02 अप्रैल 2019 विश्व आटिज्‍म दिवस पर विशेष :

जंग जीतने की जद्दोजहद

रौनक और शोर शराबे के शौकीन लोग अकसर सड़क के आसपास अपना घर बनाने का सपना देखते हैं, लेकिन ऐसे लोगों को थोड़ा चौकन्ना होने की जरूरत है क्योंकि ऐसी जगहों पर रहने वालों के बच्चों में ऑटिज्म होने का खतरा दो गुना तक बढ़ सकता है। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है। ऑटिज्म अर्थात स्वलीनता एक ऐसी बीमारी है, जिसके शिकार बच्चे अपने आप में खोए रहते हैं, उन्हें दीन दुनिया की कोई खबर नहीं रहती। वह सामाजिक रूप से अलग थलग रहते हैं, किसी से घुलते मिलते नहीं और बात करने से भी हिचकते हैं। ऐसे बच्चों को पढ़ने लिखने में समस्या होती है और उनके दिमाग और हाथ पैर के बीच तालमेल नहीं बन पाता, जिससे उनका शरीर किसी घटना पर प्रतिक्रिया नहीं दे पाता।

इस बीमारी के कारणों का पता लगाने के लिए दुनियाभर में तरह तरह के शोध और अध्ययन किए जा रहे हैं। एक नए अध्‍ययन में यह बात सामने आई है कि व्यस्त सड़कों के आसपास जन्म लेने वाले बच्‍चों में ऑटिज्‍म का खतरा शांत और प्रदूषण रहित इलाकों में जन्म लेने वाले बच्चों की तुलना में दोगुना तक बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर कई गाड़ियां आती-जाती हैं। गर्भवती महिलाएं इनसे निकलने वाले धुएं के संपर्क में आती हैं जो गर्भ में पल रहे शिशु के मस्‍तिष्‍क पर काफी बुरा असर डालता है। इसके चलते उनके पैदाइश के पहले वर्ष के दौरान ऑटिज्‍म होने की आशंका बढ़ जाती।

ऑटिज्म से ग्रस्त बच्चे छूने पर असामान्य बर्ताव करते हैं। जब उन्हें उठाया जाता है तो वे लिपटने के जगह लचीले पड़ जाते हैं या तन जाते हैं। जीवन के पहले साल में वे सामान्य ढंग से विकसित नही हो पाते जैसे मां की आवाज पर मुस्कुराना ,दूसरो का ध्यान खिंचने के लिए किसी वस्तु की तरफ इशारा करना, एक शब्द से बातचीत करना। बच्चा आंख से आंख नही मिला पाता है, माता-पिता को अजनबियों से अलग नहीं पहचान पाता है और दूसरों में काफी कम रूचि लेता है। इस तरह का व्यवहार काफी असमान्यताओं की ओर इशारा करता है।

क्या है ऑटिज्म

ऑटिज्म एक तरह का न्यूरोलॉजिकल डिस्ऑर्डर है, जो बातचीत (लिखित और मौखिक) और दूसरे लोगों से व्यवहार करने की क्षमता को सीमित कर देता है। इसे ऑटिस्टिक स्पैक्ट्रम डिस्ऑर्डर कहा जाता है, क्योंकि प्रत्येक बच्चे में इसके लक्षण अलग-अलग देखने को मिलते हैं। ऐसे कुछ बच्चे बहुत जीनियस होते हैं या उनका आईक्यू सामान्य बच्चों की तरह होता है, पर उन्हें बोलने और सामाजिक व्यवहार में परेशानी होती है। कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें सीखने-समझने में परेशानी होती है और वे एक ही तरह का व्यवहार बार-बार करते हैं। चूंकि ऑटिस्टिक बच्चों में समानुभूति का अभाव होता है, इसलिए वे दूसरों तक अपनी भावनाएं नहीं पहुंचा पाते या उनके हाव-भाव व संकेतों को समझ नहीं पाते। कुछ बच्चे एक ही तरह का व्यवहार बार-बार करने के कारण थोड़े से बदलाव से ही हाइपर हो जाते हैं।

कारण

ऑटिज्म के वास्तविक कारण के बारे में फिलहाल जानकारी नहीं है। पर्यावरण या जेनेटिक प्रभाव, कोई भी इसका कारण हो सकता है। वैज्ञानिक इस संबंध में जन्म से पहले पर्यावरण में मौजूद रसायनों और किसी संक्रमण के प्रभाव में आने के प्रभावों का भी अध्ययन कर रहे हैं। शोधों के अनुसार बच्चे के सेंट्रल नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचाने वाली कोई भी चीज ऑटिज्म का कारण बन सकती है। कुछ शोध प्रेग्नेंसी के दौरान मां में थायरॉएड हॉरमोन की कमी को भी कारण मानते हैं। इसके अतिरिक्त समय से पहले डिलीवरी होना। डिलीवरी के दौरान बच्चे को पूरी तरह से आक्सीजन न मिल पाना। गर्भावस्था में किसी बीमारी व पोषक तत्वों की कमी प्रमुख कारण है। बच्चे के जन्म के छह माह से एक वर्ष के भीतर ही इस बीमारी का पता लग जाता है कि बच्चा सामान्य व्यवहार कर रहा है या नहीं। शुरुआती दौर में अभिभावकों को बच्चे के कुछ लक्षणों पर गौर करना चाहिए। जैसे बच्चा छह महीने का हो जाने पर भी किलकारी भर रहा है या नहीं। एक वर्ष के बीच मुस्कुरा रहा है या नहीं या किसी बात पर विपरीत प्रतिक्रिया दे रहा है या नहीं। ऐसा कोई भी लक्षण नजर आने पर अभिभावक को तुरंत किसी अच्छे मनोचिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

लक्षण

जिन लोगों में ऑटिज्म के लक्षण होते हैं वे अपने आसपास के लोगों और पर्यावरण से उदासीन से हो जाते हैं।

अक्सर खुद को चोटिल या किसी ना किसी तरह नुकसान पहुंचाते हैं।

बार-बार सिर हिलाना

एक ही तरह का व्यवहार या आवाज बार-बार करना

थोड़ा सा भी बदलाव होने पर बेचैन हो जाना

देर तक एक ही तरफ देखते रहना

बार-बार हिलना और एक ही तरह का बॉडी पॉस्चर रखना।

कब्ज, पाचन संबंधी समस्या और अनिद्रा जैसे लक्षण भी दिखते हैं।

अक्सर माता-पिता के लिए यह सबसे बड़ी मुश्किल होती है कि वे अपने ऑटिज्म ग्रस्त बच्चे को कैसे संभाले या उसके साथ कैसे व्यवहार करें। ऐसे में सबसे पहले तो माता-पिता को बच्चे का साथ छोड़ने की जगह उनके साथ प्यार व दुलार के साथ पेश आना चाहिए। बच्चे को संभालने के लिए उसके व्यवहार को परखें और समझें कि वो क्या कहना चाहता है। ऐसे लोग अपनी हर इच्छा को तीखे या दबे हुए व्यवहार से ही बताना चाहते हैं। ऑटिज्म के मरीज अंतर्मुखी होते हैं, यह समाज से नहीं जु़ड़ पाते। यदि जुड़ते भी हैं, तो उनका व्यवहार काफी अलग होता है। ऐसे लोग किसी भी बात को सुनने के बाद लगातार बोलते रहते हैं। इनके दैनिक दिनचर्या में अगर कोई बदलाव आ जाए, तो ये मानसिक रूप से काफी परेशान हो जाते हैं। ऑटिज्म से पीड़ित मरीजों को समुचित देखरेख की जरूरत होती है।

ऑटिज्म आजीवन रहने वाली बीमारी है, जिसे दवाइयों से ठीक कर पाना थोड़ा मुश्किल है।

तीन प्राथमिक ऑटिज़्म प्रकार हैं:

आस्पेर्गर सिंड्रोम

पीडीडी एनओएस (व्यापक विकास-विकार, अन्यथा निर्दिष्ट नहीं)

ऑटिस्टिक डिसऑर्डर

दो और दुर्लभ लेकिन अभी भी महत्वपूर्ण एएसडी जैसी स्थितियों को शामिल किया गया है – बचपन-विघटनकारी विकार और रिट सिंड्रोम।

आस्पेर्गर सिंड्रोम : अस्पेर्गेर सिंड्रोम सबसे हल्का ऑटिज़्म प्रकार है। लड़कों की तुलना में तीन बार लड़कियां प्रभावित होते हैं। जैसे ही बच्चों को एक विषय या वस्तु पर जुनून मिलता है। वे अपनी पसंद के विषय के बारे में सबकुछ सीखते हैं और इस पर चर्चा करना बंद नहीं करते हैं। हालांकि वे अपने सामाजिक कौशल में अक्षम थे और वे आमतौर पर असंगठित और अजीब होते हैं। अन्य एएसडी अस्पेर्गेर के लिए सामान्य बुद्धि से अधिक होना भी असामान्य नहीं है। कुछ डॉक्टर द्वारा इसी कारण से इसे ‘उच्च कार्यशील ऑटिज़्म’ कहा जाता है। बढ़ने पर बच्चों के रूप में, उच्च अवसाद और चिंता जोखिम का सामना करना पड़ता है।

ऑटिस्टिक डिसऑर्डर : ऑटिज़्म निदान के लिए एक और कड़े मानदंडों को पूरा करने वाले बच्चों में ऑटिस्टिक डिसऑर्डर होता है। उनके पास उच्च भाषा और सामाजिक हानि और दोहराव वाला व्यवहार है। दौरे और मानसिक मंदता भी आम है।

लक्षण

एक बच्चे में विकलांगता या बोलना देरी से सीखना।

संचार के साथ कठिनाई, सामाजिक बातचीत के साथ कठिनाई।

प्रेरक हितों और दोहराव वाले व्यवहार।

गरीब मांसपेशी समन्वय या टिक।

इलाज: ठीक नहीं किया जा सकता है, लेकिन उपचार मदद करता है इसके लिए योग्य स्नायु रोग चिकित्सक का परामर्श लेना आवश्यक हैं और इसमें रोगी के प्रति समानुभूति (एम्पैथी)की अधिक जरुरत होती हैं।

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