आर्थिक सुस्ती के गंभीर असर

-सिद्वार्थ शंकर-

इस वित्त वर्ष की शुरुआत से ही आर्थिक सुस्ती देखने को मिल रही है। इसके चलते औद्योगिक उत्पादन और रोजगार से लेकर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर बुरा असर पड़ा है। कई महीने तक ऑटोमोबाइल सेक्टर भी सुस्ती का सामना करता रहा। हालांकि त्योहारों की वजह से इसमें सुधार देखा गया है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने अब जो डेटा जारी किया जिसमें साफ देखा जा सकता है कि स्लोडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा है। अक्टूबर में बेरोजगारी की दर बढ़कर 8.5 प्रतिशत हो गई जो कि अगस्त 2016 के बाद सबसे ज्यादा है। यह सितंबर के मुकाबले भी 7.2 फीसदी ज्यादा है। सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक यह स्लोडाउन का असर है। इसके अलावा अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की तरफ से एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है, जिसके मुताबिक पिछले 6 सालों में करीब 90 लाख रोजगार के अवसरों में कमी आई है। इस रिपोर्ट को संतोष मेहरोत्रा और जगति के परीदा ने मिलकर तैयार किया है और इसे अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ सस्टेनेबेल एंप्लॉयमेंट की तरफ से प्रकाशित किया गया है। अक्टूबर में मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट पिछले दो साल में सबसे स्लो रहा। आईएचएस इंडिया के पैकेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स में भी गिरावट देखी गई। यह सितंबर में 51.4 थी जो कि अक्टूबर में घटकर 50.6 हो गई। एजेंसी 400 प्रोड्यूसर्स को शामिल करके सर्वे करवाती है जिसमें नए ऑर्डर, आउटपुट, जॉब, सप्लायर के डिलिवरी टाइम और स्टॉक परचेज के आंकड़े इक_े किए जाते हैं। यह सूचकांक अगर 50 के ऊपर होता है तो वृद्धि मानी जाती है वहीं 50 के नीचे आ जाने से बाजार में स्लोडाउन की स्थिति मानी जाती है। टैक्स कलेक्शन में भी सरकार को झटका लगा है। अक्टूबर में जीएसटी कलेक्शन गिरकर 95,380 करोड़ पर पहुंच गया। पिछले साल इस महीने में जीएसटी संग्रह 1,00,710 था। यह लगातार तीसरा महीना है जब जीएसटी 1 लाख करोड़ से कम है। आंकड़ों के मुताबिक इस वित्त वर्ष के पहले छह महीने में टैक्स कलेक्शन में ग्रोथ केवल 1.5 फीसदी की रही है जो कि 2009-10 के बाद सबसे कम है। बता दें कि अप्रैल-जून की तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 5 प्रतिशत दर्ज की गई जो कि 6 साल में सबसे कम है। जुलाई-सितंबर का डेटा 30 नवंबर में जारी किया जाएगा। निवेशकों के मुताबिक यह स्लोडाउन साल 2006 से भी लंबा है। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह की रिपोर्ट आई है, वह शुभ संकेत नहीं है। आर्थिक सुधार के सरकार के प्रयास असर नहीं दिखा रहे हैं और आम जनता पर भार पड़ता जा रहा है। यह वक्त सरकार के लिए चेतने वाला है। अगर अब भी मंदी को दरकिनार किया जाता रहा तो आने वाला कल और भी भयावह होगा।

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