संगम आस्था और प्रकृति के वैभव का प्रतीक है सोमनाथ मंदिर

गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में सागरतट पर स्थित सोमनाथ के मंदिर की ओर मैं किसी भक्ति भावनावश नहीं खिंचा चला गया था। बहुत लंबे समय से मेरे अंदर इस जिज्ञासा ने घर कर रखा था कि आखिर इस मंदिर या इस क्षेत्र में ऐसा क्या है जिसने महमूद गजनी समेत कई अन्य आक्रांताओं को भी आकर्षित किया। वे इस पर इस तरह लट्टू हुए कि उन्होंने इसको लूट-खसोटकर अपने घर ले जाना चाहा।

इतिहास के पाठक इस प्रश्न का जवाब बड़ी आसानी से दे जाते हैं, अरे भाई सोना, हीरे, जवाहरात थे जिनको लूटने के लिए वे इसको बार-बार खसोटते रहे। पर वास्तव में हम भारतीय संस्कृति की गहराई में अगर जाएं तो यह अनुमान लगाना सहज नहीं होगा कि यहां सोना, चांदी, जवाहरात या कहें कि अकूत भौतिक संपदा से भी परे ऐसा कुछ यहां की प्रकृति के अंदर रमता था जो न केवल आक्रांताओं बल्कि तमाम लोगों को अपनी ओर खींचता रहता था। कुछ ऐसा ही था जो कृष्ण को भी सैकड़ों कोस दूर मथुरा-वृंदावन से यहां खींच लाया था। द्वापर युग में यदुवंश के आपसी युद्ध जंजाल से छुटकारा पाने के लिए कृष्ण भी शांति की खोज में अपने जीवन के अंतिम दौर में यहीं आ बसे थे।

दूर हुई थकान

जिन दिनों मैंने गुजरात में स्तिथ सोमनाथ की यात्रा की थी उन दिनों मैं कोलकाता में था। वहां से मैंने अहमदाबाद के लिए अहमदाबाद एक्सप्रेस पकड़ी थी। ये गाड़ी लगभग 45 घंटे का समय लेती है। जो लोग जल्दी पहुंचना चाहते हैं उनको थका देने वाली यात्रा से थोड़ी परेशानी हो सकती है। इतनी लंबी यात्रा की थकान के बाद आराम और शांति की जरूरत होती है। ऐसे में अगर स्टेशन के बाहर खड़े होने पर शरीर से 10 सेंटीमीटर की दूरी से 8-10 ऑटोरिक्शा सांय-सांय करके निकल जाएं तो थकान थोड़े चिड़चिड़ेपन को आमंत्रित करने लगती है। लेकिन ऑटोरिक्शा वालों के दोस्ताना व्यवहार ने मेरी सारी थकान पल भर में ही मिटा दी थी। ऑटोरिक्शा अहमदाबाद की बहुमंजिली इमारतों, हवेलियों, गलियों और सड़कों को पार करता हुआ अपने गंतव्य होटल की तरफ बड़ी तेजी से बढ़ रहा था। हालांकि ऑटोरिक्शा वाले ने मुझे सस्ते-महंगे बीसियों होटलों और लॉजों के नाम एक सांस में गिना दिए थे, पर मैंने उसको उसी होटल में ले चलने के लिए कहा जहां ठहरने के लिए मेरे शुभचितंकों ने मुझे सुझाया था।

दूसरे दिन सोमनाथ के लिए अहमदाबाद से सोमनाथ मेल पकड़ने के बजाय पहले मैं नल सरोवर के लिए निकल पड़ा। चूंकि नल सरोवर अहमदाबाद से महज एक ही घंटे की दूरी पर है, इसलिए मैंने सोचा कि पहले इस सरोवर को ही देख लिया जाए। प्रकृति निर्मित यह सुंदर क्षेत्र अक्सर गुजरात आने वालों की नजर में अनदेखा रह जाता है। इसके बारे में मैं आपको आगे बताऊंगा। बाद में जब हमें सोमनाथ जाना हुआ तो वहां के लिए हमने सोमनाथ के निकटतम रेलवे स्टेशन वेरावल के लिए सासनगीर से बस ली थी। असल में सोमनाथ को जोड़ने वाला वेरावल ही है। अगर गीर की तरफ से हम आते तो हमें सोमनाथ के लिए सीधी बस मिल सकती थी और तब हमें वेरावल में बस बदलनी नहीं पड़ती। वेरावल से सोमनाथ की दूरी सिर्फ छह किलोमीटर है, जिसे अगर हम चाहते तो बस के अलावा टेम्पो, ऑटो या साइकिल रिक्शा से भी तय कर सकते थे।

इतिहास के पन्नों में

सोमनाथ का इतिहास काफी प्राचीन है और इतिहास की पुस्तकों में सोमनाथ का जितना उल्लेख है उतना शायद किसी अन्य धार्मिक स्थल का नहीं है। मार्कोपोलो ने भारत प्रवास का वर्णन अपनी पुस्तक में किया है और उसमें सोमनाथ का उल्लेख स्पष्ट रूप से आया है। हजारों मील दूर अरब से आए इतिहासकार अल्बेरूनी ने भी सोमनाथ के मंदिर और इस क्षेत्र की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।  अल्बेरूनी के यात्रा वृत्तांत के अनुसार उस समय यहां स्थित देवमंदिर में कुल 300 संगीतकार, 500 नर्तकियां और सैकड़ों कला विशेषज्ञ रहते थे।

अल्बेरूनी ने आगे लिखा है कि यहां एक विशाल समुदाय पूजा-अर्चना में व्यस्त रहता था। लगभग 2000 पुरोहित-पंडितों को इस विशेष कार्य के लिए लगाया गया था और वे पूजा-स्तुति के लिए हमेशा कश्मीर से फूल और गंगा से जल की व्यवस्था करने में लगे रहते थे। आज इस तरह की भव्यता का कुछ अंश दक्षिण के मीनाक्षीपुरम, चिदंबरम और रामेश्वरम के मंदिरों में दिखाई पड़ता है, पर सोमनाथ का वैभव और मौलिकता नष्ट होने के बाद आज वहां ऐसी भव्यता की कल्पना करना मुश्किल है।

कम नहीं हुआ महत्व

गजनी के सुल्तान महमूद ने ग्यारहवीं सदी में सोमनाथ पर हमला किया था। मंदिर ध्वस्त हो गया और महमूद उसकी संपत्ति, स्वर्ण, रत्न आदि लूटकर साथ ले गया। शिव के इस मंदिर में एक शिवलिंग शुद्ध स्वर्ण का था जिसे महमूद अपने साथ ले गया। महमूद ने काफी कुछ लूटा था, पर मंदिर में इतना वैभव था कि वह सब कुछ नहीं ले जा सका। इसके बाद कई हमले किए गए और जो भी लुटेरा आया उससे जितना हो सका वह उसकी संपदा लूट कर ले जाता रहा। सोमनाथ मंदिर पर आक्रमणों से मंदिर का भौतिक वैभव जरूर कम होता गया, पर इसका धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व तनिक भी कम नहीं हुआ। वह यथावत बना रहा।

इतिहासकारों के अनुसार सोमनाथ मंदिर का निर्माण चंद्रगुप्त मौर्य के मंत्री विष्णु शर्मा यानी चाणक्य के हाथों हुआ था और फिर कई बार लुटने और विध्वंस सहने के बाद एक दीर्घकालीन अंतराल के बाद छठवीं बार मंदिर का निर्माण 1706 में इंदौर की महारानी अहिल्या बाई ने करवाया। इसके पूर्व यहां पांचवीं बार बनवाए गए मंदिर को दिल्ली के सम्राट औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था। अहिल्या बाई के ढाई सौ वर्ष बाद 1950 में सागर के तट पर अतीत के मूल मंदिर के स्थान पर आदिब्रह्मशील पर बेले पत्थर के नए मंदिर का निर्माण करवाया गया। यहां नए सिरे से देवी-देवताओं की प्रतिष्ठा की गई। बारह ज्योर्तिलिंगमों में अन्यतम और वृहत्तम शिवलिंग यही सोमनाथ है। इस मंदिर में विष्णु का विग्रह भी प्रतिष्ठित है। यहां जनसाधारण को मूर्तियों का स्पर्श करने की अनुमति नहीं है। लोगों को दूर से ही इन विग्रहों के दर्शन करने पड़ते हैं।

जहां हुआ कृष्ण का महाप्रयाण

आज सोमनाथ का मंदिर जहां प्रतिष्ठित है वह स्थान प्राचीन काल में सोमनाथ पाटण के नाम से जाना जाता था। इसे कभी प्रभाप पाटण या देव पाटण के नाम से भी पुकारा जाता था। देव पाटण का उल्लेख महाभारत में भी है। यह प्रभाप पाटण वही है जहां यादवों ने खुद को मारा था और जहां कृष्ण एक भील के शिकार हुए थे। सोमनाथ से थोड़ी ही दूरी पर जाकर हमने भालकतीर्थ को भी देखा। पारंपरिक रूप से ऐसा माना जाता है कि भालकतीर्थ ही वह स्थान है जहां कभी भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शरीर का त्याग किया था।

जहां स्वस्थ हुए सोम

ऐसा कहा जाता है कि दक्ष प्रजापति की 27 कन्याएं थीं। उन्होंने अपनी प्रत्येक कन्या का नामकरण नभमंडल के 27 नक्षत्रों के आधार पर किया था। अपनी सभी कन्याओं का विवाह दक्ष प्रजापति ने सोम देवता यानी चंद्रमा से कर दिया था। हालांकि सोम इनमें से सबसे ज्यादा रोहिणी पर मोहित थे। बहुत दिनों तक उपेक्षा सहने के बाद अन्य बहनों से जब नहीं रहा गया तो उन्होंने इसकी शिकायत अपने पिता दक्ष से कर डाली। दक्ष ने तब सोम को आदेश दिया कि वह सभी बहनों को बराबरी का दर्जा दें, पर सोम ने यह आदेश नहीं माना। इस पर कु्रद्ध होकर प्रजापति ने सोम को शाप दे डाला।

शाप के परिणामस्वरूप सोम धीरे-धीरे काया से क्षीण होने लगे। अपने इस रोग और शाप से छुटकारा पाने के लिए सोम ने हर संभव तीर्थस्थानों का भ्रमण किया, किंतु इस पर कोई फर्क नहीं पड़ा। अंत में उन्होंने बड़े मनोयोग से भगवान शिव की आराधना की। भगवान शिव प्रसन्न हुए और तब उन्होंने सोम को दर्शन दिया। सोम की प्रार्थना द्रवित होने के बावजूद भगवान शिव दक्ष प्रजापति के शाप को तोड़ नहीं सकते थे। उन्होंने दक्ष प्रजापति के शाप का सम्मान करते हुए सोम को कहा कि पहले पंद्रह दिन सोम क्षीण होते जाएंगे, पर अगले पंद्रह दिनों तक वह धीरे-धीरे पूर्ण स्वास्थ्य को प्राप्त करेंगे। साथ ही उन्होंने यह शर्त भी जोड़ी कि सोम को यह स्वास्थ्य लाभ तभी होगा तब वह निरंतर सरस्वती नदी में स्नान करेंगे। कहा जाता है कि सोम ने अगले पंद्रह दिनों तक प्रतिदिन सरस्वती में स्नान कर पूर्ण स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर अपनी सुंदरता को वापस पा लिया। आज भी प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष में चंद्रमा की काया का क्षीण होना और फिर शुक्ल पक्ष में उसका विकास किंवदंतियों में इसी घटना का परिणाम बताया जाता है। प्रभास पाटण वही स्थान है जहां सोम पूरी तरह स्वस्थ हो सके थे। तब सोम ने ही शिव की स्तुति में एक स्वर्ण मंदिर की स्थापना की और उसका नाम रखा सोमनाथ।

एक झलक आदिवासी संगीत की

गुजरात में प्रवेश करने के बाद सबसे पहली चीज जिसने मुझे बताया कि मैं किसी दूसरे प्रदेश में पहुंच गया हूं, वह थी भाषा। गुजराती में सबसे पहला वाक्य जो मैंने सीखा, वह था, केम छो यानी कैसे हो। भाषा के बाद गुजराती संगीत से मेरी मुलाकात सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में घुसने से पहले ही हो गई। मुख्य द्वार से जरा ही पहले एक आदिवासी इकतारे पर धीरे-धीरे गा रहा था, थापे वारी वारी जावा। पांच मिनट उसके मधुर संगीत में डूबने के बाद मैं अपने सफर की सारी थकान से मुक्ति पा गया। मेरा मन तो यह हुआ कि मैं इस संगीत को बस सुनता ही रहूं। मेरी यह इच्छा उस वक्त तो पूरी नहीं हुई पर मुझे यह पता नहीं था कि भगवान मेरी इतनी जल्दी सुन लेगा। मुझे पता लगा कि पास ही सागर किनारे एक जगह गुजराती आदिवासियों का उत्सव चल रहा है, जहां मुझे गुजराती संगीत और नृत्य अपने मूल रूप में मिलेगा। गरबा, डांडिया वाला संगीत या नृत्य नहीं बल्कि वह प्राचीन संगीत और कला जिसने बाद में इस गरबा-डांडिया जैसे लोकप्रिय संगीत को जन्म दिया। मैंने तय किया कि आदिवासियों के उस उत्सव का आनंद मैं जरूर लूंगा।

सागर के किनारे मंदिर से करीब 400 मीटर की दूरी पर एक विशाल दायरे में इस कला उत्सव का आयोजन किया जा रहा था। मैदान के एक हिस्से में कनातों-तंबुओं में आने वाले आदिवासी कलाकारों के रुकने के लिए इंतजाम किया गया था और दूसरी तरफ खाने-पीने तथा कई चीजों की बिक्री की नुमाइश थी। मैदान के तीसरे हिस्से में एक बड़ा सा मंच था, जिस पर संगीत नृत्य के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे थे। दक्षिण गुजरात के भड़ौच, सूरत और बड़ौदा पूर्व के पंचमहल, पूर्वोत्तर के साबरकांठा और उत्तर गुजरात के बनासकांठा जिले से आए आदिवासी अपने संगीत, कला के प्रदर्शन के लिए वहां जमा हुए थे और इसका प्रायोजन एक नामी दवा कंपनी कर रही थी। नृत्यों में हालेणी, मांडवा, घेरैया, ढाक्या, काथोड़ी नाम से विभिन्न नृत्य थे जिनको होली, दीवाली या शादियों के अवसर पर प्रस्तुत किया जाता है। वाद्यों में ढाक वाद्य था जिसे पैरों पर रखकर हाथ से बजाया जाता है। तारपाकर तानपूरे की तरह का एक तारवाद्य है और पावरी वाद्य बीन तथा तुरही का संयुक्त रूप है।

असर शहर का

आदिवासियों के नृत्यों से लय, ताल, उल्लास और जीवंतता दृष्टिगोचर होती है, लेकिन इसमें शहरी संस्कृति के तत्व घुसते जा रहे हैं। यह तथ्य हमें इस प्रदर्शन के बीच स्पष्ट दिखाई दिया। आदिवासी स्त्रियां पारंपरिक घर के बुने व कढ़े कपड़े न पहनकर कस्बों में मिलने वाली छापे वाली साड़ियां पहनने लगी हैं। स्त्रियों के हाथों में बाजार में बिकने वाले रूमाल आम तौर पर देखे जा सकते हैं। चोटी में बंधे रिबन भी शहरी संस्कृति की ही देन हैं। मैंने कुछ आदिवासियों से नृत्य के बारे में कुछ नई चीजें जानने की कोशिश की तो एक आदिवासी युवक ने युवती से कहा कि तुम इनको डिस्को करके दिखाओ। आदिवासियों में आ रहे ये परिवर्तन कोई बाहर से थोपे नहीं जा रहे हैं। ये परिवर्तन विकास की प्रक्रिया के तहत स्वाभाविक रूप से आ रहे हैं। वास्तव में यह शहरों और शहरी जनजीवन से उनके बढ़ते संपर्क का परिणाम है। साबरकांठा इलाके से आए एक आदिवासी ने बताया कि जब वह शहर की तरफ आता है तो स्त्रियों की तरफ से टूथपेस्ट, साबुन, लिपिस्टिक और प्लास्टिक से बनी चीजों की मांग आती है।

यह बहुत हद उस सोच का परिणाम है जिसने आदिवासियों को नुमाइशी चीज में बदल दिया है। आदिवासियों को देखने की वस्तु बनाने की प्रवृत्ति हमने पश्चिमी देशों से सीखी है। पचास वर्ष पहले कितने लोग आदिवासियों के बारे में जानते थे, कितने लोग जानने की इच्छा रखते थे? सन् 1945 से पहले कुछ विदेशी शोधकर्ता आए और वापस अपने देश पहुंचकर बड़ी-बड़ी किताबें लिख गए। उसका यह प्रभाव हुआ कि विदेशियों ने भारतीय कला और संस्कृति में जबरदस्त रुचि दिखानी शुरू कर दी। किताबें और लेख लिखे जाने लगे द ग्रेट इंडियन ट्रेडिशन, द ग्रेट इंडिया। कला संस्कृति के विदेशी शोधकर्ता अपने-अपने माइक्रोस्कोप लेकर भारत आने लगे। जंगलों और गांवों में छिपी संस्कृति को खोज-खोज कर निकाला जाने लगा। सरकारी मशीनरी और व्यापारिक तबके ने गांवों और जंगलों पर धावा बोल दिया। आर्थिक और सामाजिक शोषण शुरू हुआ। दूसरी तरफ कला संस्कृति के ठेकेदारों ने भी गांवों और जंगलों की संस्कृति पर धावा बोल दिया। जब विदेशी किसी चीज की तारीफ कर रहे हैं तो हम क्यों न करें? अतः देशी शोधकर्ता भी जुट गए। क्योंकि हमारा वर्ण विभाजन आदिवासियों को शूद्र और नीचा घोषित करता था, इसलिए न तो हम आदिवासियों के पास गए और न उनको अच्छा ही समझा। अब विदेशियों की देखा-देखी उत्सव और महोत्सव सजाने में जरूर जुट गए हैं।

हवा में तैरती खुशबू

अहमदाबाद से नल सरोवर के लिए बसें आसानी से मिल जाती हैं। निजी साधन से भी यह केवल एक घंटे का सफर है। इस सरोवर की तरफ प्रस्थान करते ही स्वच्छ वातावरण की खुशबू हवा में तैर जाती है। जैसे-जैसे मैं नल सरोवर क्षेत्र की ओर बढ़ रहा था, मिट्टी और वातावरण में हो रहा बदलाव स्पष्ट रूप से नजर आ रहा था। भूमि धीरे-धीरे समतल होती जा रही थी। पानी के आसपास जहां भी नजर जाती थी,भूमि सपाट नजर आती थी। सपाट और समतल ऐसी कि मानो बिलियर्ड की बहुत बड़ी मेज हो। कहने के लिए भले ही नल सरोवर को सरोवर की श्रेणी में रख दिया गया है, पर नल सरोवर को किसी ताल या सरोवर या झील की परिभाषा में बांधना इसको निश्चित दायरा देना होगा जो वास्तव में इसके साथ अन्याय होगा। असल में नल सरोवर एक ऐसी झील या सरोवर है, जिसको किनारे बांध नहीं पाए हैं। सड़क से हटकर कुछ दूर पैदल चलने के बाद जब हम पानी की तरफ बढ़ रहे थे उस समय हमें यह पूरा विश्वास था कि हम एक ऐसे सरोवर की तरफ प्रस्थान कर रहे हैं जहां एक किनारा मिलेगा और जहां से हम नौकायन के लिए प्रस्थान कर सकेंगे या फिर तरह-तरह के पक्षियों के साथ यहां की दृश्यावली का आनंद उठा सकेंगे। पर नल सरोवर का क्षेत्र हमारी आशा के बहुत विपरीत निकला। जगह-जगह पानी का जमावड़ा था और कई सारे जलाशय अचानक ही उभर आए। हमें बताया गया कि सब ओर काफी पानी ही पानी है लेकिन ज्यादातर उथला ही। गहराई चार-पांच फीट से ज्यादा नहीं है।

नल सरोवर का इलाका नक्शे में देखने पर अरब सागर के समुद्र से काफी दूर मालूम पड़ता है पर असल में यह सरोवर कभी समुद्र का एक हिस्सा हुआ करता था। अभी भी कभी-कभी यह हिस्सा केम्बे की खाड़ी के जरिए समुद्रीय ज्वार के दिनों में समुद्र से संगम करने का सफल प्रयास कर लेता है और जब-जब ऐसा होता है तब समुंदर की ढेर सारी मछलियों का एक तबका नल सरोवर की सैर के लिए निकल पड़ता है। समंदर से संगम के बाद नल सरोवर का पानी काफी नमकीन हो जाता है और पीने लायक नहीं रह जाता। बारिश के पानी के बाद ही इसका नमकीनपना गायब होता है। इस तरह वर्ष में लगभग तीन महीने ही नल सरोवर का पानी पीने योग्य रहता है। बरसात के ही दिनों में पड़ोस में बहने वाली भगोआ और भामिनी नाम की दो सरिताओं का जल भी उफान के बाद नल में बिखर जाता है।

पक्षियों का अभयारण्य

नल सरोवर का पानी इतना साफ रहता है कि इसमें विचरने वाली मछलियां और इसमें उग आई विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। खाने-पीने की प्रचुरता और पानी की स्वच्छता दूर देशों से सैकड़ों प्रकार के पक्षियों को अपनी ओर खींच लेती हैं। दिसंबर के बाद अप्रैल माह तक यहां तरह-तरह के पक्षियों का मेला जैसा लगा रहता है जिनको मछलियों और वनस्पतियों के रूप में पूरे समय भोजन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता है।

लगभग 35 वर्ष पहले 1969 में नल सरोवर को पक्षियों का राष्ट्रीय जल विहार या अभयारण्य घोषित किया गया था। हमने यहां की सैर फरवरी माह में की थी और उन दिनों रंग-बिरंगे फ्लेमिंगों से लेकर सफेद सारस, हवासिल, हंस, बगुले, हिरण, एभोमंट खूब दिखाई पड़े। विशेषज्ञों की राय में यहां 300 से भी ज्यादा प्रकार के पक्षी विचरण करते हैं जिनके दर्शन के लिए दिसंबर से अप्रैल माह के बीच खूब सारे सैलानी यहां सैर-सपाटे के लिए आया करते हैं। सांझ-सबेरे हलकी मध्यम गति से पानी पर सरकती नौकाओं से पक्षियों का कलरव और उन्हें देखने से जो परमानंद मिलता है वह अवर्णनीय है। पूरे चांद की रात्रि को शीतल चांदनी के बीच तारों से छिटके आकाश के दौरान यहां का सौंदर्य इतना आकर्षक, नैसर्गिक और मनोरम होता कि वह किसी की भी नींद चुराने की सामर्थ्य रखता है।

पक्षी ही नहीं जंगली पशु भी

जब हमने नल-सरोवर अभयारण्य के बारे में सुना था तो हमने इस बात की जरा भी कल्पना नहीं की थी कि भांति-भांति के पक्षियों के अलावा यहां कुछ और भी आकर्षण का केंद्र हो सकता है। लगभग एक सौ बीस वर्ग किलोमीटर में फैले इस जलमग्न इलाके का सुदूर उत्तरीय क्षेत्र जग प्रसिद्ध कच्छ की खाड़ी से लगता है। गर्मियों के दौरान के दूर-दराज से शीतलता लेने के लिए कच्छी जंगली गधे भी नल सरोवर की तरफ खिंचे चले आते हैं। सुबह-सबेरे जंगली झुरमुटों से सियार और लोमड़ी नजर आ जाते हैं।

सरोवर के चारों ओर दूर-दूर तक पानी के बीच-बीच में छोटे-छोटे भूमि के टुकड़े दिखाई पड़ते हैं जिन्हें टापू कहना ज्यादा उचित होगा। इन टापुओं पर बंजारे अपना अस्थायी बसेरा डाल लेते हैं। सरकंडियों ओर सूखी घास-फूस से बनी इनकी झुग्गियां नीले पानी की पृष्ठभूमि में किसी कला का नमूना नजर आती हैं। ये बंजारे भैंस पालन करके और उनका दूध आसपास के गांवों में बेचकर ही अपना जीवन यापन करते हैं। नल सरोवर के आसपास रहने वालों को सरोवर से मछली पकड़ने की अनुमति है और वे सरोवर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से की ओर आने-जाने के लिए छोटी-छोटी नौकाओं का उपयोग करते हैं।

हालांकि सरोवर को राष्ट्रीय अभयारण्य घोषित किया गया है जिसका अर्थ कानूनी और सामाजिक रूप से यह है कि यह स्थान पक्षियों या पशुओं के लिए भयमुक्त होना चाहिए लेकिन हमने अपने छोटे से प्रवास में पाया कि मानव अपनी क्रूरता और धूर्तता से बाज नहीं आता है। अहमदाबाद और आसपास के शहरों से आने वाले लोग जो इस झील को पिकनिक झील से परे अन्य कोई स्थान नहीं समझते, प्लास्टिक और टिन के डिब्बों के रूप में अपनी निशानियां इधर-उधर छोड़ जाते हैं। अपने भ्रमण के दौरान हमने एक परिवार के सदस्यों को स्टीरियो बजाकर नाचते-कूदते भी देखा जिसकी ध्वनि इस शांत वातावरण में दो किलोमीटर की दूरी से सुनी जा सकती थी। इसका परिणाम साफ नजर आ रहा था, फ्लेमिंगों और हंसों को उनके गीत-संगीत में कोई दिलचस्पी नहीं थी। अगर मनुष्यों का यह दल अपने संगीत में मस्त अपनी दुनिया में खोया हुआ था तो पक्षी भी उनसे मीलों दूर जाकर अपनी अलग दुनिया में व्यस्त दिख रहे थे। मानो ऐसी प्रजाति से उनका कोई वास्ता ही न हो।

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