ठाकुरनगर में प्रधानमंत्री ने संक्षेप में खत्म किया भाषण, बहुत खास है वजह

कोलकाता। आसन्न लोकसभा चुनाव के लिए पश्चिम बंगाल भाजपा के लिए मछली की आंख की तरह महत्वपूर्ण हो चला है। शनिवार को यहां से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी चुनावी जनसभा की शुरुआत की। उत्तर 24 परगना के ठाकुरनगर में ‌ आयोजित पहली जनसभा में उन्होंने काफी संक्षेप में अपना वक्तव्य रखा। खास बात यह है कि प्रधानमंत्री जिस आक्रामक तेवर के लिए जाने जाते हैं, ठाकुरनगर की जनसभा से उन्होंने उस तेवर का प्रदर्शन नहीं किया। ममता बनर्जी पर हिंसा फैलाने का आरोप लगाने के अलावा उन्होंने कुछ भी ऐसा देखा नहीं कहा जो इलाके में सुर्खियां बन सकें। इसके पीछे भाजपा की सोची-समझी रणनीति थी।
प्रदेश भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने इस बारे में बताया कि प्रधानमंत्री ठाकुर नगर में जिस कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे वह एक तरह से मतुआ संप्रदाय का कार्यक्रम था। कायदे से देखा जाए तो यह एक गैर राजनीतिक कार्यक्रम था। समुदाय का धार्मिक उत्सव था जिसमें लोग अपनी परंपराओं का निर्वहन करने के लिए पहुंचे थे। ऐसे में प्रधानमंत्री हमेशा ही लोगों की भावनाओं का सम्मान करना जानते हैं और उस जनसभा के मंच को वह राजनीतिक कटुता के रूप में इस्तेमाल करना नहीं चाहते थे। उन्होंने बमुश्किल 9 से 10 मिनट के अंदर अपना संबोधन खत्म कर दिया था। इसकी वजह यह थी कि जिस मैदान में प्रधानमंत्री की जनसभा आयोजित की गई थी वह उस क्षेत्र का सबसे बड़ा मैदान होने के बावजूद उमड़ी भीड़ को संभालने में सक्षम नहीं था। मैदान में इतनी अधिक भीड़ हो गई थी कि लोग एक दूसरे से चिपके हुए थे और कहीं लोग घरों की छतों पर तो कहीं पेड़ों पर चढ़ने लगे थे। मैदान में रह रह कर लोगों के बीच धक्का-मुक्की होने लगी थी। यह सूचना भी प्रधानमंत्री को दी गई जिसके बाद उन्होंने अपने भाषण को संक्षिप्त कर दिया। मैदान और आसपास में इतनी अधिक भीड़ हो गई थी कि पुलिस और पार्टी के स्वयंसेवकों के लिये भीड़ को संभालना मुश्किल हो गया, इसलिए प्रधानमंत्री ने सोची समझी रणनीति के तहत अपने संबोधन को संक्षिप्त किया। केवल उन मुद्दों को छुआ जो पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण थे, जैसे किसान, मजदूर, युवा और आम वर्ग। जहां तक पश्चिम बंगाल सरकार निशाना बनाने की बात थी तो केवल राज्य भर में हिंसा के माहौल का जिक्र उन्होंने अपने भाषण में किया।
चूंकि वे मतुआ संप्रदाय के क्षेत्र में गए थे जो 30 लाख की संख्या में वहां रहते हैं और लोकसभा की 10 से अधिक सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं, इसलिए उन्होंने वहां नागरिकता का मुद्दा भी उठाया। मतुआ समुदाय बांग्लादेश छोड़कर बंटवारे के समय पश्चिम बंगाल में पहुंचे लोगों का समूह है जो सनातनी संस्कृति के तो हैं लेकिन स्थाई निवासी इन्हें अभी तक नहीं मिला है। इसलिए प्रधानमंत्री ने यहां नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 का जिक्र किया और कहा कि केंद्र की सरकार इस बिल को पास करेगी तब बड़ी संख्या में बंटवारे के समय भारत में आए शरणार्थियों को नागरिकता मिलेगी। इशारे-इशारे में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की सरकार को भी चुनौती दी और कहा कि अगर तृणमूल सच में मतुआ संप्रदाय का भला चाहती है तो नागरिकता विधेयक पारित कराने में मदद करें।
प्रधानमंत्री ने कहा, नागरिकता कानून से जनता को उनका अधिकार मिलेगा। आपको विश्वास दिलाना चाहता हूं कि हिंदुस्तान आजाद होने के बाद देश के टुकड़े किए गए। सांप्रदायिक दुर्भावना से लोगों पर अत्याचार हुए। बांग्लादेश, पाकिस्तान से लोगों को भागकर आना पड़ा। हम नागरिकता का कानून लाए हैं। संसद में यह कानून पारित होने दीजिए, इससे जनता को उनका अधिकार मिलेगा।

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