समय पर घोषित उत्सव-आयोजन भी हैं। लेकिन अगर आपका बावरा मन कहे कि उसे किसी और की नहीं बस अपनी सुननी है, तो? किसी दूसरे की उंगली थामकर नहीं बल्कि अपनी मर्जी का सफर करना है, तो? गर्मियों में सफर की यादों को कुछ खास बनाना है, तो? तो घबराना कैसा, कुछ पल बस मन की सुनिए कि वो चाहता क्या है। समंदर का किनारा, पहाड़ी की ओट, घाटी में रेंगती नदी का तट या पहाड़ से फिसलते झरनों का सौंदर्य? यों ही बैठे रहना, सुबह से रात तक बीतते पलों को सरकते देखना या एक्शन-रोमांच से भरपूर किसी एक्सट्रीम स्पोर्ट का अनुभव हासिल करना। बस एक बार यह तय हो जाए तो आप आसानी से चुन सकते हैं इस बार आगामी गर्मियों में अपने सफर की मंजिल। गाजियाबाद की शीलू के घर पिछले दिनों बेंगलुरु के प्रशांत ने चार दिन बिताए। महज सात सौ रु हर दिन के खर्च पर। उन चार दिनों में प्रशांत के लिए शीलू के घर के दरवाजे ही नहीं किचन भी पूरी तरह खुली रही। यानी, दिन भर अपने काम में मसरूफियत के बाद जब प्रशांत घर लौटता तो किचन की प्रयोगशाला में हाथ आजमाता। यह होटल के मैकेनिकल स्टे से बहुत अलग था। प्रशांत का कहना है, मैंने पहली बार एयरबीएनबी को चुना है, और मैं काफी हद तक संतुष्ट हूं। उम्मीद करता हूं कि मेरी होस्ट को भी इस डील में फायदा ही दिखा होगा। जहां जाना हो वहां एयरबीएनबी पर लिस्टेड प्रॉपर्टी चुनें, नए तौर-तरीके से रहें और हॉलीडे की यादों में कुछ नया समेट लाएं। इसी तरह, होमस्टे तलाशना अब कुछ चुनौतीपूर्ण नहीं रहा है। आप निजी मालिकों से सीधे वेबसाइटों के जरिए या कुछ राज्यों में टूरिज्म बोर्डों के मार्फत होमस्टे से संपर्क कर सकते हैं। हिमाचल के स्पीति जैसे जनजातीय जिले में इकोस्फीयर सरीखे एनजीओ स्थानीय लोगों को अपने घरों के फालतू कमरों को होमस्टे में बदलकर अतिरिक्त आमदनी कमाने की प्रेरणा दे रहे हैं। होटलों के कर्मियों की मोहक मगर कृत्रिम मुस्कान की जगह स्थानीय लोगों की गर्मजोशी और अपनापन आपके सैर-सपाटे को एक अलग अहसास से सराबोर कर देगा।

हिमालय की राह

हिमालय प्रेमी हैं, कुछ अलग देखना-अनुभव लेना चाहते हैं तो इस बार हिमाचल चला जाए। उधर, उत्तराखंड में नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व भी आपकी राह तक रहा है। बस मुट्ठीभर सैलानी पहुंचते हैं इन कुदरती ठिकानों पर। यानी यात्रियों के शोर-शराबे, भीड़-भड़क्के से दूर कुछ खास ठिकानों की तलाश में हैं तो हिमालय के इन सुदरवर्ती ठिकानों की राह पकड़ें। उत्तराखंड के बुग्यालों, ग्लेशियरों, चोटियों की ट्रैकिंग करें। रास्ते में पड़ने वाले झरनों से ठिठोली करें, स्थानीय लोगों के रहन-सहन को नजदीक से देखें, कुछ ऐसे समुदायों से मिलें जिनके बारे में बाकी दुनिया बहुत कम जानती है। यकीन मानिए, अपने सफर में इस डिस्कवरी के तत्व को जोड़ लेंगे तो गर्मियों का आपका सफर बहुत ही खास और बेहद यादगार बन जाएगा।

स्लो टूरिज्म के लिए चले आएं सिक्किम

पूर्वोत्तर के राज्यों में कुदरती नजारे हैं और सिक्किम भी इसका अपवाद नहीं है। नए दौर का तकाजा है कि कुदरत के साथ भागमभाग में न उलझा जाए। धीमी रफ्तार से, धीरे-धीरे नजारों को जज्ब करने के लिए उत्तरी सिक्िकम को सैर सपाटे के लिए चुने। यही कोई सवा सौ किलोमीटर दूर लाचुंग-लाचेन हैं और वहां से और पचास-एक किलोमीटर दूर गुरुरडोंगमार झील। सिक्किम की पवित्र झीलों में से एक है यह जो कंचनजंगा की गोद में है। यों तो झीलों का अद्भुत संसार है पूरी हिमालयी श्रृंखलाओं में लेकिन गुरुडोंगमार सरीखी झीलें अपने सौंदर्य के अलावा पवित्रता की वजह से भी खास दर्जा रखती हैं। सिक्किम की उत्तरी सीमाओं से सटे लाचेन ने तमाम होमस्टे, गेस्ट हाउसों की भीड़ के बीच भी अपनी कस्बाई पहचान को बचाकर रखा है। और यहां तक पहुंचने की राह भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। लेकिन गैंगटोक से करीब आठ-दस घंटे का यह लंबा सफर एक पल को भी उबाऊ नहीं लगता। रास्ते भर पहाड़ियों की कतार, कभी फूलों की घाटियां, झरने और नदियों के मोड़ आपको अपने में उलझाते रहेंगे। हां, किसी लग्जरी टूरिज्म की तलाश में हों तो इधर का रुख भूल से भी न करें। वैसे भी गैंगटोक से बाहर निकलने के बाद शहरी सभ्यता से नाता टूटने लगता है, एकदम बुनियादी गेस्ट हाउसों में रुकने के लिए तैयार रहें। रास्ते में रुकते-रुकाते गरमागरम मोमोज, चाय की चुस्कियां और कहीं घाटियों में टहलते याक आपके पर्यटन को एक नया अंदाज देंगे। एक के बाद एक नई मंजिलों पर भागने-लपकने की बजाय यहां स्लो टूरिज्म का मंत्र ज्यादा काम आता है। हो सके तो दो-तीन दिन यहीं ठहर जाएं, गुरुडोंगमार झील के सौंदर्य और उसकी परम शांति को अपने जीवन में उतारें और कंचनजंगा की बर्फीली सतह से टकराकर लौटती हवाओं को जज्ब करें।

सिलीगुड़ी

उत्तरी सिक्किम का यह क्षेत्र राज्य के चारों जिलों में सबसे बड़ा है लेकिन सबसे कम आबादी वाला है। प्राकृतिक नजारों, संस्कृति और आध्यात्मिकता का खास समीकरण भी यहां दिखता है। और फोंदोंग तथा फेन्सांग मठों के रूप में सिक्किम की एक पुरानी-विशिष्ट विरासत को सहेजने वाला इलाका भी यही है। इसकी प्राकृतिक समृद्धि का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि आप यहां 3894 फुट से लेकर 17, 100 फुट तक की भौगोलिक विविधता से गुजरते हैं।

कैसे पहुंचे – सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में न्यू जलपाईगुड़ी है जहां से राजधानी गंगटोक की 120 किलोमीटर की दूरी प्राइवेट टैक्सी से करीब 4 घंटे में या राज्य परिवहन की बसों से नापी जा सकती है। नजदीक हवाईअड्डा सिलीगुड़ी से 12 किलोमीटर दूर बागडोगरा है।

उत्तर भारत में कहां जाएं…

गंगटोक

गर्मियों में मैदानों से निकलने की छटपटाहट और एकदम लीक से हटकर अनुभव हासिल करने की चाह जिन्हें हो वे हिमाचल में बरोट, तीर्थन वैली, लाहौल में त्रिलोकीनाथ, केलॉन्ग के नजदीक बसे गांवों को चुन सकते हैं। इसी तरह, कश्मीर में गुलमर्ग-पहलगाम-श्रीनगर के रटे-रटाए रास्तों को छोड़कर अरु, गुरेज, लोलाब घाटी निकल पड़ें। कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में जंस्कार को अपनी मंजिल चुनें और हासिल करें ऐसा अनुभव जिसकी गूंज आपको सालों तक अपने यार-दोस्तों की महफिलों में सुनायी नहीं पड़ेगी। जंस्कार के फुटकल मठ तक ट्रैकिंग आपको सालों-साल याद रहेगी। और इसी मठ में रखे रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराते वक्त यह देखना न भूलें कि पिछली बार आखिरी यात्री यहां कब आया था। हमारा वायदा है कि उस अंतिम यात्री के इतनी सुदूर, पहाड़ी गुफानुमा मोनेस्ट्री में पहुंचने की तारीख पढ़कर आप अपनी पीठ थपथपाए बगैर नहीं रहेंगे! यकीनन, ये वो जगहें हैं जो अभी आने वाले लंबे समय तक न तो घिसी-पिटी कहलाएंगी और न ही यहां यात्रियों के काफिले दिखेंगे। दूर-दराज और दुर्गम सफर के मतवालों के लिए ही शायद ऐसी मंजिलें बनती हैं। दिल्ली से नजदीक के चलते उत्तराखंड के कुछ इलाके हालांकि टूरिस्टों की मार से लगभग कराहने लगे हैं, लेकिन राजधानी से लगभग 400 किलोमीटर से अधिक दूरी पर इसी राज्य में खड़ी मंजिलों ने अपनी अलहदा हस्ती को अभी भी संभाल रखा है। पिथौरागढ़ का नाम इनमें सबसे ऊपर है।

वागामाॅन

मुनस्यिारी का नाम बेशक, अब सफरबाजों की जुबान पर तिरने लगा है लेकिन सीमांत जिले पिथौरागढ़ में और बहुत से ठिकाने हैं जहां आप अपने हिसाब से घुमक्कड़ी कर सकते हैं। मन हो तो बागेश्वर जिले में पिंडारी, मिलम ग्लेशियरों की ट्रैकिंग पर निकल जाइये। गढ़वाल मंडल विकास निगम लिमिटेड की वेबसाइट पर ऐसे कई एडवेंचर से भरपूर विकल्प आप ही का इंतजार कर रहे हैं। ट्रैकिंग या एडवेंचर की बजाय सुकूनभरे दिन बिताने हों तो भी उत्तराखंड में कई ठौर-ठिकाने हैं जिनके नाम टूरिस्टों की जुबान पर अभी ज्यादा नहीं चढ़े हैं। नैनीताल के नजदीक किलबरी, पंगोट या सिगड़ी चले आइये। अब यह मत पूछिए कि वहां क्या खास है! कुदरती नजारों के अलावा इन जगहों पर अगर कुछ मिलता-दिखता है तो वो है सुबह-शाम पंछियों का शोरगुल, शांति इतनी कि आप अपने दिल की धड़कनों को सुन लें और इतना साफ आसमान कि रातों में गर्दन उचकाकर अपनी गैलेक्सी के तारों की गिनती करते-करते नींद अपने आगोश में ले ले। ऐसा ही एक और ठौर है मुक्तेश्वर के नजदीक धंचूली। मुक्तेश्वर भी यों तो पक्षी प्रेमियों का गढ़ है लेकिन इधर कुछ सालों में यह मंजिल राजधानी के वीकेंड गेटअवेज में शुमार हो चुकी है।

गोवा केरल का सौंदर्य

गोवा, केरल में बारिश में हरियाली का अपना अलग ही सौंदर्य है, प्रकृति जैसे थिरकने लगती है। केरल में कोवलम तट पर मानसून का नजारा खास अंदाज लिए होता है। पूरे राज्य में जिधर भी निकल जाओ, नारियल के वृक्ष झूमते दिखते हैं, वनस्पति इतनी हरी-भरी हो जाती है कि पूरा केरल राज्य मानो हरे रंग की चादर में ढका होता है। इसी तरह, कर्नाटक में कुर्ग या फिर केरल में मुन्नार की सैर पर निकल जाएंगे तो आपको मानसून हॉलीडे के नए समीकरण पता चलेंगे। बेशक, इन दिनों यहां पैदल चलने पर जरा सावधान रहना पड़ता है। मगर उड़ते बादलों के घेरे जब आपको चारों ओर से घेर लेंगे तो लगेगा मानो प्रकृति भी आपके साथ लुका-छिपी का खेल खेलने को आतुर है। मुन्नार के बाद आप केरल के ही इडुक्की जिले में पेरियार वन्यजीव अभयारण्य जाएं और यहां बारिश के बाद हल्के, खुशनुमा हो चुके मौसम में वाइल्डलाइफ टूरिज्म का आनंद लें। यहां भी आपको बरसाती कीड़ों, जीव जंतुओं से सावधान रहना पड़ता है। लेकिन जब प्रकृति प्रेमियों के सामने वनस्पति और वन्यजीवन की भरमार हो तो इसकी परवाह किसे रहती है। यही तो मजा है बारिश में उन जगहों में जाने का जहां बादलों की मेहरबानी कुछ खास होती है। और आपको तब इन पर्यटन ठिकानों का वो सौंदर्य दिखायी देगा जो आमतौर पर टूरिस्टों के सामने नहीं आ पाता। पीक सीजन में जाने वाले पर्यटकों को इस बात का अहसास भी नहीं होता कि पार्टी, आतिशबाजी, मौज मस्ती और हुड़दंग से अलग एक शांत, धीर गंभीर पहलू भी है गोवा का। और इसी रूप के दर्शन करने हों तो जून से सितंबर तक वहां जाएं।

लीक से हटकर सफर

मानूसनी बादलों का पीछा करने के लिए तो देश के पूर्वोत्तर के राज्य भी फिलहाल अनछुए ही कहलाए। मेघालय को चुनें, अरुणाचल की ऊंचाइयों पर बादलों को छुएं, मिजोरम जैसे उस राज्य को चुनें जो काफी हद तक अनदेखा है, नगालैंड की जोकू वैली की सैर पर जाएं या सांस्कृतिक पर्यटन के लिए असम में वैष्णव मठों के लिए मशहूर माजुली द्वीपों को देखें। बस इतना याद रखें कि पूर्वोत्तर के ये नजारे मानूसन के सक्रिय होने से पहले तक ही देख डालने चाहिए। बारिश के महीनों में इन इलाकों में बाढ़, सड़क संपर्क टूटने की वजह से आमतौर पर मुसीबतें बढ़ जाती हैं।

दक्षिण भारत में भी हैं कुछ ठंडे ठिकाने

मध्य भारत से परे का इलाका गर्मियों में उबलने लगता है, दक्षिण में सर्दी नाम की चीज नहीं होती, यहां के प्रदेशों में गर्मियों में सफर पर निकलना निरी बेवकूफी होगा ३ ऐसी बातें सुनते-सुनाते हम बड़े हो गए और सर्दियों के सिवा कभी भी दक्षिण का रुख नहीं किया। दक्षिण में भी हिल स्टेशन हैं, वहां भी ठंडे इलाके हैं, सुहाने मौसम की दस्तक वहां भी कई इलाकों में होती है और जब मई-जून-जुलाई के महीनों में उत्तर भारत की गर्मी बेहाल करने लगती है तो ये हिल स्टेशन सैलानियों के लिए सुखद ठिकानों में बदलने लगते हैं। जून में केरल में दक्षिण-पश्चिम मानसून के सक्रिय होने के साथ ही बादलों की धींगामस्ती शुरू हो जाती है, महीन फुहारों से भीगी जमीन सुखद अहसास दिलाने लगती है। उधर, वायनाड, गवी टाइगर रिजर्व, अगस्त्यकुद्दम, एलापारा, वागामॉन जैसे इलाके भी खास हैं। केरल अपने समुद्रतटों और बैकवॉटर्स को लेकर विख्यात है मगर इन पहाड़ी स्थलों से आमतौर पर आम टूरिस्ट अनजान रहता है। क्यों न इन गर्मियों में साउथ टूर पर निकला जाए तो अपने ही देश के उन भागों को करीब से जाना जाए जो गर्मी के मौसम में भी सैलानियों को सुखद अहसास देने के लिए तैयार रहते हैं।

कुल्लू-मनाली से आगे भी है जहां!

हिंदुस्तान में पर्यटन ज्यादातर एल.टी.सी. और दुकानदार-बिजनेसमैन आधारित रहा है, ऐसे में आसान मंजिलों को तो टूरिस्ट मानचित्र में जगह मिलती रही हैं लेकिन राज्य के दूरदराज के ट्राइबल इलाकों में टूरिस्ट आमतौर पर नहीं जाते। लाहौल-स्पीति या चंबा जिले में भरमौर तथा पांगी जैसे नाम बहुत कम सुनाई देते हैं। लेकिन ये इलाके सांस्कृतिक रूप से बेहद समृद्ध हैं। बर्फबारी की वजह से साल में ज्यादातर समय देश के दूसरे भागों से कटे होने की वजह से ये क्षेत्र सैलानियों की पहुंच से बाहर रहे हैं। इसी तरह कांगड़ा में दूरदराज के छोटा भंगाल और बड़ा भंगाल जैसे इलाके हैं जहां जाना तो दूर इनके नाम तक सैलानियों की जुबान पर नहीं पहुंचे हैं। संस्कृति, भाषा-बोली, टोपोग्राफी, परंपरा के लिहाज से एकदम अलग ऐसा ही एक और ठिकाना शिमला जिले की सब-डिवीजन डोडरा-क्वार है। बेशक यहां तक पहुंचना साल के ज्यादातर महीनों में मुश्किल होता है, लेकिन गर्मी में बर्फ पिघलने के बाद मई से जुलाई तक के महीनों में यहां के प्राकृतिक दृश्यों को देखना आपको अलग अनुभव देगा। डोडरा-क्वार तक पहुंचाने वाली सड़क खस्ताहाल सही मगर वहां पहुंचकर आपको जो हासिल होगा वो सचमुच कुछ अलग, कुछ खास होगा। उधर, राज्य के कुल्लू जिले में मनाली से आगे मलाणा गांव दुनिया के सबसे पुराने जनतंत्र के रूप में आज भी अपनी हस्ती बनाए हुए है। यहां आज भी देवता के नाम पर शासन चलता है। कहते हैं यूनानी सिकंदर की फौज के लोग वहां बस गए थे, उन्हीं के वंशज आज भी यहां रहते हैं। मलाणा की स्थानीय बोली में यूनानी शब्दों की घालमेल इस ऐतिहासिक संपर्क के राज खोलती है। जल्द ही मलाणा तक पहुंचने वाला मार्ग भी सैलानियों के लिए खुल जाएगा और तब आप हिमाचल के कुछ अनदेखे या कम देखे-जाने इलाकों की सैर पर निकल सकते हैं।

इकोटूरिज्म-चाय-कॉफी ट्रेल के बहाने

केरल में मुन्नार से जी भर जाए तो कर्नाटक में कुर्ग की राह पकड़ें। दक्षिण पश्चिम कर्नाटक के पश्चिमी घाटों में बसे कुर्ग में जून से सितंबर भारी मानसूनी महीनों के होते हैं जब पेड़-पत्तियों की महक आपको अपने मोहपाश में लेती है। कॉफी बागानों के लिए मशहूर कुर्ग और चिकमगलूर जैसे ठिकानों को अपनी मंजिल चुनें। यहां पुराने दौर के बंगलों को हेरिटेज प्रॉपर्टी में बदलकर टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। चिकमगलूर में मीलों तक फैले कॉफी के हरे-भरे बागानों, बीते वक्त के किस्सों का खामोशी से बयान करते ऐतिहासिक खंडहरों और समृद्ध दौर की परंपराओं को समेटे मंदिरों से मिलने इस बार कॉफी कंट्री चले आइये। कहते हैं भारत में सबसे पहले कॉफी की खेती कर्नाटक के चिकमगलूर जिले में ही शुरू हुई थी। चिकमगलूर की पहाड़ियां पश्चिमी घाट का ही हिस्सा है और तुंग तथा भद्रा नदियों का सफर भी यहीं शुरू होता है। यहां आपको लग्जरी होटलों से लेकर स्टार और बजट होटल आसानी से मिल जाएंगे। यों तो यहां आने का सबसे अच्छा मौसम सितंबर से अप्रैल तक है लेकिन बारिश के मस्त नजारों, झरनों और मानसूनी फुहारों में भीगने का मन हो तो मई-अगस्त तक के महीने चुनें। कैसे पहुंचे-हवाई मार्ग से मंगलोर, बेंगलुरु और हुबली नजदीकी एयरपोर्ट हैं, मंगलोर 160 किलोमीटर की दूरी पर सबसे नजदीकी हवाईअड्डा है। रेल मार्ग से आने के लिए मंगलोर, बेंगलुरु, हासन रेलवे स्टेशनों तक पहुंचा जा सकता है, और आगे के सफर के लिए टैक्सी लेने में ही समझदारी है।

मेडिकल टूरिज्म के लिए चुनें मानूसनी महीने

केरल में भी मानसून में जाने का खास महत्व है। अगर आप मेडिकल टूरिज्म का लाभ उठाने के इरादे से वहां जाना चाहते हैं तो मानसून से बेहतर कोई मौसम नहीं हो सकता। दरअसल, इन दिनों धूल-धक्कड़ नहीं होती और गीली मिट्टी तथा हरियाली की चादर आयुर्वेदिक उपचारों को अधिक प्रभावी बनाती है।

करें कुछ ऐसा हो नये जैसा

होटल/रेसोर्ट में छुट्टियां बिताने का चलन हुआ पुराना, अब दौर है नए चलन का और इस लिहाज से होमस्टे या एयरबीएनबी जैसे विकल्पों को लोग अपना रहे हैं। ग्लोबल बिजनेस ट्रैवल एसोसिएशन के अनुमान के मुताबिक दुनियाभर में 2016 में होटल किरायों में करीब 2.5 फीसद की बढ़त होगी। ऐसे में लोग वैकेशन रेंटल जैसे विकल्पों को भी काफी टटोल रहे हैं। क्लब महिंद्रा, स्टर्लिंग, कंट्री क्लब को चुनने वाले भी बढ़ रहे हैं।

लेह नहीं तुरतुक चुनें

लद्दाख की राह पकड़ने का मन हो तो झटपट टिकटें कटवा लें, क्योंकि इधर गर्मियों की हवा चली और उधर लेह का यात्रा खर्च बढ़ने लगता है। बीते कुछ सालों से पूरा भारत गर्मियों के महीनों मेें लेह-मग्न जो होने लगा है। और ऐसे में अगर आपको लगता है कि लद्दाख के अपने सफर को कैसे खास बनाएं तो हम आपको उसके नुस्खे बता रहे हैं। जब सैलानियों के जत्थे पैन्गोन्ग-त्सो का रुख करें तो आप त्सोमोरीरी लेक को चुनें। इसी तरह, पीओके से सटे तुरतुक के लिए निकल जाएं, उन गांवों तक का सफर कर डालें जो कभी पाकिस्तान का हिस्सा थे और फिर इकहत्तर के भारत-पाक युद्ध के बाद हिंदुस्तानी मिट्टी में शामिल हो गए। तुरतुक की खुबानियों की मिठास पूरी दुनिया में मशहूर है, अपनी जीभ पर उसी का स्वाद फिरा लाने इस बार निकल जाएं। मरखा वैली ट्रैक, स्तोक कांगड़ी ट्रैक जैसे कई एडवेंचर से भरपूर अनुभव आपको इसी जमीन पर मिलेंगे।

मानसूनी बादलों का पीछा करने का मन हो तो!

पीति अब वैसा अनछुआ नहीं रहा गया है जैसा कि आपकी कल्पना में कुछेक साल पहले तक था। तो फिर नई मंजिलों की तलाश जारी रखते हुए कुछ पुराने ठिकानों को अलग मौसम में देखने के बारे में क्या ख्याल है? जैसे गोवा! बारिश में गोवा डिवाइन हो जाता है।

धार्मिक पर्यटन का नया ठौर-आदि कैलाश

गर्मियों और मानसून के महीनों में उत्तराखंड में चार धाम यात्रा की परंपरा रही है। लेकिन इसी राज्य में आप तिब्बत की सीमा से सटे पिथौरागढ़ में आदि कैलाश ट्रैक पर निकल सकते हैं जो धार्मिक पर्यटन तो है मगर एडवेंचर और नेचर वॉक की बेहतरीन खुराक भी देता है। कुमाऊ मंडल विकास निगम लिमिटेड हर साल जून से सितंबर के दौरान इस यात्रा का आयोजन करता है। गाला, गर्भ्यांग, बुधि, गुंजी, रॉन्गॉन्ग, कुटी के गांवों से गुजरते हुए आपके शहरी त्रस्त मन सुकून के अलावा कुदरत से नजदीकी का अनुभव करते हैं। साथ ही, आप हिमालयी समाज की परंपराओं और संस्कृति को बेहद करीब से देखते हैं। बर्फ से ढकी अन्नपूर्णा चोटी, रौद्र गान करती काली नदी, चैदस, ब्यांस और दर्मा घाटियों का सौंदर्य, हिमालयी जड़ी-बूटियों और जंगली फूलों से पटे बुग्याल आपको मंत्रमुग्ध कर देने के लिए काफी हैं। महत्वपूर्ण: आदि कैलाश ट्रैक के लिए इनर लाइन परमिट जरूरी है जिसे एसडीएम दफ्तर में आवेदन कर आसानी से हासिल किया जा सकता है।

राहें हैं आसान

गुवाहाटी पूर्वोत्तर का गेटवे है और देश के दूसरे भागों से रेल-हवाई संपर्क से जुड़ा है। लेकिन इसके अलावा भी कुछ ठिकाने हैं जहां तक आप सीधे पहुंचते हैं। मसलन, नगालैंड जाने के लिए दीमापुर में रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डा दोनों हैं। इसी तरह इंफाल हवाईअड्डे तक देश के चार शहरों कोलकाता, आइजोल, अगरतला और गोवाहाटी से सीधी, नॉन-स्टॉप उड़ानें संचालित होती हैं जबकि दिल्ली जैसे महानगर से भी इंफाल के लिए वन-स्टॉप विकल्प मौजूद होने से नॉर्थ ईस्ट का सफर उतना पेचीदा नहीं रह जाता जितना इस जानकारी के अभाव में लगता है। उधर, सिलीगुड़ी/ जलपाइगुड़ी तक मुख्य प्रवेशद्वार है ही जहां से सिक्किम से लेकर दार्जिलिंग, मिरिक, कलिम्पोंग की राह खुलती है।

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