क्या आप जानते हैं ऊं नमः शिवाय महामंत्र की महिमा

भगवान शिव के षडक्षर मंत्र ऊं नमः शिवाय से तो आप भली भांति परिचित होंगे। प्रणव मंत्र ऊं के साथ नमः शिवाय (पंचाक्षर मंत्र) जप करने पर यह षडक्षर बन जाता है। पुराणों में इस मंत्र की बड़ी ही महिमा कही गई है। शिव महापुराण के अनुसार इस मंत्र के महात्म्य का विस्तांर से वर्णन सौ करोड़ वर्षों में भी नहीं किया जा सकता है। वेद तथा शैवागम में यह मंत्र शिवभक्तोंह के सम्पूेर्ण अर्थ का साधक अर्थात् सर्वमनोकामना पूर्ण करने वाला बताया गया है।

ऊं नम: शिवाय

इस मंत्र में वैसे तो अक्षर मात्र थोड़े ही हैं लेकिन यह महान अर्थ से सम्प न्नम मंत्र है। इसे वेदों का सारतत्वा भी कहा गया है। प्राचीन ऋषिगणों ने इसे मोक्षदायी, शिवस्वयरूप तथा स्वतयं शिव की आज्ञा से सिद्ध और संदेहशून्यद माना है। यह नाना प्रकार की सिद्धियों से युक्तद है, दिव्ये है, शिवभक्तोंि के मन को प्रसन्नी एवं निर्मल करनेवाला है और तो और सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाला है। ऐसा शिव पुराण में कहा गया है।

सर्वज्ञ शिव ने दिया ये महामंत्र

ऊं नमः शिवाय (षडक्षर मंत्र) या नमः शिवाय (पंचाक्षर) मंत्र का प्रतिपादन स्वथयं सर्वज्ञ शिव ने संपूर्ण देहधारियों के सभी मनोरथों की सिद्धि के लिए किया है। यह मंत्र सभी विद्याओं का बीज मंत्र है। जैसे वट (बरगद) के बीज में विशाल वृक्ष मौजूद है ठीक उसी प्रकार अत्यंित सूक्षम होने पर भी इस मंत्र को महान् अर्थ से परिपूर्ण समझना चाहिये।

मंत्र है वाचक, शिव हैं वाच्ये

शिव को अप्रमेय यानी अनुमान से परे भी कहा गया है। अतः अप्रमेय होने के कारण भगवान शिव वाच्यर (ध्वधनि) हैं तो वहीं यह मंत्र ऊं नमः शिवाय उनका वाचक माना गया है। शिव और मंत्र का ये वाच्ये-वाचक भाव अनादिकाल से चला आ रहा है। शिव पुराण के अनुसार अगर सृष्ट् िमें भगवान शिव ना होते तो यह जगत् अंधकारमय हो जाता, क्योंाकि प्रकृति जड़ है और जीवात्मा अज्ञानी। प्रकृति से लेकर परमाणु तक जो कुछ भी जड़रूप तत्व है, वह किसी बुद्धिमान (चेतन) कारण के बिना स्वसयं कर्ता नहीं है। विद्वान इस मंत्र को शिव का अभिधान (वाचक) और शिव को अभिधेय (वाच्यड) मानते हैं। इस युग्मा के कारण ही परमशिव स्वारूप यह मंत्र सिद्ध माना गया है। यह शिव का विधि वाक्यत है। यह उन्हींा शिव का स्व्रूप है जो सर्वज्ञ, परिपूर्ण और स्वाभाव से निर्मल हैं।

इसके समान कोई दूसरा मंत्र नहीं

शिव महापुराण के अनुसार संपूर्ण सनातन साहित्यय और दर्शन में मंत्रों की अत्य धिक संख्यां (सात करोड़ मंत्र और अनेकानेक उपमंत्र) होने के बावजूद इस भगवान शिव द्वारा रचित षडक्षर मंत्र के समान कहीं कोई दूसरा मंत्र नहीं है। षडक्षर मंत्र में छह अंगों सहित संपूर्ण वेद और शास्त्रि विद्यमान हैं। शिवपुराण के अनुसार जितने भी शिवज्ञान हैं और जो-जो विद्यास्थांन हैं, वे सब षडक्षर मंत्ररूपी सूत्र के संक्षिप्तै भाष्यल हैं। यही नहीं जिसके हृदय में ऊं नमः शिवाय यह षडक्षर मंत्र प्रतिष्ठिात है उसे अन्य बहुसंख्यरक मंत्रों और विस्तृ।त शास्त्रों से क्याह प्रायोजन है। जिसने ऊं नमः शिवाय इस मंत्र का जप दृढ़तापूर्वक अपना लिया है उसने सम्पूकर्ण शास्त्रय पढ़ लिया और समस्तं शुभ अनुष्ठाकनों को पूरा कर लिया है। शिव पुराण के अध्यासय 12 में यहां तक कहा गया है कि ऊं नमः शिवाय मंत्र के जप में लगा हुआ पुरुष यदि पंडित, मूर्ख, अन्य्ियाज अथवा अधम भी हो तो वह पाप कर्मों से मुक्तम हो जाता है।

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