व्यंग्य : “नैबर सैड, यू हैप्पी”

-एस.एन खरे-

अब भाई यह तो तय है कि हर आदमी सुखी रहना चाहता है, खुशी से रहना चाहता है, पर इसके लिए पहली शर्त यही है कि आपका पड़ोसी दुखी रहे! मान लीजिए आप मारूति ऑल्टो कार का आनंद ले रहे हैं और मज़े में हैं पर अगर आपके पड़ोसी ने होंडा सिटी ख़रीद ली तो फिर हो गया न आपका सुख और आनंद नदारद? दरअसल मौज़ और प्रसन्नता कहीं तुलनात्मक अधिक होते हैं, और पड़ोसी से बड़ा प्रतिव्दन्व्दी कौन हो सकता है? पड़ोसी का लड़का फेल हो गया, तो फिर आपकी खुशी के क्या कहने! फिर चाहे आपका बेटा थर्ड क्लास में ही पास क्यों न हुआ हो, तोभी आप पूरी तरह से गदगदायमान ही नज़र आएंगे, क्योंकि सवाल आपके बेटे के कमज़ोर रिजल्ट का नहीं, बल्कि पड़ोसी के बेटे का बंटाधार होने का है!और वही आपकी खुशी का राज़ भी है! वैसे इस मामले में इंडियन सबसे ज़्यादा सेंसिटिव होते हैं! भूकम्प आया तो आपके मकान में दरारें आ गईं, तो आप दुखी हो गए! पर जैसे ही आपको पता चला कि आपके घर में तो दरारें आई हैं, पर पड़ोसी शर्मा जी की तो ऊपरी मंज़िल ही धराशायी हो गई है, तो यह पता चलते ही आप अपना सारा दुख भूलकर आनंद व हर्ष की दुनिया में सैर करने लगते हैं! पड़ोसी का कोई नुकसान हो गया, उन्हें कोई परेशानी आ गई तो ये बातें आपको उत्फुल्लता अवश्य देंगी, आपके जीवन में ऊर्जा का संचार भी करेंगी! दरअसल भारतीयों की खुशी की साइकोलॉजी इसी हक़ीक़त पर टिकी हुई है कि आपका पड़ोसी दुखी रहे, कष्ट में रहे, परेशानी में घिरा रहे, मुसीबत में फंसा रहे। पड़ोसी के यहां चोरी हो जाए, तो आपकी बांछें खिल जाती हैं! हालांकि आप मन ही मन मुस्काते हुए झूठी सहानुभूति दिखाने उसके घर ज़रूर जाएंगे, क्योंकि उसमें आपका आनंद दुगना जो हो जाएगा न! तो कहने का लब्बोलुआब यही है कि आपकी खुशी आत्मनिर्भर नहीं है, बल्कि पड़ोसी के दुख/परेशानी/कष्ट/पीड़ा/समस्या पर अवलंबित है! इस मामले में महिलाओं की भावुकता व संवेदनशीलता के तो कहने ही क्या! मान लीजिए आपने अपनी बीवी को 2000/ रुपए की प्योर सिल्क की साड़ी लाकर दी, और उम्मीद की कि वह खुश होगी! तो यह सच है कि वह खुश हो भी जाएगी, पर अगर कहीं उसे पड़ोसन 3000/ की साड़ी पहने नज़र आ गई, तो उसी क्षण उसकी खुशी काफूर हो जाएगी, और उसका स्थान मायूसी ले लेगी! इसीलिए तो महिलाएं प्राय: अवसादग्रस्त दिखाई देती हैं! वैसे उनमें सहनशक्ति तो ज़बरदस्त होती है पर पड़ोसी के सुख के आगे उनकी यह शक्ति धड़ाम से औंधे मुंह जा गिरती है! तो यह न केवल सार्वजनिक सत्य है बल्कि प्रमाणित यथार्थ भी है कि आप तभी सुखी रह सकते हैं जबकि आपका पड़ोसी दुखी रहे! अगर पड़ोसी के पास हमसे बेहतर फ्रिज, ए.सी., मकान और सुविधाएं हैं तो हम ऐसे में कभी भी सुखी नहीं रह सकते! तो कामना कीजिए कि आपका पड़ोसी न केवल आपसे कमतर रहे, हीन रहे, बल्कि दुखी भी रहे! यदि ऐसा हुआ तभी आपकी लाइफ चकाचक होगी, और खुशियों से लबालब भी होगी। मतलब “नैबर सैड, यू हैप्पी।”

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