सुंदरकांड (हास्य व्यंग्य)

-सुरेश भाटिया- रामायण में कई कांड हैं। अगर देखा जाए तो रामायण में कांड के अलावा कुछ भी नहीं है। उन कांडों में एक कांड सुंदरकांड है। इस का आयोजन मेरे महल्ले के अवधेश ने किया। अवधेश ने बाकायदा निमंत्रणपत्र छपवा कर कई लोगों के साथ मुझे भी भेजा। निमंत्रणपत्र पढ़ने के बाद मुझे कुछ अजीब लगा, सुंदरकांड? मैं सोचने लगा, भला कांड भी कभी सुंदर हुआ है? आज तक मैं ने जितने भी कांड देखे सब के सब कुरूप ही थे। फिर चाहे कांडा का कांड हो या अन्य…

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जीवन के स्वीकार की कविताएं

समीक्षक पुस्तक: इस गणराज्य में (कविता संग्रह) कवि: ब्रजेश कानूनगो मूल्य: 100 रुपए प्रकाशक: दखल प्रकाशन, 104, नवनीति सोसायटी, प्लॉट न.51, आईपी एक्सटेंशन, पटपडगंज, दिल्ली-110092 हाल ही में व्यंग्यकार व स्तंभकार ब्रजेश कानूनगो का कविता संग्रह इस गणराज्य में दखल प्रकाशन दिल्ली से आया है। कविता से गद्य की ओर जाने वाले अनेक रचनाकार देखे जा सकते हैं। लेकिन जब व्यंग्य लिखते-लिखते कोई कविताएं लिखने लगता है तो यह एक निश्चित ही ध्यान देने वाली घटना कही जा सकती है। एक व्यंग्य सग्रह पुनः पधारें के बाद कविता संग्रह इस…

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कान (हास्य व्यंग्य)

कान न हुए कचरापेटी हो गई। जो आया उडेल कर चला गया जमाने भर की गंदगी और हम ने खुली छूट दे रखी है कानों को। आजकल हमारा देखना भी कानों से ही होता है। लोग कान में आ कर धीरे से फुसफुसा जाते हैं और हमें लगता है कि यह हमारा खास, घनिष्ठ और विश्वसनीय है जो इतनी महत्त्वपूर्ण बातें हमें बता कर चला गया। कान से सुन कर हमें इतना विश्वास हो जाता है कि अब हमारा मानना हो गया है कि आंखें धोखा खा सकती हैं लेकिन…

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सौगात (कहानी)

-कंचन- स्मिता तेज कदमों से चलती हुई स्टेशन की एक खाली बैंच पर बैठ गई। कानपुर वाली ट्रेन आने में अभी 2 घंटे बाकी थे। एक बार उस ने सोचा कि वेटिंगरूम में जा कर थोड़ा सुस्ता ले, पर फिर विचार बदल दिया। आज उस के दिल में जो खुशी का ज्वार फूट रहा था, उस के आगे कोई भी परेशानी माने नहीं रखती थी। स्मिता आज दिनभर की घटनाओं के क्रम और रफ्तार को सोच कर हैरान थी। आज सुबह ही ब्रह्मपुत्र मेल से 8 बज कर 25 मिनट…

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व्यंग्य : जनता सब जानती – पहचानती है

-रवि श्रीवास्तव- फिर भी कुछ मांगों की तुरन्त स्वीकृति आपकी हैसियत का बोध कराती हैं। इस बार के दौरे में आपका कद कुछ ऊंचा लगा। ये शुभ लक्षण हैं। भविष्य के लिए कुछ अच्छे संकेत। इससे आपका भविष्य संवरेगा या देश का। फिलहाल यह विचारणीय प्रश्न है। अब मुद्दे की बात हो जाए। आपको पता चला या नहीं चला। शहर में सबको चल गया। एक मक्कार, धूर्त, चालाक और दो नंबरी किस्म के व्यक्ति ने आपके स्वागत में कोई कसर बाकी नहीं रखी। इस पर मुकदमे भी चले रहे हैं।…

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कहानी: एक ठंडी मौत

-सुबोध कुमार श्रीवास्तव- एक भयानक चीख… रुक-रुक कर भयावह चीखें… ओ मेरी माई… मर जाऊंगी… क्या कर रही है, डायन। अरे! कोई बचाओ… ये चीखें सरकारी क्वार्टर की दीवारों और बंद खिड़कियों-दरवाजों को भेदती हुई सामने फैले मैदान तक पहुंचती रहीं। दिसम्बर माह की अंधेरी रात। शरीर को बर्फ कर देने वाली ठण्ड। शीत लहर का प्रकोप आधी रात के बाद उठी इन चीखों ने वातावरण में डर व्याप्त कर दिया। मैदान में यहां-वहां लगे पेड़ों पर अपने-अपने घोंसलों में दुबके पक्षी बाहर निकल कर आसमान में फडफड़ाने लगे। न…

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व्यंग्य : बाढ़ की पीड़ा और प्रसन्नता

-डॉ. सुरेन्द्र वर्मा- भारत जैसे अपने देश में हर साल किसी न किसी जगह बाढ़ जरूर आती है। कुछ इलाके तो बाढ़ को बहुत ही प्रिय हैं। वहां तो प्रतिवर्ष यह पधारती ही है, जैसे उत्तर-प्रदेश का पूर्वी इलाका और बिहार। बाढ़ आती है तो स्थानीय लोगों पर मानो कहर टूट पड़ता है, खास तौर पर गरीब-गुरबा जनता पर। बाढ़ के भुक्त्तभोगियों की पीड़ा बस वे खुद ही जानते हैं। पैसे वाले तो अपना कोई न कोई ठिकाना तलाश ही लेते हैं। लेकिन बाढ़ केवल पीड़ा ही नहीं लाती। प्रसन्नता…

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(कहानी) मैं लड़की नहीं हूं क्या?

-अमिताभ वर्मा- शाम हौले से अपना पल्लू समेट रुखसत हो चुकी थी। रात को जवानी की दहलीज पर कदम रखने में देर थी। सुरेखा अपने कमरे में थी, दुतल्ले पर। छोटा-सा एक कमरा। तीन तरफ बिखरा दीवारों-दरवाजों का मायाजालय एक तरफ एक झरोखा। यही उसकी मनपसंद जगह थी। उसका बिस्तर इसी झरोखे से सट कर लगा था। खिड़की का पर्दा हवा के झोंकों में इठलाताय पर्दे में टंकी नन्ही-नन्ही घंटियां टुनटुनातीं। बिस्तर से सुरेखा को आसमान में टिमटिमाते तारे और उनसे अठखेलियां करता चांद दिखता। पास-ही आले पर रखे रेडियो…

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व्यंग्य: प्याज का मारा इक दुखिया बेचारा

जबसे मैंने अपने दोस्त का चेहरा देखा है, अपने सा बेरंग ही देखा है। हो सकता है कभी उनके चेहरे पर नूर रहा हो, जब वे अविवाहित रहे हों। असल में वे मेरे जिगरी दोस्त विवाह के बाद ही हुए हैं। जो मैं विवाहित न होता, वे विवाहित न होते शायद ही हम एक दूसरे के दुख के दोस्त हो पाते। मीरा ने सच ही कहा है -घायल की गति घायल जाने और न जाने कोई। गृहस्थी बड़ों- बड़ों के चेहरे का रंग खराब कर देती है, मेरी उनकी तो…

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मिर्च-मसाले (कहानी)

-रीता कुमारी- हर रिश्ते में कुछ खट्टा तो कुछ मीठा होता है, मगर सास-बहू के रिश्ते की बात ही अलग है। यहां तो खट्टे-मीठे के अलावा मिर्च-मसाला भी खूब होता है। जिस तरह सेहत के लिए हर स्वाद जरूरी है, उसी तरह रिश्ते के इस कडवे-तीखे स्वाद के बिना भी ज्िांदगी बेमजा है। यूनिवर्सिटी के काम से एकाएक मुझे मुजफ्फरपुर जाना पडा। मैं काम खत्म करके सीधे अपने बचपन की सहेली निधि के घर जा पहुंची, जो वहीं अपने पति, बच्चों और सास के साथ रहती थी। बरसों बाद मुझे…

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