कहानी: निराश्रित

-राजेश त्रिपाठी- सुनंदा की जिंदगी भी अजीब उतार-चढ़ाव की जिंदगी है। बेटे की शादी को हुए अभी कुछ माह ही गुजरे थे, वह इस खुशी में डूबी थी कि तभी पति आनंद का साया उसके सिर से उठ गया। अगर बेटे-बहू ने ढांढ़स न बंधाया होता तो वह टूट गयी होती। बहू पुनीता और बेटे मयंक के प्यार ने उसे दुख के गहरे सागर से उबार लिया। पिता की मृत्यु के बाद बेटे मयंक ने मां से कहा था- मां होनी को कोई टाल नहीं सकता। क्या करें शायद भाग्य…

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कहानी: सजा

-डॉ. नरेंद्र शुक्ल- तुम्हारा नाम क्या है? कटघरे में खड़े खूंखार से दिखने वाले मुजरिम से सफाई वकील ने पूछा। विक्की उस्ताद। मुजरिम ने होंठ चबाते हुये कहा। तो तुमने कलक्टर साहिबा पर गोली चलाई? हां, चलाई गोली…। विक्की उस्ताद ने सीना तानकर कहा। मगर क्यों? सफाई वकील ने पूछा। विक्की जज साहिबा को देख रहा था। कोई जवाब नहीं दिया। मैं पूछता हूं कि तुमने कलक्टर साहिबा पर गाली क्यों चलाई? इस बार वकील साहब ने थोड़ी सख़्ती दिखाई। पैसा मिला था। विक्की ने बिना किसी लाग-लपट के सहज…

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(कहानी) दो बूढ़ी औरतें

-स्व. घनश्याम रंजन- एक समय की बात है। दो बूढ़ी औरतें एक नदी के दोनों आमने−सामने के किनारों पर रहती थीं। वे दोनों अपनी बदमिजाजी के लिए बदनाम थीं। सूरज निकलने से पहले ही वे अपने−अपने किनारे पर आकर जम जाती थीं। और सूरज छिपने तक झगड़ती रहती थीं। किसी को मालूम नहीं था कि उनके झगड़े का कारण क्या है। उनमें से एक बुढि़या की एक पोती थी। अपनी दादी के रोज−रोज के झगड़े से तंग आ कर एक दिन वह अपनी दादी से बोली, दादी, नदी किनारे जा…

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(हास्य व्यंग्य) सफल कौन है

-आदित्य मंथन- ऐसे आदमी रोज देर से उठे, पर सन्डे को और देर से उठता है, क्योंकि उस दिन निठल्लापन का राफेल उसके पास होता है। पर पिछले सन्डे हम थोड़ा जल्दी उठे और सबसे पहिले मोबाइल खोले। प्राण मुंह में आ गया। कारण हमारे एकमात्र पिता जी का 7 छूटी काल। मेरी छुट्टी तो हो गई। फिर चूंकि हम व्हाइट सच बोलना सीखे हैं, अपने प्रधान सेवक से सो जवाब सोच लिए। खैर दिन आगे बढ़ा। दूसरा काम हम टीवी खोलने का किए। अच्छा वहां भी हर चैनल पर…

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कहानी: एक बेईमान ईमानदारी

-अजय अमिताभ सुमन- विजय मित्तल दिल्ली में बहुत बड़े व्यापारी थे। उनका कपड़ों के इंपोर्ट और एक्सपोर्ट का बहुत बड़ा कारोबार था। अक्सर वो देश के बाहर के व्यापारियों से संपर्क करके उनसे कपड़ों के एक्सपोर्ट का आर्डर लेते, फिर अपनी फैक्ट्री में कपड़ों को बनवा कर चीन भेज देते। इस काम में मित्तल साहब को बहुत मुनाफा होता था। उनकी इंपोर्ट और एक्सपोर्ट डिपार्टमेंट में बहुत बड़ी पहुंच थी। मित्तल साहब इस बात का बराबर ख्याल रखते कि दिवाली या नए वर्ष के समय एक्सपोर्ट डिपार्टमेंट के सरकारी कर्मचारियों…

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(कहानी) नैना जोगिन

-फणीश्वरनाथ रेणु- रतनी ने मुझे देखा तो घुटने से ऊपर खोंसी हुई साड़ी को कोंचा की जल्दी से नीचे गिरा लिया। सदा साइरेन की तरह गूंजनेवाली उसकी आवाज कंठनली में ही अटक गई। साड़ी की कोंचा नीचे गिराने की हड़बड़ी में उसका आंचर भी उड़ गया। उस संकरी पगडंडी पर, जिसके दोनों और झरबेरी के कांटेदार बाड़े लगे हों, अपनी भलमनसाहत दिखलाने के लिए गरदन झुका कर, आंख मूंद लेने के अलावा बस एक ही उपाय था। मैंने वही किया। अर्थात पलट गया। मेरे पीछे-पीछे रतनी ने अपने उघड़े हुए…

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व्यंग्य: पंच महाराज

-बालकृष्ण भट्ट- माथे पर तिलक, पांव में बूट चपकन और पायजामा के एवज में कोट और पैंट पहने हुए पंच जी को आते देख मैं बड़े भ्रम में आया कि इन्हेंट मैं क्याप समझूं पंडित या बाबू या लाला या क्या ? मैंने विचारा इस समय हिकमत अमली बिना काम में लाए कुछ निश्चंय न होगा, बोला-पालागन, प्रणाम्, बंदगी, सलाम, गुडमार्निंग पंच महाराज- पंच-न-न-नमस्काधर नमस्काुर-पु-पु-पुरस्कांर-परिस्कारर मैंने कहा-मैं एक बात पूछना चाहता हूं बताइएगा- पंच-हां-हां पू-पू पूछो ना-ब-बताऊंगा, क्यों नहीं। आप अपने नाम का परिचय मुझे दीजिए जिससे मैं आपको जान…

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कहानी: एक आदिम रात्रि की महक

-फणीश्वरनाथ रेणु- न …करमा को नींद नहीं आएगी। नए पक्के मकान में उसे कभी नींद नहीं आती। चूना और वार्निश की गंध के मारे उसकी कनपटी के पास हमेशा चौअन्नी-भर दर्द चिनचिनाता रहता है। पुरानी लाइन के पुराने इस्टिसन सब हजार पुराने हों, वहां नींद तो आती है।…ले, नाक के अंदर फिर सुड़सुड़ी जगी ससुरी…! करमा छींकने लगा। नए मकान में उसकी छींक गूंज उठी। करमा, नींद नहीं आती? बाबू ने कैंप-खाट पर करवट लेते हुए पूछा। गमछे से नथुने को साफ करते हुए करमा ने कहा-यहां नींद कभी नहीं…

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ग्लोबल वॉर्मिंग का स्थायी समाधान

-अशोक मिश्र- आप लोग यह बताएं कि दुनिया भर के बुद्धिजीवियों का अपर चैंबर खाली है क्या? अगर खाली नहीं होता, तो इतनी मामूली-सी बात को लेकर पेरिस में काहे मगजमारी करते। फोकट में अपनी-अपनी सरकारों का इत्ता रुपया-पैसा और टाइम खोटा किया। पेरिस के निवासियों को परेशान किया सो अलग। वह भी ग्लोबल वॉर्मिंग के नाम पर। अरे भाई! ग्लोबल-फ्लोबल वॉर्मिंग समस्या का समाधान वहां नहीं है, जहां आप ढूंढ रहे हैं। यहां है.. हमारे देश भारत में। जिंदगी भर दुनिया भर में घूम-घूमकर बैठकें करो, समिट करो, सेमिनार…

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(कहानी) किस्मत

-सुशांत सुप्रिय- रेलगाड़ी ने एक लम्बी सीटी दी और धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ ली। प्लेटफॉर्म पीछे छूट गया। फिर दोनों ओर झुग्गी-झोंपडि़यों की लम्बी कतार दिखने लगी। मैंने बाहर देखना बंद करके डिब्बे के भीतर का जायजा लिया। मेरे ठीक सामने की सीट पर बैठे एक सज्जन कोई धार्मिक किताब पढ़ रहे थे। चालीस-पैंतालीस की उम्र। आंखों पर मोटा चश्मा। उनके बगल में दस-ग्यारह साल का एक लड़का बैठा था जो चलती गाड़ी की खिड़की से बाहर के दृश्य देख रहा था। मैंने अपने बैग से शुक्रवार की साहित्य वार्षिकी निकाल…

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