(कहानी) जहेरथान

-कमलजीत सिंह- अगर बाहर से जाना हो तो सिंहभूम के डिलिया जल-प्रपात जंगलों में जिलिंगहोड़ा गांव को ढूंढना थोड़ा कठिन होगा। लेकिन वहां के निवासियों का साथ हो तो आप हैरान मंत्र-मुग्ध से देखते रह जाएंगे और जिलिंगहोड़ा गांव घने जंगल के बीच से बनती राह में कभी पत्थरों के ऊपर चढ़ते तो कभी उतरते, पहाड़ी फूलों, बेलों और हरियाली की खुश्बुओं में तैरते, देखते-ही देखते आपके सामने आ खड़ा होगा। वहां पहुंचने से जरा-सा पहले तक घने जंगल में नजर न आने वाला और फिर अचानक ही उग आने…

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व्यंग्य : गंजहों के गांव का लोकतंत्र

-श्रीलाल शुक्ल- तहसील का मुख्यालय होने के बावजूद शिवपालगंज इतना बड़ा गांव न था कि उसे टाउन एरिया होने का हक मिलता। शिवपालगंज में एक गांव-सभा थी और गांववाले उसे गांव-सभा ही बनाए रखना चाहते थे ताकि उन्हें टाउन एरियावाली दर से ज्यादा टैक्स न देना पड़े। इस गांव-सभा के प्रधान रामाधीन भीखमखेड़वी के भाई थे जिनकी सबसे बड़ी सुंदरता यह थी कि वे इतने साल प्रधान रह चुकने के बावजूद न तो पागलखाने गए थे, न जेलखाने। गंजहों में वे अपनी मूर्खता के लिए प्रसिद्ध थे और उसी कारण,…

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व्यंग्य : चाटुकारिता के खुले समर्थन में ही सबका भला है!

-विवेक रंजन श्रीवास्तव- प्रशंसा और चाटुकारिता में बड़ा बारीक अंतर होता है। प्रशंसा व्यक्ति के काम की होती है, और चाटुकारिता काम के व्यक्ति की होती है। जिन्हें काम के आदमी को कायदे से मक्खन लगाना आता हो उनकी हर जगह हमेशा से पूछ परख होती रही है। ऐसे लोग राजनीति में, सरकारी दफ्तरों में अफसरों के बीच लाइजनिंग का काम बड़ी सफलता से करते हैं। पुराने समय में राजाओं की चाटुकारिता में काव्य कहे जाते थे, चारण साहित्य आज भी उपलब्ध है जो और कुछ न सही किंचित इतिहास…

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व्यंग्य: थानेदार का बंपर ड्रा

-डा. गोपाल नारायण आवटे- थानेदार साहब की पत्नी की फरमाइशें रोजाना बढ़ती जा रही थीं। वे परेशान थे, आखिर करें तो क्या करें? इधर लोगों में बहुत जागरूकता आ गई थी। थोड़ी भी आड़ीटेढ़ी बात होती कि मानवाधिकार आयोग को फैक्स कर देते थे। कुछ उठाईगीर तो आजकल मोबाइल फोन पर रेकौर्डिंग कर के उन्हें सुना भी देते थे। एक बार तो थानेदार साहब अपनी फेसबुक पर थे कि अचानक एक वीडियो दिखा। उन्हें लगा कि यह तो किस्सा कहीं देखा है। उस वीडियो की असलियत यही थी कि थानेदार…

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नागार्जुन की कविता का भावबोध

-शैलेन्द्र चैहान- बाबा नागार्जुन को भावबोध और कविता के मिजाज के स्तर पर सबसे अधिक निराला और कबीर के साथ जोड़कर देखा गया है। वैसे, यदि जरा और व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है। उनका कवि-व्यक्तित्व कालिदास और विद्यापति जैसे कई कालजयी कवियों के रचना-संसार के गहन अवगाहन, बौद्ध एवं मार्क्सवाद जैसे बहुजनोन्मुख दर्शन के व्यावहारिक अनुगमन तथा सबसे बढ़कर अपने समय और परिवेश की समस्याओं, चिन्ताओं एवं संघर्षों से प्रत्यक्ष…

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गाय पर निबंध (हास्य-व्यंग्य)

-सुरेश सौरभ- गाय एक बहुत सीधा जानवर है, इसलिए इसे लोगों ने चुनावी पशु बना रखा है। गाय हमारी बड़ी अम्मा हैं। गाय के बच्चे सब हमारे भाई-बहन हैं। सब सांड-बैल हमारे पिता समान हैं,और हमें इनका उतना ही सम्मान करना चाहिए जितना हम अपने माता-पिता और बड़े़ बुजुर्गों का करतें हैं इसलिए सभी लोगों को, गाय को अंतरराष्ट्रीय पशु बनाने में व्यापक पहल करनी चाहिए। इस महान कार्य में सभी देशवासियों को अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देना चाहिए, क्योंकि गाय अगर अंतरराष्ट्रीय पशु बन गई, तो यह भारत की बहुत…

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कहानी : एक इंच मुस्कान

-तुलसी पिल्लई- छत पर खड़ी सलोनी नीचे जमीन की ओर देखती हुई यह विचार कर रही थी कि इस तीन मंजिला मकान की ऊंचाई कितनी होगी? पहले भी कई बार वह छत पर ऐसे ही खड़ी होती थी। लेकिन तब ऐसे विचार नहीं आते थे। तब तो मन छत पर ठंडी और गर्म हवाओं से प्रफुल्लित रहता था। दूर-दूर तक रंगीन हरे-लाल-पीले -नीले-गुलाबी छोटे छोटे बल्ब से पूरा घर और गार्डन जगमग आ रहा था। उसके हाथों में मेहंदी और लाल चूड़ियां थी। हर एक लड़की का सपना होता है…

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व्यंग्य : सदाचार का ओवरकोट

-हनुमान मुक्त- रानी ने दरबारियों से कहा कि प्रजा द्वारा हमें दिए गए जनमत से लग रहा है कि प्रजा पूर्ववर्ती शासन में बहुत दुखी थी। शासक एवं उसके नुमाइंदों ने बहुत भ्रष्टाचार फैला रखा था कोई भी सुखी नहीं था। तुम्हें कहीं भी भ्रष्टाचार नजर आए तो उसे तुरंत हमारे सामने हाजिर करो। दरबारियों ने रानी की बात सुनकर गर्दन नीची कर ली। रानी के समझ नहीं आया कि दरबारियों ने ऐसा क्यों किया है? उनकी बातों की अवहेलना कैसे की है। अभी तक तो मंत्रिमंडल का गठन बाकी…

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कहानी : झूठ मत समझना

-रतन लाल जाट- रचना तुम कैसी हो? तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है? और हाँ, कभी मैं आऊँगा तुमसे मिलने। यह बात कभी फोन पर हुई थी रमन की। रमन और रचना ने एक-दूजे को कभी देखा नहीं है। पर कोई यह नहीं कह सकता है कि वे आपस में अपरिचित हैं। दोनों के बीच कहने को दूरी है। वरना दोनों को एक-दूसरे के बारे में पल-पल की खबर है। अभी रचना कोचिंग से आ गयी होगी। कुछ देर बाद रूम पर आकर आराम करेगी और उसके बाद खाना बनायेगी।…

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आईसीयू में देश (व्यंग्य)

-दिलीप कुमार सिंह- एक साहित्यकार राजधानी में था राजधानी सबको जाना ही पड़ता है। मीडिया में जो खबरें बहुत दिनों से आ रही थीं। उनके वास्तविक मायने जानने की उसे उत्सुकता थी। वो भी उनको जानना चाहता था जो ये दावा करते रहते हैं कि वो सब कुछ जानते हैं। किसी ने काफी हाउस बुलाया और कहा कि यहीँ बैठो फिर आगे सोच-विचार करते हैं कि क्या करना है सर्वज्ञों को जानने के लिए। साहित्यकार वहाँ पहुंचा तो बहुत से लिपे-पुते चेहरे वहाँ बनाव-श्रृंगार किये खिलखिला रहे थे। उन्होंने काफी…

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