युवाओं में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति

  • (विश्व आत्महत्या निवारण दिवस, 10 सितम्बर पर विशेष)
  • प्रभुनाथ शुक्ल

त्महत्या जिंदगी का सबसे प्राणघातक फैसला है। जीवन में कई स्थितियां ऐसी बनती हैं जब इंसान उससे लड़ नहीं पाता। जब उसे समस्या का निदान नहीं दिखता तो उसके मन में आत्महत्या की प्रवृत्ति जाग्रत होने लगती है। आत्महत्या के संबंध में यह तर्क मनगढ़ंत हैं कि पढ़े-लिखे लोग आत्महत्या कम करते हैं या नहीं करते। भारत में कई उदाहारण हैं जहां सफल व्यक्ति अपनी जिंदगी से पस्त होकर ऐसा कदम उठाता है। जिसके बारे में आम आदमी यह सोच भी नहीं सकता है कि संबंधित व्यक्ति इस तरह का भी फैसला ले सकता है। देश में कई आईएएस, आईपीएस, राजनेता, फिल्मी हस्तियां आत्महत्या कर चुके हैं। दक्षिण भारत में ‘कॉफी किंग’ के नाम से मशहूर वीजी सिद्धार्थ इसका ताजा उदाहरण हैं। जिन्होंने भारी आर्थिक नुकसान की वजह से आत्महत्या कर ली। आत्महत्याओं को हम समय रहते रोक सकते हैं, लेकिन हमारे भीतर ऐसी सोच पैदा नहीं होती है। आधुनिक जीवन शैली बेहद प्रतिस्पर्धात्मक हो चली है। व्यक्ति हर बात को अपनी सफलताओं और असफलताओं से जोड़ देता है और निराश होने पर आत्महत्या करने से नहीं हिचकता। दुनिया में हर साल 10 लाख लोग आत्महत्या करते हैं। विश्व में होने वाली कुल आत्महत्याओं का 21 फीसदी भारत में होता है। लोगों को आत्महत्या से बचाने के लिए 2003 से पूरी दुनिया में 10 सितम्बर को विश्व आत्महत्या निवारण दिवस मनाया जाता है। मानोचिकित्सक मानते हैं कि सामाजिक जागरुकता की वजह से ऐसी घटनाओं को कम किया जा सकता है। दुनियाभर में व्यस्तताओं और कार्य के मानसिक दबाव के साथ जिंदगी का मूल्याकंन अर्थ से जुड़ गया है। इसकी वजह से युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति सबसे अधिक है। विदेशों में आत्महत्या करने वालों में सबसे अधिक बुजुर्ग हैं लेकिन भारत में यह स्थिति उलट है। यहां युवा और महिलाएं अधिक संख्या में आत्महत्या करते हैं। लोगों को आत्महत्या से बचाव के लिए इस वर्ष नया नारा दिया गया है- ‘आत्महत्या से बचाव के लिए मिल कर काम करें।’ भारत में प्रति एक लाख व्यक्ति में 11 व्यक्ति आत्महत्या करते हैं जबकि जापान में यह आंकड़ा 20 व्यक्ति का है। भारत में आत्महत्याओं के मामले में महाराष्ट्र पहले नंबर पर है। इसके बाद की पायदान पर तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल,  कर्नाटक और मध्यप्रदेश शामिल हैं। भारत में कुल आत्महत्याओं में 51 फीसदी की हिस्सेदारी इन्हीं पांच राज्यों की है। पुद्दुचेरी में आत्महत्या की दर सबसे अधिक है। वहां प्रति 10 लाख में 432 लोग आत्महत्या करते हैं जबकि जबकि सिक्किम में यह दर 375 की है। एक शोध से पता चला है कि भारत में पुरुषों से चार गुना अधिक महिलाएं आत्महत्या करती हैं। दक्षिण भारत में दूसरे राज्यों की अपेक्षा शिक्षा दर और लिंगभेद बेहद कम होने के बाद भी यहां महिलाओं की आत्महत्या दर अधिक है। पूरी दुनिया में मौत के कारणों में दसवां कारण आत्महत्या यानी सेल्फ मर्डर का है। इंसान के भीतर जीवन की असफलताओं की वजह से नकारात्मक विचार पैदा होने लगते हैं। कार्यक्षेत्र में विफल होने की वजह से वह अपना मूल्याकंन कम कर आंकता है। जिसकी वजह से वह ऐसे कदम उठाता है। आत्महत्या के मुख्य कारणों में जीवन के प्रति निराशावादी सोच है। यही जिंदगी खत्म करने के लिए प्रेरित करती है। समस्या का समाधान न दिखाई देना, अचानक व्यवहार में परिवर्तन, एकांतवास करना और मित्रों व परिवार से दूर रहना, नशीली वस्तुओं और दवाओं का सेवन करना, अत्यधिक जोखिम भरे कार्य करना, जिंदगी के प्रति उदासीन नजरिया रखना आत्महत्या के मुख्य कारक हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी में एआरटी सेंटर आईएमएस में तैनात वरिष्ठ परामर्शदाता एवं मनोचिकित्सक डा. मनोज कुमार तिवारी के विचार में इस प्रवृत्ति को सामाजिक सोच में बदलाव लाकर रोका जा सकता है। अभियान चलाकर हद तक सफलता प्राप्त की जा सकती है। अगर कोई व्यक्ति आत्महत्या की सोचता है तो उसके भीतर तीन प्रमुख कारण उभरते हैं। समय रहते उस बदलाव को समझ कर व्यक्ति की सोच को बदला जा सकता है। व्यक्ति में निराशावादी सोच पैदा होने लगती है। उसकी दैनिक जीवनचर्या बदल जाती है। डा. तिवारी के अनुसार आत्महत्या के दस प्रमुख कारण हैं। जिसमें इंसान में नशे और जुए की लत, मानसिक अवसाद, दवाओं का गलत उपयोग, गंभीर बीमारी जैसे एड्स, कैंसर, ह्दय रोग और दूसरी असाध्य बीमारियां शामिल हैं। जीवन में आर्थिक नुकसान भी जीने की उम्मीद खत्म कर देता है। इसके अलावा आसानी से आत्महत्या के संसाधनों की उपलब्धता, सामाजिक आर्थिक स्थिति, अनुवांशिकता, पारिवारिक कलह और सोशल मीडिया भी आत्महत्या के कारणों में प्रमुख हैं। एक शोध के अनुसार मानसिक अवसाद के कारण आत्महत्या की सोच अधिक बढ़ती है। जिसकी वजह से 8.6 फीसदी लोग आत्महत्या का प्रयास करते हैं। मनोविकार की स्थिति से 50 फीसदी लोग ऐसा प्राणघातक कदम उठाते हैं। ऐसे लोगों में यह खतरा 20 गुना अधिक रहता है। सिजोफ्रेनिया से और व्यक्तित्व विकार से ग्रसित 14 फीसद लोग आत्महत्या का प्रयास करते हैं। एक आंकड़े के अनुसार जो लोग ऐसा प्रयास कर चुके होते हैं, उनमें 20 फीसदी दूसरी बार भी ऐसा करते हैं। जबकि इस 20 फीसदी में एक फीसद लोग सालभर में इसी प्रयास की वजह से मौत को गले लगाते हैं। जबकि पांच फीसदी लोग 10 साल बाद पुनः आत्महत्या का प्रयास करते हैं। जुआ खेलने वालों में 24 फीसदी लोग कभी न कभी आत्महत्या का प्रयास करते हैं। आत्महत्या के मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं। जिसकी वजह से लोग ऐसा घातक कदम उठाते हैं। ऐसे लोगों को मानोवैज्ञानिक काउंसिंलिंग कर बचाया जा सकता है। इसके लिए सामाजिक जागरुकता पहली आवश्यकता है। अवसाद से ग्रसित व्यक्ति के साथ परिवार और दोस्तों का नजरिया सकारात्मक होना चाहिए। भारत में सबसे खतरे की बात यह है कि युवाओं में आत्महत्या की सोच तेजी से पैदा हो रही है। इसकी वजह बेरोजगारी, प्रेम में असफलता, नशे की लत और दूसरे प्रमुख कारण हैं। इस पर नियंत्रण लगाने के लिए सरकारी स्तर पर राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए।

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