शहर के विद्वान रौशन झा ने लिख डाली गीता, शीघ्र होगी आपके समक्ष

रघुबंश तोमर जमशेदपुर। कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान योगेश्वर कृष्ण के श्रीमुख से निकली गीता मानव जाति के लिए वह पद्धति है कि जिसका अनुसरण कर कोई भी व्यक्ति अपने सामान्य जीवन को जीते हुए मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। गीता भारतीयता एवं हिंदुत्व की आत्मा है और अपनी इसी विशेषताओं के कारण गीता पूरे विश्व में जानी जाती है। गीता के 18 अध्याय में 700 श्लोक है जो संस्कृत में लिखा गया है। अनेक पुस्तकों में गीता के इन श्लोकों का हिंदी एवं अन्य भाषाओं में अर्थ एवं…

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(व्यंग्य) : ब्लैक स्वान इवेंट

(दिलीप कुमार) “तुलसी बुरा ना मानिए जौ गंवार कहि जाय जैसे घर का नरदहा भला बुरा बहि जाय “ अर्थात बाबा तुलसीदास कहते हैं कि गंवार व्यक्ति की कही गयी कड़वी बात का बुरा नहीं मानना चाहिए ,जिस प्रकार घर की नाली में घर के कूड़े के साथ अच्छी चीजें भी बह जाती हैं गंदगी के साथ-साथ ,वैसे ही गंवार की उज्जडता को बहुत मन पे नहीं लेना चाहिए।गंवार पर तो आप अपने मन को समझाकर तसल्ली दे लेते हैं ,मगर उनका क्या जो सब कुछ जानते बुझते हुए अपने…

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“लोग सड़क पर” (व्यंग्य)

-दिलीप कुमार- “नानक नन्हे बने रहो, जैसे नन्ही दूब बड़े बड़े बही जात हैं दूब खूब की खूब “ श्री गुरुनानक देव जी की ये बात मनुष्यता को आइना दिखाने के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। ननकाना साहब में जिस तरह गुरूद्वारे को घेर कर सिख श्रद्धालुओं पर पत्थर बाज़ी की गयी और एक कमज़र्फ ने धमकी दी कि वो ये करेगा, वो करेगा। नफरत से भरी भीड़ ने सड़क पर कब्ज़ा करके गुरुद्वारे पर हमला कर दिया। सिखों और उनके धर्म स्थान को ख़त्म करने की खुले आम धमकी दी।…

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पूस की रात (कहानी)

-मुंशी प्रेमचंद- हल्कू ने आकर स्त्री से कहा, ‘सहना आया है, लाओ, जो रुपए रखे हैं, उसे दे दूं, किसी तरह गला तो छूटे.’ मुन्नी झाड़ू लगा रही थी. पीछे फिरकर बोली, ‘तीन ही तो रुपए हैं, दे दोगे तो कम्मल कहां से आवेगा? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी? उससे कह दो, फसल पर दे देंगे. अभी नहीं.’ हल्कू एक क्षण अनिश्चित दशा में खड़ा रहा. पूस सिर पर आ गया, कम्मल के बिना हार में रात को वह किसी तरह नहीं जा सकता. मगर सहना मानेगा नहीं,…

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कहानी : जाननिसारी

-महेन्द्र सिंह- सोहना के हर रोज़ रात को नौ-साढ़े नौ बजे कस्बे की परिधि में घुसते ही गली-मुहल्ले के सभी कुत्ते बिना नागा इकट्ठा हो कर उस पर भौंकने लग जाया करते थे– भौं!भौं!भौं! न जाने कैसे वे सोहना की पदचाप पहचान लेते थे और उस पर भौंकने लग जाया करते थे। सोहना को मरगिल्ले कुत्तों से डर नहीं लगा करता था।जैकी को भी सोहना पुचकार लिया करता था। पर शेरू?वो तो एक ही था।कान खड़े हुए।पूंछ उठी हुई।कितना खुरार्ट।कितना कटखन्ना काला कुत्ता! मां बचपन में सोहना को कुत्तों के…

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कहानी : चयन

-रूचिप जैन- मनुष्य के जीवन में उसका चयन ही निर्धारित करता है कि उसका आगे का सफ़र कैसा होगा। ऐसा ही कुछ रामप्यारी के साथ हुआ जो गाँव में अपने पति और चार बच्चों के साथ रहती थी। रामप्यारी का पति गोवर्धन एक परिश्रमी व समझदार किसान था। क़िस्मत भी उसका साथ देती, हर साल फ़सल अच्छी होती थी। उसने पचास बीघा ज़मीन और ख़रीद ली। रामप्यारी भी खेती में उसकी मदद करती और बच्चों का लालन पालन करती। बुआई और कटाई के समय गोवर्धन कुछ मज़दूरों को काम पर…

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कहानी : पार्थ और आर्य की दोस्ती

बारिश का मौसम पूरे शबाब पर था. पार्थ और पूर्वा स्कूल के लिए निकलने वाले थे. मां ने चेतावनी दी, ‘‘बारिश का मौसम है, स्कूल संभल कर जाना. पूरी रात जम कर बारिश हुई है. अगर बारिश ज्यादा हुई तो स्कूल में ही रुक जाना. हमेशा की तरह अकेले मत आना. मैं तुम्हें लेने आऊंगी.’’ ‘‘अच्छा, मां, हम सावधानी बरतेंगे,’’ पार्थ और पूर्वा बोले. दोनों ने मां को अलविदा कहा. वे स्कूल जाने लगे. शाम के 6 बजने वाले थे. स्कूल की छुट्टी का समय हो चुका था. पार्थ और…

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व्यंग्य : प्याज मांग कर जलील न हों

-अशोक गौतम- प्याज मांग कर प्लीज जलील न हों! अपने तमाम पड़ोसियों को यह सूचित करते हुए मुझे अपने मरने से भी अधिक दुख हो रहा है कि मैंने जो चार महीने पहले सस्ता होने के चलते जो पांच किलो प्याज खरीदा था, वह अब खत्म हो गया है। इसलिए अपने तमाम छोटे-बड़े पड़ोसियों को वैधानिक चेतावनी दी जाती है कि अब वे मेरे घर कृपया गलती से भी प्याज मांगने न आएं। मेरे घर में प्याज तो क्या, अब प्याज के छिलके भी नहीं बचे हैं। जो बचे थे…

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व्यंग्य : शादी के लिए पैंतरेबाजी

-जसविंदर शर्मा- लड़की का पिता चहका, जनाब, मैं ने सारी उम्र रिश्वत नहीं ली। ऐसा नहीं कि मिली नहीं। मैं चाहता तो ठेकेदार मेरे घर में नोटों के बंडल फेंक जाते कि गिनतेगिनते रात निकल जाए। मगर नहीं ली, बस। सिद्धांत ही ऐसे थे अपने और जो संस्कार मांबाप से मिलते हैं, वे कभी नहीं छूटते। यह कह कर उस ने सब को ऐसे देखा मानो वे लोग उसे अब पद्मश्री पुरस्कार दे ही देंगे। मगर इस बेकार की बात में किसी ने हामी नहीं भरी। लड़के की मां को…

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दो पौधे (कहानी)

मुझे आम के 2 पौधे दे कर जो रस्म मां ने विवाह के बाद मेरी विदाई पर निभाई थी आज वही रस्म पिताजी निभा रहे थे मां की अंतिम विदाई पर, मुझे आम के 2 पौधे और दे कर। बस, फर्क इतना था कि इस बार ये पौधे मेरे लिए नहीं बल्कि मेरी बेटी नेहा के लिए थे ताकि मेरी बेटी की पूंजी मायके में भी बढ़े और ससुराल को भी संपन्न बनाए। आंगन में आम का पेड़ चारों ओर फैला था। गरमी के इस मौसम में खटिया डाल कर…

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