कहानी: गली नंबर दो

-अंजू शर्मा- पुत्तर छेत्ती कर, वेख, चा ठंडी होंदी पई ए। बीजी की तेज आवाज से उसकी तंद्र भंग हुई। रंग में ब्रश डुबोते हाथ थम गए। पिछले एक घंटे में यह पहला मौका था, जब भूपी ने मूर्ति, रंग और ब्रश के अलावा कही नजर डाली थी। चाय सचमुच ठंडी हो चली थी। उसने एक सांस में चाय गले से नीचे उतारते हुए मूर्तियों पर एक भरपूर नजर डाली। दीवाली से पहले उसे तीन आर्डर पूरे करने थे। लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों से घिरा भूपी दूर बिजली के तार पर…

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कहानी: तीसरा बटन

-सुशील यादव- आज कालेज कैंपस में सन्नाटा पसरा है। 3 छात्रों की पिकनिक के दौरान नदी में डूब जाने से अकस्मात मौत हो गई। सभी होनहार विद्यार्थी थे। हमेशा खुश रहना व दूसरों की मदद करना उन की दिनचर्या थी। वे हमारे सीनियर्स थे। कालेज का फर्स्ट ईयर यानी न्यू कमर्स को भीगी बिल्ली बन कर रहना पड़ता था। न्यू कमर्स का ड्रैस कोड, रोज शेविंग करना, सीनियर्स को देख कर नजरें चुपचाप कमीज के तीसरे बटन पर ले जाना अनिवार्य लेकिन अघोषित नियम था। इस नियम को न मानने…

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कहानी संग्रह: अपने ही घर में टूटी हुई जंजीरें

कृष्ण खटवाणी सखी, मैं रोई, खूब रोई, इतना रोई कि मेरे आंसू ही सूख गए, सिर्फ गालों पर एक जलन बाकी रह गई। अचानक मेरे मन में एक चिंगारी भड़की और मैं दरवाजा खोलकर बाहर आई। बाहर पहुंचकर मैंने अपनी पूरी ताकत के साथ कहा-मुझे मंजूर नहीं, मुझे मंजूर नहीं यह रिश्ता। मेरे तन के हर एक अंग ने महसूस किया जैसे सब खिड़कियां और दरवाजे हिल रहे हों और वहां बैठे सब लोग आंखें फाड़े मेरी ओर देख रहे थे। मेरी टांगें मुझे संभाल पाने में असमर्थ रहीं और…

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पुस्तक समीक्षा: अनुत्तरित सवालों के गीत

-अरविंद अवस्थी- साहित्य की विधाओं में गीत चिरंत्तन विद्या के रूप में मान्य है। गीत-मनीषियों का कहना है कि मनुष्य के पास जब भाषा नहीं थी तब भी वह पक्षियों के कलख, निर्झर के कलकल और हवा की सरसराहट के साथ गुनगुनाता जरूर रहा होगा। गीत उसके हृदय का स्पंदन है, उसकी स्वतः स्फूर्त चेतना है। गीत का महत्त्व कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा। कालखंड के अवरोधों, आलोचनाओं के बावजूद गीत की आभा बंद नहीं हुई है। अब कोई गमले में प्लास्टिक के फूल सजाकर…

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कहानी : सीमांत

-मप्र श्रीवास्तव- एक दिन जब मोनिका ने अपने पति डा. सुधीर से कहा था, शादी होने से ही अगर आप यह समझ लें कि मैं आप की दासी बन गई हूं तो यह आप की गलतफहमी है. मैं आजादखयाल औरत हूं और मर्द की ताबेदारी में रह कर अपनी जिंदगी सड़ा देने के खिलाफ हूं, तब सुधीर थोड़ी देर हक्काबक्का सा रह गया था. फिर उस ने उसे समझाते हुए कहा था, मैं समझा नहीं, मोनिका. तुम्हें किस बात का कष्ट है? इतना बड़ा मकान है, कार है, अपने लड़के…

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व्यंग्य : एक कंजूस की प्रेम कहानी

-अर्चना चतुर्वेदी- सयाने जानते हैं कि आशिकी बड़ा खर्चीला काम है। इस काम में बंदे की जेब को पेचिश हो जाती है और टाइम की फर्म का दिवाला निकल जाता है। पर फिर भी लोग हैं कि आशिकी करते हैं कारण सिर्फ ये कि खतरों से खेलने का शौक भी तो एक शौक होता है। आशिकी के धंधे में जहां इन्वेस्टमेंट एक अनिवार्य तत्व है वहीं कंजूसी के धंधे में हर चीज की गुंजाइश है पर वहां खर्च का अकाउंट बहुत मुश्किल से खुलता है। सो आशिकी और कंजूसी दोनों…

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(कहानी) दुलाईवाली

-बंगमहिला- काशी जी के दशाश्वममेध घाट पर स्नालन करके एक मनुष्यी बड़ी व्यिग्रता के साथ गोदौलिया की तरफ आ रहा था। एक हाथ में एक मैली-सी तौलिया में लपेटी हुई भीगी धोती और दूसरे में सुरती की गोलियों की कई डिबियां और सुंघनी की एक पुड़िया थी। उस समय दिन के ग्या रह बजे थे, गोदौलिया की बायीं तरफ जो गली है, उसके भीतर एक और गली में थोड़ी दूर पर, एक टूटे-से पुराने मकान में वह जा घुसा। मकान के पहले खण्ड  में बहुत अंधेरा थाय पर उपर की…

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व्यंग्य : “नैबर सैड, यू हैप्पी”

-एस.एन खरे- अब भाई यह तो तय है कि हर आदमी सुखी रहना चाहता है, खुशी से रहना चाहता है, पर इसके लिए पहली शर्त यही है कि आपका पड़ोसी दुखी रहे! मान लीजिए आप मारूति ऑल्टो कार का आनंद ले रहे हैं और मज़े में हैं पर अगर आपके पड़ोसी ने होंडा सिटी ख़रीद ली तो फिर हो गया न आपका सुख और आनंद नदारद? दरअसल मौज़ और प्रसन्नता कहीं तुलनात्मक अधिक होते हैं, और पड़ोसी से बड़ा प्रतिव्दन्व्दी कौन हो सकता है? पड़ोसी का लड़का फेल हो गया,…

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पुस्तक समीक्षा: मालिश महापुराण

-एम.एम.चन्द्रा- सुशील सिद्धार्थ का व्यंग्य संग्रह मालिश महापुराण को पढ़ते समय सैकड़ों बिम्बों-प्रतिबिम्बों, मुहावरों, प्रसंगों, तथ्यों और कथ्यों का सामना करना पड़ा। एक पाठक को तो नहीं लेकिन एक लेखक को रोजाना जिनका सामना करना ही पड़ता है। सुशील सिद्धार्थ ने लेखक, साहित्य, लेखन, समीक्षा और आलोचना पर इतना कठोर व्यंग्य किया है, जिसके कारण मालिश पुराण आधुनिक साहित्य के तमाम मठों को समझने के लिए एक जरूरी पुस्तक बन गई है। सुशील भाई ने आधुनिक समीक्षा लेखन पर हमें जो ज्ञान दिया है, यदि उसको ध्यान में नहीं रखा…

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कहानी: मनुष्य की भाषा राक्षसों के बीच

बड़ी बिल्डिंग का वह पूरा तल्ला विदेशी संस्थान ने किराए पर लिया हुआ था। जैसा अमूमन माना ही जाता है कि अमेरिका प्रेरणा से उपजे संस्थान मालदार होते हैं। उनके रख-रखाव और साफ-सुथरेपन से यही झलकता था। वह एशिया में सामाजिक स्तर के अन्याय का अध्ययन करने वाली संस्था थी। सरकारी नियमों के अनुसार ही वह खोली गई होगी। इसका अर्थ है कि अपने काम की आजादी उसे सरकारी अनुमति से मिली ही हुई है। बुद्धिजीवियों के गलियारों में ऐसे पारदर्शी संस्थानों की काफी चर्चा थी। परंतु…इधर कुछ दिनों से…

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