(कहानी) जिंदगी का लाइसेंस

-शिफाली-

होम डिपार्टमेंट में बंदूकों की लाइसेंस का अहम काम जब बाबूजी के जिम्मे आया तो उन्होने अपने अफसर से जाकर साफ कह दिया कि उन्हे ऐसी दागदार टेबल पर काम नहीं करना, जिसके नीचे और ऊपर से फाईलों से ज्यादा रिश्वत के लिफाफे चलते हों ऐसी टेबल की जिम्मेदारी वो नहीं संभाल पाएंगे। लेकिन होम डिपार्टमेंट की इस ब्रांच से लगातार मिलती रहीं करप्श्न की शिकायतों से तंग आए अफसर भी परेशान थे कि इस ब्रांच की क्लीनिंग कैसे की जाए। वो तय कर चुके थे कि इस बार ये जवाबदारी किसी ऐसे ईमानदार कर्मचारी के हाथ में सौंपेंगे जिसके बिकने की कोई गुंजाइश ना हो। होम डिपार्टमेंट में बाबूजी की गिनती उन्ही कर्मचारियों में होती थी जिनका ईमान किसी कीमत पर बिकाऊ नहीं था। तो जाहिर है डिपार्टमेंट में जब आनेस्ट एम्पलोई की सर्च हुई तो कई कर्मचारियों से गुजरते हुए ये तलाश श्री एम पी शर्मा यानि बाबूजी पर आकर थम गई। लेकिन जिस दिन से ये प्रपोजल बाबूजी के सामने आया था।

उनके दिन का चैन और रातों की नींद हराम हो गई थी। बेईमानों के सपने आने लगे थे। मंगल और शनिवार को सुबह सुंदरकांड का पाठ तो रोज करते थे लेकिन जबसे अफसर ने उनसे इस नई जिम्मेदारी का जिक्र किया, तो शाम को भी हनुमान मंदिर का एक चक्कर लगा लिया करते कि सिर पर आया ये संकट किसी तरह टल जाए। बाबूजी के लिए जो संकट था बाकी कर्मचारियों के लिए वो सौगात से कम नहीं। कई थे जो ऊपरी कमाई की गारंटी देने वाली इस टेबल के लिए अपनी तरफ से भी अफसरो को कुछ चढौत्री चढ़ाने तैयार बैठे थे, लेकिन मुश्किल ये थी कि इस बार उनका पाला ईमानदार अफसर से पड़ गया था। लेकिन इस सबके बीच बाबूजी की मुश्किल तो बनी हुई थी। मुश्किल ये कि बेईमानी की राह से बचते रहे बाबूजी अब इस दलदल से कैसे पाक साफ निकलेंगे। बाबूजी ने लाख कोशिश की। अपने कर्मठ और ईमानदार होने का वास्ता दिया। लेकिन तब वो कहां ये जान पा रहे थे कि उनकी इसी ईमानदारी के व्हाइटनर के इस्तेमाल से उनके अफसर अपने डिपार्टमेंट में बढ रहे करप्श्न के दागों को धोना चाहते है।

तीस साल की लंबी सरकारी नौकरी बिना किसी दाग के निकाल चुके बाबूजी ये कतई नहीं चाहते कि रिटायरमेंट के इन अखिरी सालों में किसी ऐसी सीट पर काम करें जहां उलझने की पूरी गुंजाइश हो। उन्होने अपने अफसर से यहां तक कहा कि आप मुझे सस्पेंड करके घर बिठवा दो लेकिन साहब मैं इस दलदल में तो जाने से रहा। लेकिन अफसर ने तो जैसे तय कर लिया था कि इस कीचड़ की सफाई बाबूजी से ही करवाएंगे। आखिरकार हुआ भी वही, लंबी ना नुकुर के बाद हारकर बाबूजी को अपने अफसर की ही बात माननी पड़ी और होम डिपार्टमेंट में बंदूकों के लाइसेंस दिलवाने का काम जिसे करप्शन की खान भी कहा जाता था बाबूजी के मत्थे आ गया। बाबूजी की सीट क्या बदली उनके लिए दफ्तर का पूरा सिनेरियो ही बदल गया। पहले बाबूजी के डिपार्टमेंट का प्यून सीताराम अकेला था जो सुबह दफ्तर आते वक्त और शाम को दफ्तर से जाते वक्त बाबूजी को पूरे अदब से प्रणाम किया करता था। दफ्तर के बाकी लोगों के लिए तो पिछले तीस साल से बाबूजी घर के उस बंद कमरे की तरह थे जिसका जरुरत पड़ने पर ही इस्तेमाल किया जाता है।

अजीब तरह का अनबोला था उनका पूरे दफ्तर से। यारबाजी वाला कोई अंदाज नहीं था उनमें। पान के ठेले पर अफसर की बैक बाईटिंग या चाय की चुस्कियों के साथ फलां मेडम और फलां साहब की इश्क के किस्से, असल में पूरा दफ्तर जिन बातों का मुरीद था। बाबूजी इन सारी बातों के सख्त खिलाफ। वो खुद कहते थे हम से फालतू बात ना किया करो। फिरदफ्तर ने भी उनकी इस ताकीद पर चलना शुरु कर दिया था। इसीलिए काम की बात भी अब उनसे बमुश्किल ही होती थी। असल में बाबूजी की ईमानदारी और नियम कायदे उनकी सबसे बड़ी मुश्किल थे। जो टिपीकल सरकारी ढर्रे पर चलने वाले दूसरे साथियों के साथ उन्हे खड़ा नहीं होने देते थे। किसी से घुलने मिलने नहीं देती थी, चाय की दुकान पर जाते नहीं थे। पान गुटके की लत थी नहीं। लंच में दफ्तर के बाहर तबादले और फाइल खिसकाने के साथ आने वाली चढौत्री की चर्चाएं बाबूजी को रास नहीं आती थी। ये वाइजवर्सा था बाबूजी को बाजार की तरह रोज अपने काम के दाम बढाने वाले बेईमान कर्मचारी फूटी आंख नहीं सुहाते थे।

और अपने ईमान से जरुरत के मुताबिक भटकने वाले कर्मचारियों के गले बाबूजी नहीं उतरते थे। लेकिन सरकार के इन सिपहसालारों की नौकरी तो चल ही रही थी, ऊपरी कमाई की लत पाल चुके भ्रष्ट कर्मचारियों की भी, और केवल सूखी तनख्वाह पर अब तक अपने साथ अपने बीवी बच्चों की गुजर कर रहे बाबूजी की भी। लेकिन पूरे तीस साल बाद टर्निग पाइंट आया था। बाबूजी की जिंदगी में और हमेशा से मलाईदार पोस्ट पर जमे रहे उन कर्मचारियों की नौकरी में भी। जिनके घर में सरकारी पगार तो केवल बैंक के सेविंग अकाउंट में जमा होने जाती थी। घर के खर्चों के लिए तो ऊपरी कमाई ही काफी थी। सालों से रिश्वत की शेयरिंग देखते आए कर्मचारी हमेशा ये मानकर चलते थे कि डिपार्टमेंट में किसी भी अफसर की पोस्टिंग हो जाए,अपना काम नहीं रुकेगा। पैसा किसी को बुरा नहीं लगता, वो जानते थे कि जब कमा के देंगे तो साहब हिस्सा लेने से कैसे इंकार कर सकते हैं, फिर अफसर शमिल हो तो डिपार्टमेंटल जांच से भी बेफिक्री और अगर कुछ आसमानी सुल्तानी सरकारी दबाव आ भी गया तो अपनी बचाने, कर्मचारी की नौकरी तो अफसर को बचानी ही पड़ेगी आखिर शेयर होल्डर जो हैं, लेकिन इस बार सारा मामला उलट गया था,ऊपर ईमानदार अफसर और नीचे इस भ्रष्ट्र विभाग में ईमानदारी की मिसाल बाबूजी। कर्मचारी कहने भी लगे थे कि करप्श्न, कर्मचारियों की भाषा में कहें तो सुविधा शुल्क के लिए मशहूर रहे इस विभाग का तो अब ऊपर वाला ही मालिक है। कमाई वाली सीट पर पोस्टिंग के बाद उस दिन पहली बार जब बाबूजी दफ्तर गए।

दरवाजे से ही महसूस कर रहे थे कि दफ्तर ने नजर बदल ली हैं। सीताराम ने रोज की तरह नमस्ते किया। लेकिन डाक मार्किंग का काम देखने वाले छोटे बाबू ूश्रीवास्तव से लेकर बड़े बाबू तक सब ऐसे पेश आ रहे थे कि जैसे बाबूजी को नई सीट नहीं मिली, केरल के पदमनाभ स्वामी मंदिर का खजाना उनके हाथ लग गया है। अब तो शर्मा जी लाखों में खेलेंगे लाखों में, दफ्तर के छोटे बाबू श्रीवास्तव इसी अंदाज में बाबूजी का इस्तकबाल किया। नसीब वाले हैं जो बिना कुछ लिए दिए ऐसी टेबल मिल गई जिसने कभी किसी को निराश नहीं किया। सुझाव भी आने लगे, शर्मा जी मेरी मानो अब ये साईकिल तो सीताराम को दे दो। अब ये सूट ना करेगी आपको। नई स्कूटर उठालो किश्तों का इंतजाम तो ये टेबल ही कर देगी। सलाहें कई तरह की। अब ये ईमानदारी का राग छोड़ो, हो गई तीस चालीस साल की नौकरी,ईमानदारी के सर्टिफिकेट से कौन सी हालत सुधर गई आपकी। हम सबसे सीनियर हो हमने तीन गाडि़यां बदल ली,पर आप साईकिल से आगे नहीं बढ पाए। अभी दुबे जी की समझाईशों और सलाहों का दौर खत्म भी नहीं हुआ था कि श्रीवास्तव बाबू ने मन के लड्डू खाने भी शुरु कर दिए। हिस्सा बांट शुरु कर दिया। पिछले बीस साल में बमुश्कल बीस बार बाबूजी से बात की होगी लेकिन अबकि ऐसे अपनेपन से बोले जैसे बरसों की यारी है। हम अभी से कहे देते हैं शर्मा जी पहला जो भी लाईसेंस होगा। सबमें बंटना चाहिए उसका प्रसाद और अपना हिस्सा तो आप भूलना मत।

दुबे जी बाबूजी को समझते थे, श्रीवास्तव बाबू को रोक कर बोले, अरे अब इतने उतावले ना हो भैय्या। अभी शर्मा जी को ये गणित समझने तो दो। आज तक सिर्फ अपने ईमान के बूते अपनी मेहनत की तनख्वाह पाते रहे बाबूजी देख सुन रहे थे बेईमानी कितनी सर चढकर बोल रही है। वो खामोश थे। लेकिन पूरा दफ्तर बोल रहा था। बेईमानी के 101टिप्स सिखाए जा रहे थे। जो देश के किसी भी रेल्वे स्टेशन की बुक स्टॉल पर नहीं मिलते। नुस्खे भी एसे जो अजमाए हुए हैं। नफे और नुकसान के साथ बाबूजी तक पहुंच रहे थे। किस बात की कितनी रिश्वत लेनी है? कैसे लेनी है।? कहां बचना है। कैसे अफसर को साथ लेकर चलना है और खुदा ना खास्ता फंस ही जाएं तो कैसे निकलना है। सारी नसीहते सारे पाठ और सीखने वाले अकेले बाबूजी। जो खामोश सोच रहे थे कि ईमानदारी की पच्चीस साल की नौकरी में अज तक कोई ऐसा नहीं मिला कि जो ईमानदारी के मुश्किल रास्ते पर चलना सिखा देता। लेकिन बेईमानी की राह पर ना सिर्फ लोग चलना सिखा रहे हैं, बल्कि इस राह पर हमकदम होने भी तैयार बैठे हैं। अच्छों की दुनिया और सच्चों की दुनिया खत्म हो गई है क्या। रिश्वत, चापलूसी, मतलब से दिखाई जा रही फिक्र इस सारे माहौल से उकता रहे थे बाबूजी।

लेकिन कोई नहीं था पूरे दफ्तर में जिसके पास जाकर अपना ये दुख कह पाते। घर पहुंचे तो पहले जी भर कर नहाए। जैसे बेईमानों की सोहबत में दिल दिमाग के साथ जिस्म पर आई गर्द को साफ करना चाहते हों। सरकार से सिक्सथ पे कमीशन के लिए बाबूजी ने भले महीनों गुहार लगाई हो। मांग की हो। लेकिन एक घर ही ऐसा था जहां बाबूजी की हर डिमांड कुछ कहे बगैर पूरी होती थी। केवल आठवी तक पढी मां, बाबूजी नाम की इस किताब को इतने गहरे बांच चुकी थी कि अब सिर्फ देखकर जान लेती थी कि आज मैदानी इलाकों में मौसम श्ुाष्क है या गरज चमक के साथ छींटे भी पड़ सकते हैं। खैर, आज आसमान साफ लग रहा था तो मां ने भी चाय के बाद हलुए का बोनस बाबूजी के सामने पेश कर दिया। जिस तरह तेज चमकती धूप में अंदेशा नहीं होता कि कहीं से बादल आएंगे और बरस पड़ेगें बिल्कुल वैसा ही हुआ उसदिन मां के साथ। सूजी का गर्मागर्म हलुआ लेकर मां आई ही थी कि बाबूजी ने सवाल किया, ये किस खुशी में। मां कुछ झिझकते हुए बोली, खुशी की तो कोई बात नहीं, ऐसे ही लगा कि आज आपके लिए हलुआ बना दूं, इधर मां बात खत्म भी नहीं कर पाई थी कि बाबूजी भड़क गए। तुम भी उन बेईमानों की जमात में शामिल हो गई ं क्या। तुम्हे भी लग रहा है अब ये आदमी खूब कमाएगा। घर में ऊपरी कमाई से फ्रीज,रंगीन टीवी जा जाएगा। संजू और दीपू की फरमाईशें पूरी होने लगेगीं। तुम्हारे लिए नई रकम बन जाएगी। तो भूल जाओ। ये सबकुछ नहीं होगा। कहीं कुछ नहंीं बदलेगा। मक्खन लगा रही हो तुम मुझे। किसी गलतफहमी में मत आओ। मैं जैसा हूं वैसा ही रहूंगा। भूल जाओ, कि कमाई वाली सीट से बेईमानी का एक रुपया इस घर में आएगा। मां के कुछ समझ में नहीं आ रहा था। लेकिन बेईमानी के बोलबाले में बाबूजी ने सबको एक ही चश्मे से समझना और देखना शुरु कर दिया था।

श्रीवास्तव और जोशी के लिए आसमान पर छाए बादल मां पर गरज चमक के साथ बरस चुके थे, मां खामोश सुनती रही सबकुछ। फिर बोली,पूरी उम्र आपके साथ ईमानदारी की तंगी में गुजार दी आपको क्या लगता है कि अब बुढापे में बेईमानी से शौक पूरे करुंगी। और आप भी याद रख लो ईमानदारी की बीमारी आपकी सोहबत में नहीं लगी मुझे। अपने ईमानदार बाबा की बेटी हूं। अंग्रेजो के आगे अकेले थे जो नहीं बिके। खून में ईमानदारी है मेरे। समझे दीपू के बापू। इधर बाबूजी ने नई सीट संभाली और उधर जंगल में आग की तरह ये बात फैल गई कि अब लाइसेंस तो कायदे कानून से ही बनेंगे। एक सिरफिरा बैठ गया है कुर्सी पर। लेकिन पैसे के दम पर कई बार कईयों का ईमान खरीद चुके लोगों को फिर भी भरोसा था कि शर्मा जी कौन से मंगल ग्रह से आए हैं। जरुरतें तो इनकी भी होंगी। घर परिवार होगा बिक जाएंगे ये भी। जैसे अब तक इस टेबल पर बैठे सरकारी दामाद बिकते रहे हैं। और इस तरह हर चीज की कीमत लगाने वालों ने बाबूजी को रिशवत का पहला नजराना भेज ही दिया। घर के कामकाज से निपट कर सुस्ताने लेटी मां की आंख लगी ही थी कि दीपू चिल्लाता आया। अम्मा, एक अंकल आए थे मिठाई दे गए हैं। मां ने कहा, कौन अंकल? तूने क्यों लिया रे मिठाई का डिब्बा। तेरे बाबूजी को पता चलेगा तो कितने नाराज होंगे। मां ने कहा, ला मुझे दे, डिब्बा खोला तो घबरा गई ये क्या है।

मिठाई के डिब्बे में तरतीब से नोटों की गड्डियां रखी हुई थीं। मां बुरी तरह घबरा गई। ये क्या किया दीपू तूने। मिठाई नहीं ये तेरे बाबूजी के ईमान की कीमत लगाई है किसी ने। पहले से ही बीमार दीपू को डर के मारे उस दिन बुखार आ गया। शाम को बाबूजी घर आए तो हिम्मत जुटाकर मां ने ही कहा वो कोई आए थे, ये मिठाई का डिब्बा दे गए हैं, डिब्बे में मिठाई नहीं सौ सौ की गड्डियां रखी थीं। मां एहतियातन सफाई भी देने लगी। हमने कुछ नहीं देखा था पहले। दीपू भी क्या जानता था उन्होने दिया इसने ले लिया। माफ कर दो आप इसे। बाबूजी कुछ नहीं बोले। दीपू को बुलाया, और पुरानी छड़ी निकाली। हाथ आगे करो दीपू। दीपू हर मार के साथ बिलख रहा था। दर्द मां की आंखों में था, पर बाबूजी के चेहरे पर सिर्फ गुस्सा था। रोते रोते दीपू सो गया उस दिन। रात को बाबूजी ने मां से कहा तुम्हे क्या लगता है कि, मुझे कम तकलीफ नहीं हुई अपने ही बेटे को सजा देकर, हर छड़ी की मार अपने दिल पर महसूस कर रहा था मैं लेकिन इसलिए दी ये सजा की ये मार उसे पूरी जिंदगी उसे अपने ईमान की याद दिलाती रहेगी। उस पूरी रात वो नोटों से भरा हुआ मिठाई का डिब्बा घर में एसे रखा रहा। जैसे वो कोई एसी संदिग्ध वस्तु है। जिसके पास ना जाने की पुलिस समझाईश दिया करती है।

बाबूजी ने वो रिश्वत लौटा दी। लेकिन दीपू उस दिन के बाद से रोज उस नोटों से भरे डिब्बे को पैमाना बनाकर नापतौल करने लगा कि दफ्तर में पापा के इक्वल शुक्ला अंकल ने कितनी कमाई की, और बाबूजी कमाई तो दूर अपनी साईकिल भी नहीं बदल पाए। वो सोचता रहता था कि बाबूजी थोड़ी बहुत बेईमानी कर लेते तो शायद हमें इस किराए के मकान में ना रहना पड़ता। हमारे पास भी अपना घर होता। कई बार मां से झुंझला कर कह भी देता था, ये ईमानदार शर्मा जी का बेटा है ये सुन लेने से हमारी जरुरतें पूरी नहीं हो जाती। पर मां के पास भी दीपू की इन उलझनों का कोई जवाब नहीं था। अपने नियम के पक्के बाबूजी इनदिनों दफ्तर से लौटते थे तो लगता जैसे युध्द से लौट रहे हों। युध्द ही तो था। सरकारी दफ्तर के एक कोने से। एक टेबल से चल रहा था बाबूजी का आंदोलन। भ्रष्ट्राचार के खिलाफ उनकी वो लड़ाई जो वो अकेले ही लड़ रहे थे। उस दिन दफ्तर से लौटे ही थे। अभी चाय खत्म भी नहीं हुई थी कि गांव से चाचाजी का फोन आया। उस सिरे से क्या कहा जा रहा था बाबूजी के चेहरे पर उसे सुना जा सकता था। दादाजी की हालत फिर बिगड़ गई थी। चाचाजी बोले, डॉक्टर ने कहा है अब ऑपरेशन के बिना काम नहीं चलेगा। बाबूजी ने उन्हे तसल्ली दिलाई तू फिक्र मत कर मुन्ना मैं आता हूं।

बाबूजी ने चाचाजी को तो हिम्मत बंधा दी लेकिन खूद टूट गए थे। खुद अपने ही सवालों के घेरे में खड़े थे। कहां से लाउंगा पैसे। तनख्वाह में घर नहीं चला पाता। जीपीएफ का पूरा पैसा मुन्नी के ब्याह में पहले ही लगा चुका हूं। बाबूजी का ईलाज कैसे कराऊंगा। दादाजी को घर ले भी आए। लेकिन फिर उस दिन के बाद हर दिन इसी उलझन में गुजरता कि पैसे का इंतजाम कहां से होगा। दफ्तर में केवल ठाकुर अंकल थे, बाबूजी के दोस्त और उनके पर्सनल एडवाइजर। ठाकुर साहब को जब बाबूजी ने अपनी मुश्किल बताई उन्होने मिनिट लगाए बिना कह दिया, तुम सुनते कहां हो शर्मा किसी के काम के बदले अगर थोड़ा बहुत कुछ ले लोगे। कमा लोगे तो कोई बुराई नहीं है। और अब तो तुम्हारी जरुरत भी है। किस्मत से इतनी अच्छी सीट भी मिली है तुम्हे। अरे मैं कहता हूं कि ज्यादा नहीं दो लाइसेंस बना दो। बाबूजी के ऑपरेश्न का इंतजाम हो जाएगा। नियम कायदों से घर नहीं चलते शर्मा। बाबूजी ने खामोशी से सुना और अपनी सीट पर लौट आए। अभी काम शुरु ही किया था कि फिर वही शख्स सामने खड़ा था। नमस्कार शर्मा जी, मंत्री जी के पीए हैं ना पाण्डे जी उन्होने भेजा है आपके पास। ये चिट्ठी दी है देख लीजिए। और ये लिफाफा भी। कई दिनों से लटका है शर्मा जी। अब तो करवा ही दीजिए। बिना कलेक्टर की रिपोर्ट के एक आदतन अपराधी को कैसे बंदूक का लाईसेंस दे दूं, ये तो मुझसे नहीं होगा, बाबूजी अभी ये सोच ही रहे थे कि हाथ में वो लिफाफा आ गया। जिसे कागजात समझ कर बाबूजी ने रख लिया था। खोल कर देखा तो पांच सौ और हजार के नोट की गड्डी रखी थी। इतने पैसे होते मेरे पास तो बाबूजी का इलाज हो जाता।

फिर ख्याल आया, कि जिसने ईमान का ये संस्कार दिया उनकी जिंदगी की सलामती के लिए बेईमान भी हो जाऊं तो क्या,बाबूजी के दिमाग में अंधड़ चल रहा था जैसे। नहीं ईमान नहीं बेच सकता। किसी भी कीमत पर नहीं। फोन की घंटी से ये अंधड़ थम गया। उस छोर पर मां थी। आप जल्दी घर आ जाइये बाबा की हालत बिगड़ गई है। बाबूजी घर पहुंचे ठाकुर अंकल की कार से दादाजी को अस्पताल में भर्ती भी करवा दिया। लेकिन ईमानदारी का इम्तेहान फिर नए सवाल लिए खड़ा था। डॉक्टर ने कहा आपको अभी पचास हजार जमा कराने होंगे। तब आपरेश्न शुरु करेंगे। दवाई वगैरह के अलग। बाबूजी के पास कोई जवाब नहीं था। ठाकुर अंकल के कहने पर डॉक्टर ने आपरेश्न के लिए एक दिन की मोहलत दे दी कि लेकिन इस ताकीद के साथ कि कल तक पैसे किसी कीमत पर जमा हो जाने चाहिए। पहली बार बाबूजी का ईमान हिल गया था। घर जाकर उस लिफाफे में रखे नोट गिने। पूरे पैंतालीस हजार थे। एक मिनिट को लगा ले लेता हूं रिश्वत, अपने पिता की जिंदगी के लिए ही तो कर रहा हूं। रात में तय करके सोए कि सुबह लिफाफे की रकम डॉक्टर के हाथ में रख देंगे। लेकिन सुबह जागते ही फिर आंखे खुल गई जैसे। नहीं, पूरी जिंदगी ईमानदार रहे पिताजी का ईलाज इस काली कमाई से नहीं होगा। भगवान फिर चाहे जितने दिन बाबूजी को जिंन्दा रक्खे। अभी अस्पताल के लिए घर से निकले ही थे बाबूजी कि नुक्कड़ पर पुराने मोहल्ले के कन्हैयालाल मिल गए। कब से ढूंढ रहा आपका घर। अच्छा हुआ यहीं मिल गए। ये रखो भैय्या आपकी अमानत पूरे चालीस हजार हैं। मुन्नी की शादी के वक्त आपकी जरुरत थी तब नहीं लौटा पाया था। अब पैसे आए तो सबसे पहले आपकी उधारी चुकाने आ गया। ऐसे घूरो मत मुझे शक मत करो ब्याज समेत लौटा रहा हूं। बाबूजी की आंखे छलक आईं थीं। बाबूजी, ने कहा, ईमान की लड़ाई में ऊपर वाला भी साथ होता है। कन्हैया। याद रखना। मैं खुद इस बात की तस्दीक हूं।

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