स्वच्छता की संस्कृति विकसित करने की जरूरत

डॉ. राकेश राणा
मनोरम और प्राकृतिक के साथ-साथ जो साफ और स्वच्छ हो वही सबसे सुन्दर लगता है। भारतीय पर्यटक जब स्विट्जरलैण्ड को निहारकर वापस लौटते हैं तो चर्चा करते नहीं थकते हैं। यदि कोई उनसे पूछे कि हमारा कश्मीर, हिमाचल और लद्दाख कैसे हैं? तो अक्सर जवाब यही होता है कि स्विट्जरलैण्ड जैसे ही हैं। यानि कम नहीं हैं। कहीं-कहीं तो उससे भी ज्यादा सुन्दर है हमारा हिमालय। अगर यह सच भी है कि स्विटजरलैण्ड बहुत सुन्दर है, तो एक सवाल यह रह जाता है कि क्या सुन्दर होने के साथ-साथ हम स्वच्छ भी उतने ही हैं जितना स्विट्जरलैण्ड? क्या हम अपनी हिमालय जैसी धरोहर को लेकर, उसकी संरक्षा, सुरक्षा और स्वच्छता के प्रति रंच मात्र भी गंभीर हैं? भारत जैसी गंदगी और गरीबी शायद ही कहीं देखने को मिलेगी। विकसित देशों की होड़ करना हमारे लिए आसान नहीं है। विकास की गति उनके जैसी हम नहीं पा सकते हैं। विकसित और विकासशील देशों और उनके बीच का यह अंतर घटेगा नहीं, यह तो भविष्य में निरन्तर बढ़ता ही जाएगा। जिन क्षेत्रों में हम उनके साथ बढ़ सकते हैं, उनसे सीख सकते हैं, उनमें भी हम कहीं नहीं ठहरते हैं। यह विडम्बना ही है कि स्वच्छता में विकसित और विकासशील देश उसी अंतर के साथ खड़े दिखते हैं जैसे अन्य सब जगह। क्या हम मानसिक और सांस्कृतिक धरातल पर इतने सुन्न हो चुके हैं कि किसी भी तरह का आघात महसूस करने की हमारी क्षमता ही जाती रही है। देश में गरीबी बढ़ी है या घटी है? इस दिशा में सरकार की आंकड़ेबाजी एक अलग तरह का अभ्यास है। आजादी के बाद हमने निश्चित ही प्रत्येक क्षेत्र में तरक्की की है। आंकड़ेबाज हमें जरूर कहेंगे कि जिस अनुपात में आबादी बढ़ी उस अनुपात में गरीबी नहीं बढ़ी है। सच्चाई है कि यह खाई निरन्तर चौड़ी हुई है और गरीबी भयावह हुई है। गरीबी और गंदगी में हम लोग कीड़े-मकोड़ों की तरह बिलबिला रहे हैं। भारत आने वाला कोई भी विदेशी हमारी किस चीज की तारीफ करे? ऐसा आजाद भारत में हमने क्या कर दिखाया है? अगर उन्हें हमारे किसी कस्बे, गांव या देहात से गुजरना पड़ जाए तो मारे दुर्गन्ध के बेहोश ही हो जाएं। ये तो समझ में आता है कि हम गरीब हैं। यह बहुत-सी स्थितियों-परिस्थितियों पर निर्भर करता है। गरीबी का होना न होना हमारे हाथ में नहीं है। प्रश्न यह है कि हम गरीब होने के साथ-साथ गंदे भी हैं। सवाल तो हमारी गंदगी का है जो गरीबी से कहीं ज्यादा बड़ी है। गंदगी के मामले में हम निरंतर बद से बदतर होते जा रहे हैं। गंदगी के ढेर लगा रहे हैं? महानगरों की सरहदों में घुसते ही कूड़े के पहाड़ आगन्तुकों का स्वागत करते दिखते हैं। हमारी आने वाली पीढ़ियां हमसे भी ज्यादा गंदगी में जीने को अभिशप्त होगी। हम कब सुधरेंगे। क्या किसी राज्य का कोई सभ्य नागरिक यह सोचकर गौरवान्वित होगा कि मेरी सरकार मुझे साफ-सुथरा रहना सीखा रही है? स्वच्छ रहकर बीमारियों से बचना सीखा रही है। स्वच्छता के अभियान चला रही है। अपने घर-बाहर को कैसे साफ रखना है, इसका प्रचार कर रही है। देश का एक बड़ा संसाधन इसके लिए झोंका जा रहा है। अक्सर सुनते हैं कि गरीबी और गंदगी साथ रहती है। इनका तो चोली-दामन का साथ है। लेकिन सच्चाई ऐसी है नहीं। दुनिया में हमसे गरीब और कम संसाधनों वाले भी लोग हैं, जिन्हें गंदगी पसन्द नहीं है। वे सफाई से ही रहते हैं। वास्तविकता यह है कि यह एक मानसिकता है। क्या रास्ते में कूड़ा बिखेरने से आपको कोई आनन्द मिल जाता है या पान को अलग जाकर किनारे पर थूकने में पैसा खर्च होता है? अक्सर लोग रास्ते के बीच खड़े होकर थूक रहे होते हैं। इंडिया गेट और ताजमहल की सुन्दरता का बखान भी पान मसाले की पीक मारकर करते नजर आते हैं। आबादी की बढ़त पर हम बात भी नहीं करते हैं। किसी राजनीतिक पार्टी के एजेंडे में जनसंख्या वृद्धि पर कोई चिंता नजर नहीं आती है। फिर तो गरीबी भी बढ़ेगी और गंदगी भी। गंदगी पूरी विकरालता से बढ़ रही है। उसे रोकना तो दूर अभी हमें इसका गुमान तक नहीं है कि यह हमारा कितना नुकसान कर रही है। स्वास्थ्य की दृष्टि से गंदगी हमारे जैसे गरीब मुल्कों के साथ क्या कर रही है। प्रदूषण की विकरालता किस स्तर पर पहुंच चुकी है। गांधी दक्षिण अफ्रीका स्थित फिनिक्स आश्रम में शौचालय की साफ-सफाई खुद करते थे। गांधीजी का मानना था कि स्वतंत्रता से ज्यादा जरूरी स्वच्छता है। स्वच्छता और नागरिक मूल्य ही किसी राष्ट्र की नींव मजबूत करते हैं। इसलिए गांधी ने अपने जीवन में साफ-सफाई और स्वच्छता को प्राथमिकता दी। राष्ट्रीय आन्दोलन के कार्यक्रमों में भी स्वच्छता और उसमें हर व्यक्ति की भागीदारी पर उनका जोर था। जब गांधी ने 1937 में बुनियादी शिक्षा के लिए वर्धा में सम्मेलन आयोजित किया, उसमें भी स्कूली पाठ्यक्रम में स्वच्छता को केन्द्र में रखने पर जोर दिया। उनकी धारणा थी कि शुरुआत से ही राष्ट्र के लिए सफाई के प्रति जागरूक पीढ़ी हम तैयार करें। हमें स्वच्छता की संस्कृति विकसित करने की महती आवश्यकता है। इसके लिए शिक्षा को विशेष जिम्मेदारी लेनी होगी। गांधीजी के बाद यह पहला मौका है जब राष्ट्रीय स्तर पर देश में स्वच्छता के महत्व को गहराई से समझने-समझाने की कवायद हो रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लालकिले से यह घोषणा करना कि 2019 तक देश को खुले में शौच से मुक्त किया जाएगा। एक नयी चेतना की शुरुआत है जो स्वच्छता की संस्कृति को बनाने में मील का पत्थर साबित होगी। अब देश को गंदगीमुक्त अभियान की तरफ बढ़ने की पहल करनी ही होगी। समाज की सहभागिता से हम इस मुश्किल को आसानी से पार कर लेंगे। जैसे-जैसे हम स्वच्छता की संस्कृति के विकास की दिशा में कदम बढ़ाएंगे, वैसे-वैसे एक स्वच्छ और स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण कर रहे होंगे। अपने नागरिकों की जीवन गुणवत्ता और कार्य क्षमता में गुणात्मक ढंग का बदलाव महसूस कर रहे होंगे। तब हम एक सभ्य समाज के सभ्य भारतीय नागरिक कहलाने के सच्चे हकदार होंगे।

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