‘निर्भया’ के सिलसिले कब तक?

हैदराबाद में भी ‘निर्भया कांड’ को लेकर देश आंदोलित है। इस बार भी ‘निर्भया’ सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई और उसे जला कर मार दिया गया। रांची में भी ‘निर्भया’ का केस सामने आया है। उसका भी त्रासद अंत इस देश ने देखा-सुना और पढ़ा है। बेटियां लगातार दरिंदों की हवस का शिकार हो रही हैं। उन्हें जला कर राख किया जा रहा है, ताकि साक्ष्य ही मिट जाएं। देवियों के इस देश में बेटियों के अस्तित्व पर ही कुछ भुतहे, काले, पैने साये मंडराए हैं। औसतन हर मिनट में एक बलात्कार किया जा रहा है। देश में हर रोज औसतन 89 रेप की घटनाएं दर्ज की जा रही हैं। यदि दिल्ली में संसद मार्ग के एक किनारे युवा अनु दुबे ‘डाक्टर निर्भया’ के लिए इंसाफ की गुहार करती धरने पर बैठती है, तो पुलिस सुरक्षा को खतरे के नाम पर उसे उठाकर ले जाती है। घंटों हिरासत में रहने के बाद, अंततः उसे घर लौटना पड़ता है। यह है हमारी पुलिस की संवेदनशीलता…! अनु का सरोकार भी ‘निर्भया’ के सिलसिलों के प्रति था। जो घटनाएं अपराध के रिकार्ड तक नहीं पहुंच पातीं, वह संख्या न जाने कितनी होगी? अनु का सवाल था और वह प्रत्येक संवेदनशील देशवासी का भी होगा कि आखिर बेटियों और महिलाओं को डर और बलात्कारी दरिंदों से निजात कब मिलेगी? बेशक दिसंबर, 2012 की ‘निर्भया’ ने सामूहिक बलात्कार और शारीरिक यंत्रणाओं की जो पीड़ा सही थी और अंततः वह हमेशा के लिए सो गई। तय है कि हैदराबाद की युवा डाक्टर को भी वही असहनीय वेदना झेलनी पड़ी होगी! वह चीखती-चिल्लाई होगी, जिंदा जलाए जाने पर तड़पी और छटपटाई होगी! अंततः प्रकृति ने उसे भी लंबी नींद में सुला दिया। आखिर ‘निर्भया’ के ये सिलसिले कब तक जारी रहेंगे? कानून के हाथ तो बहुत लंबे माने जाते रहे हैं, लेकिन हमें लगता है कि वह बौना और लेटलतीफ है। 2012 की दरिंदगी और हैवानियत के लिए फांसी की सजा सुनाए भी लंबा वक्त बीत चुका है, लेकिन कानूनी इंसाफ की अपनी प्रक्रियाएं जारी हैं। इतने अंतराल में ‘निर्भया’ के नये आंकड़े काफी बढ़ गए होंगे! शायद इसीलिए हैदराबाद की भीड़ भी इतने गुस्से में है कि पुलिस से बलात्कारियों को मांग रही है, ताकि उन्हें सरेआम दंड देकर समाप्त किया जा सके अथवा उनके तुरंत एनकाउंटर का आग्रह कर रही है। कानून की परिभाषा यहां भी बताई जाती है। 2012 के ‘निर्भया कांड’ के बाद जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी ने भी यौन दुष्कर्म की नई परिभाषा और कड़ी सजा तय की थी। संसद ने खूब उत्तेजना के साथ दिए गए भाषणों के बाद उस कानून को पारित किया था। सवाल भी है और जिज्ञासा भी है कि उसके बावजूद हजारों बलात्कार क्यों सामने आए हैं? कब तक इन ‘निर्भया’ चेहरों को देखते रहना पड़ेगा? हैदराबाद का ही उदाहरण लें, तो पुलिस ‘निर्भया’ के पिता को टोंचती है कि बेटी किसी के साथ भाग गई होगी! पुलिस सीसीटीवी देखने में मस्त रहती है और दूसरी तरफ अपराध हो चुका है। ‘निर्भया’ को यथासमय बचाया जा सकता था! यदि पुलिस की ऐसी ही भूमिका को उनका मानक व्यवहार मान लें, तो उसकी संवेदनहीनता पर खीझने के अलावा और क्या किया जा सकता है? ‘निर्भया’ एक प्रतीकात्मक नाम है, जो 2012 के जघन्य कांड की शिकार बेटी के अंतिम संघर्ष के मद्देनजर दिया गया था, लेकिन वासनाओं के बर्बर खेल आज भी जारी हैं। क्या ‘बेटी बचाओ’ वाले नारे में संशोधन करके यह भी जोड़ देना चाहिए-‘बेटी लुटाओ…?’ संसद भवन के पास सड़क के किनारे बैठी अनु दुबे की भी यही चिंता है-‘कल मेरे साथ भी रेप न हो…मेरी भी हत्या न कर दी जाए…मुझे भी जिंदा जलाकर फेंक न दिया जाए, लिहाजा अपनी सरकार से पूछना चाहती हूं कि मैं और दूसरी सभी बेटियां कितनी सुरक्षित हैं?’ इस संदर्भ में सरकार, अदालत और पुलिस को अपनी बेटियों को जवाब देना पड़ेगा। हमें उपदेश नहीं सुनने कि घर का माहौल कैसा हो, बेटों को कैसे संस्कार दिए जाएं, समाज की मानसिकता कैसे बदलेगी और बलात्कार भी एक मनोरोग है। यह भी सचेत कर दूं कि मोमबत्तियां जलाने से भी न्याय नहीं मिलेगा। गांधीवादी या मौन आंदोलनवादी होना छोड़ दें। व्यवस्था पर पुरजोर दबाव बनाएं। मंत्रियों के आवास घेर लें। न्यायाधीशों को भी ज्ञापन लिखें बार-बार, लगातार। आखिर ‘निर्भया’ के सिलसिले तो रोकने ही हैं, बेशक ‘राक्षसों’ को सरेआम दंडित क्यों न करना पड़े! कानून को अपनी परिभाषा को तुरंत लागू कराना होगा और सजा भी एक निश्चित अवधि के दौरान देनी होगी। इन दरिंदों के लिए ‘दया’ का प्रावधान भी समाप्त करें।

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