चीन ने लगाई 6-7 वर्षीय बच्चों की लिखित परीक्षा पर पाबंदी, क्या भारत में ऐसा कोई प्रयोग संभव है?

नई दिल्ली। चीन में परिवर्तन की बह रही बयार के बीच चीन शिक्षा सुधारों पर भी अहम फैसले कर रहा है। इन सुधारों के तहत चीन ने अपने यहां 6 और 7 सालों के बच्चों के लिए लिखित परीक्षा पर पाबंदी लगा दी है। इसका उद्देश्य अति-प्रतिस्पर्धी स्कूल सिस्टम में छात्रों और अभिभावकों पर दबाव कम करना है। चीन के पुराने सिस्टम के मुताबिक, पहले छात्रों को पहली कक्षा से परीक्षा देने की आवश्यकता होती थी, इसके पीछे 18 साल की उम्र में विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा का डर होता था, जिसे गाओकाओ के रूप में जाना जाता है, जहां एक सिंगल स्कोर बच्चे के जीवन पथ को निर्धारित कर सकता है।

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जारी नई शिक्षा नीति के मुताबिक, बार-बार होने वाली परीक्षाएं, जिसके कारण छात्रों पर अधिक बोझ पड़ता है और परीक्षा का भारी दबाव होता है इसे शिक्षा मंत्रालय द्वारा हटा दिया गया है। शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि कम उम्र से विद्यार्थियों पर दबाव उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। ये नियम जूनियर हाई स्कूल में मध्यावधि और मॉक एग्जाम की अनुमति के साथ-साथ अनिवार्य शिक्षा के अन्य वर्षों में परीक्षा को एक बार में सीमित कर देते हैं।

चीन के शिक्षा मंत्रालय ने इस साल की शुरुआत में पहली और दूसरी कक्षा के छात्रों के लिए लिखित होमवर्क पर भी प्रतिबंध लगा दिया और जूनियर हाई छात्रों के लिए होमवर्क को प्रति रात 1.5 घंटे से अधिक तक सीमित नहीं किया। आपको बता दें कि गाओकाओ उन कुछ तरीकों में से एक है जिससे गरीब, ग्रामीण छात्र शीर्ष विश्वविद्यालयों में बेहतर शैक्षिक अवसरों और नौकरी की संभावनाओं तक पहुंच सकते हैं। जनसंख्या के लिहाज से चीन के बाद भारत दूसरे नंबर पर आता है यानी यहां भी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की तादाद अच्छी खासी है।

अक्सर तमाम ऐसी खबरें आती हैं जब हमें यह सुनने को मिलता है कि पढ़ाई के अत्यधिक दबाव को लेकर किसी बच्चे ने कोई गलत कदम उठा लिया। स्कूली पढ़ाई के दौरान बच्चों के दिमाग पर पड़ने वाला दबाव कई बार तो उनकी पूरी जिंदगी उनपर हावी रहता है। ऐसे में चीन के इस कदम के बाद यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत में भी ऐसा कोई प्रयोग हो सकता है?

हमारा जो सामाजिक ताना-बाना है उसके मुताबिक, बच्चों में सबसे ज्यादा स्कोर करने का अलग ही प्रेशर होता है, लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि स्कोर की रेस में शामिल बच्चों का बचपन उनसे पीछे छूट जाता है। यही आगे चलकर उनको मानसिक तनाव और डिप्रेशन की ओर धकेल देता है। चीनी शिक्षा मंत्रालय ने भी तो इसी बात पर फोकस किया है कि कम उम्र से विद्यार्थियों पर दबाव उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है।

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मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एचआरडी) की ओर से जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि 11 से 17 साल की उम्र के स्कूली बच्चों में हाइपरटेंशन की शिकायत ज्यादा देखी जा रही है जिसका असर उनके मेंटल हेल्थ पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञ भी अक्सर कहते सुने जा सकते है कि बच्चों पर स्कोर का प्रेशर नहीं होना चाहिए क्योंकि बेस्ट होने के प्रेशर को नहीं झेल पाने की वजह से कई बार बच्चे आत्महत्या जैसे गंभीर कदम भी उठा लेते हैं। कोरोना और लॉकडाउन की वजह से बच्‍चों का मासूम बचपन घर की चारदीवारी में कैद होकर रह गया है।

इससे बच्‍चों को न केवल बोरियत और फ्रस्‍ट्रेशन हो रही है बल्कि इसका गलत असर उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे लॉकडाउन की वजह से आने वाले समय में बच्‍चों में दीर्घकालिक स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं पैदा हो सकती हैं। इस महामारी से बच्‍चों की सेहत पर जो असर पड़ेगा, उस पर तुरंत ध्‍यान देने की जरूरत है।

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