मशीनरी युग ने चीर दिया धरती का सीना

-रमेश ठाकुर-

धरती का इंसानी जीवन से सीधा संबंध होता है। बिना धरती के मानव जीवन संभव नहीं। लेकिन वर्तमान समय में इंसान पृथ्वी का ही सबसे बड़ा दुश्मन बन बैठा है। उसे मिटाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा। शास्त्रों में कहा गया है कि प्रकृति को बचाने की जिम्मेदारी ईश्वर ने इंसान को सौंपी थी। लेकिन इंसान अपने स्वार्थ के कारण अपनी मानवता और अपने ग्रह का ध्यान रखना ही भूल गया है। धरती जिसने हमें जीवन दिया, आज हम उसी धरती के संसाधनों का निर्दयतापूर्वक दोहन करने लगे हैं। अपने ग्रह के महत्व के बारे में मानव जाति को जागरुक करने के लिए ‘पृथ्वी दिवस’ के रुप में 22 अप्रैल को चिन्हित किया गया है। लेकिन यह दिवस भी बेगाना-सा लगने लगा। धरती की संरचना जीवन बचाने के लिए की गई थी, लेकिन हो उसके उलट रहा है। इंसान धरती को ही नष्ट करने में लगा है। अगर ऐसा ही रहा तो इंसानी जीवन खतरे में पड़ जाएगा। न अपनी और न ही दूसरों की परवाह किए बिना लोग धरती का सीना फाड़कर लंबी-लंबी गगनचुंबी इमारतों का निर्माण कर लगातार पर्यावरण का दोहन कर रहे हैं। इससे बेजुबान जीवों के लिए रहना मुस्किल हो गया है। उनके रहने माफिक जगह जैसे खेत-खलिहान, नदी-तालाब, झरने, अभयारण्य, जलाशय आदि खत्म होते जा रहे हैं। पानी का जलस्तर तेजी से गिर रहा है। महज दो-तीन दशकों से स्थिति बहुत भयावह हो गई है। इसे रोकने के लिए सरकारी व सामाजिक कोशिशें नाकाफी साबित हो रही हैं। मानवीय हिमाकत पृथ्वी का दोहन जिस युद्धस्तर पर कर रही है, उससे प्रतीत होता है कि आने वाला समय इंसानी जीवन के लिए बहुत जल्द संकट खड़ा करेगा। 22 अप्रैल को समूचा विश्व ‘अर्थ दिवस’ इस उद्देश्य से मनाता है कि इस विकराल समस्या को रोकने के लिए मनन-मंथन किया जाए। रस्म अदायगी के लिए कोरे वादे और आश्वासन हर मुल्क में किए जाते हैं।

लेकिन ईमानदारी से पर्यावरण को बचाने के लिए कोई नहीं सोचता। धरती पानी के बिना कराह रही है। नमीं के चलते पेड़-पौधे सूखते जा रहे हैं। जीवों की संख्या लगातार खात्मे के कगार पर पहुंचती जा रही है। पक्षियों की कई प्रजातियां लुप्त हो गईं हैं। पृथ्वी दिवस पर अक्सर पृथ्वी को बचाने के दावे किए जाते हैं। क्योंकि यह एक ऐसा दिन होता है जब हम अपने पर्यावरण के बारे में चिंता व्यक्त करते हैं। लेकिन अगले दिन सबकुछ भूल जाते हैं। बढ़ती जनसंख्या के चलते आवासीय जगह की कमी के कारण जमीन सिमटती जा रही है। जंगल कम हो रहे हैं। जंगलों को काटकर आवासीय और खेतीबाड़ी की जाने लगी है। समय रहते अगर धरती और पर्यावरण का संरक्षण नहीं किया गया तो परिणाम भयावह होंगे। इसका खामियाजा हम सब भुगतने के लिए अभी से तैयार रहें। पर्यावरण हर क्षेत्र में दूषित हो रहा है। मनाही के बाद भी अब सब कुछ प्लास्टिक के थैलों में पैक होने लगा है। प्लास्टिक थैलों का उत्पादन दिनों-दिन बढ़ रहा है जो पर्यावरण के लिए सबसे घातक है।

इन वस्तुओं का निष्पादन न करना दूषित पर्यावरण के मुख्य कारकों में से एक है। पृथ्वी दिवस के मायने हमें समझने की जरूरत है। इस दिवस को गंभीरता से लेने की दरकार है। सिर्फ रस्म अदायगी तक ही सीमित न रहें। दरअसल, आम लोगों, खासतौर से युवाओं के बीच पर्यावरणीय सुरक्षा के अभियान व जागरुकता बढ़ाने के मकसद से ही अमेरिका के सीनेटर रहे गेलार्ड नेल्सन ने पृथ्वी दिवस का सृजन किया था। पृथ्वी को संरक्षण प्रदान करने के लिए आज समूची दुनिया सहयोग और समर्थन कर रही है, लेकिन नतीजा कुछ खास नहीं निकल रहा। पृथ्वी दिवस पर कई देशों का एक समूह है जो इस दिवस पर मंथन करता है। विश्व स्तर पर कार्यक्रम भी समन्वित होते हैं। युवा पीढ़ी निरंतर प्रकृति विधाओं से दूर होती जा रही है। उनके हिस्से में आर्टिफिशियल वस्तुएं ही आ रही हैं। प्राकृतिक खूबियों से अनजान है। पर्यावरण व धरती को बचाने के लिए कागजी प्रयासों की कोई कमी नहीं है। विश्व स्तर पर इन सब प्रयासों के बावजूद समस्या जस की तस बनी हुई है।

युवा पीढ़ी इस ओर जल संरक्षण न कर केवल दोहन की ओर ही अग्रसर है। जो उनकी जागरूकता के अभाव को प्रदर्शित करती है। कभी वर्षा जल का संरक्षण बड़े-बड़े तालाबों के रूप में किया जाता था। जो वर्षा जल संरक्षण का एक उत्तम प्राकृतिक स्रोत था। आज मानव इन स्रोतों की कटौती कर इन पर इमारतें खड़ी कर रहा है, जो उसे सुख-समृद्धि के साधन प्रदान कर रही है। दूसरी ओर, जल से संबंधित समस्याओं से घेर भी रही है। कुल मिलाकर हम आने वाले खतरों से अंजान हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि धरती पर जीवन के विकास के लिए स्वच्छ मौसम का होना बहुत जरूरी है। यदि बदलता हुआ मौसम नहीं होगा तो जीवन संभव नहीं होगा। यह संभव होगा, शुद्ध पर्यावरण से। कुछ दशकों से चांद की ग्रेविटी के कारण धरती के घूमने की रफ्तार कम हुई है। वैज्ञानिक बताते हैं कि हजारों वर्ष पूर्व धरती पर इतनी गर्मी नहीं थी कि तरल पानी रह ही नहीं सकता था, लेकिन वायुमंडल में पानी की भाप थी। लेकिन अब मौसम में नित बदलाव होने लगा है।

शोध बताती है कि जब कई लाख साल पहले धरती ठंडी हुई तो बारिश होने लगी जिससे तालाब बने, झीलें बनीं और फिर महासागर। 380 करोड़ साल पहले हमारे पास चांद था, समुद्र था लेकिन वह वैसा नहीं था जैसा कि आज हम देख रहे हैं। इसीलिए जीवन सुरक्षित रखने के लिए तत्काल प्रभाव से धरती का दोहन छोड़ना होगा। समय की मांग है दुनिया को अब आधुनिक संसाधनों की बजाय प्राकृतिक संसाधनों की तरफ लौटना होगा। लेकिन मशीनरी युग में अब इंसान इतना आलसी हो गया है कि शायद ही पीछे मुड़कर देखे। धरती बचाने के लिए सरकारी प्रयासों के अलावा सामाजिक कोशिशें भी जरूरी हैं। दोनों के संयुक्त एवं सामुहिक सहयोग से ही जीवन और धरती बच सकेगी, अन्यथा वीरान होने में समय नहीं लगेगा। इसलिए इस पृथ्वी दिवस पर हम सबको संकल्प लेना चाहिए कि पौधे लगाएंगे और धरती को दूषित नहीं करेंगे। ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इसके बिना हम मानव जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। धरती को सहेजने के लिए अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारियों को निभाना होगा, तभी पृथ्वी दिवस का मतलब साबित होगा।

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