दिल्ली के मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी शौकत अली हाशमी का निधन

नई दिल्ली। दिल्ली के बहुचर्चित मुसलमान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शौकत अली हाशमी का आज 97 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। अंग्रेज शासन के दौरान दिल्ली के करमपुरा में लगाए गए खुफिया प्रेस के वह अभिन्न अंग थे। अंग्रेज शासन के विरुद्ध इस प्रेस से छपने वाली सामग्री पोस्टर,पम्पलेट में न केवल उनका सक्रिय योगदान रहता था बल्कि उसे एक जगह से दूसरी पहुंचाने की जिम्मेदारी भी वह अपनी जान पर खेलकर निभाते थे।
उन्हें आखिरी बार 9 अगस्त 2018 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सम्मानित किया गया था | समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ बड़ी संख्या में गणमान्य अतिथि मौजूद थे। उन्हें 26 जनवरी 2019 के समारोह में भी शामिल होने के लिए न्यौता आया था लेकिन बीमार होने के कारण वे उसमें भाग नहीं ले सके थे । उन्हें इसका बेहद मलाल भी था। संभवतः वह दिल्ली के अंतिम मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी थे।
उल्लेखनीय है कि भारत से अंग्रेजों को वापस भेजने के लिए चलाए जा रहे स्वतंत्रता आंदोलन में बेशुमार लोगों ने हिस्सा लिया है। इन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में शौकत अली हाशमी का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ भारतीयों में जन जागरण करने और उन्हें अंग्रेजी सरकार की दमनकारी नीतियों से अवगत कराने के लिए दिल्ली के करमपुरा इलाके में एक गोपनीय प्रेस स्थापित किया गया था। इस प्रेस में अंग्रेजों के खिलाफ हैंडबिल, पोस्टर वगैरह छापे जाते थे और इन्हें उत्तर भारत के शहरों में भेजा जाता था। शौकत अली हाशमी भी इस प्रेस का एक हिस्सा थे। उनके जिम्मे इस प्रेस से प्रकाशित हैंडबिल-पम्पलेट और पोस्टर आदि ले जाकर उत्तर भारत के शहरों में काम कर रहे दूसरे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को देना होता था। इसी सिलसिले में उन्हें फिरोजपुर में अंग्रेज पुलिस ने पकड़ लिया था और वह लंबे समय तक जेल में बंद रहे।
इसके अलावा इन लोगों की टोली में दिल्ली के ऐतिहासिक टाउन हाल के चौक पर कई बार तिरंगा झंडा भी फहराया था। एक बार तिरंगा झंडा फहराने के दौरान अंग्रेज पुलिस ने इनपर गोली भी चलाई गई थी जिसमें दिल्ली गेट के रहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बंसल जी को गोली लगी थी। बाद में इसी गोलीकांड की वजह से उनका निधन हो गया था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्होंने अरुणा आसिफ अली, सुभद्रा जोशी, बैरिस्टर आसिफ अली, मीर मश्ताक अली और भीम चंद ढींगरा वगैरह के साथ काफी दिनों तक काम किया। शौकत अली हाशमी शुरू से ही कांग्रेस पार्टी के साथ रहे।
उनके निधन पर उनके बड़े बेटे आसिफ हाशमी का कहना है कि उनके पिता ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के साथ ही अपना पूरा जीवन लोगों की सेवा में गुजार दिया है। उन्हें हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी पर सम्मानित किया जाता रहा है। क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता डॉ संजय ढींगरा का कहना है कि उनके जाने से पूरा इलाका यतीम हो गया है। उन्होंने बताया कि वह हाशमी साहब की देखभाल किया करते थे। उन्हें कहीं भी आना जाना होता था तो अपने साथ लेकर जाते थे। उन्होंने बताया कि 26 जनवरी 2019 के समारोह में भी उन्हें आमंत्रित किया गया था लेकिन बीमारी की वजह से नहीं गए जिसका उन्हें काफी मलाल था |

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