छिपकली (कहानी)

-सुलक्षणा अरोड़ा- कविता की यह पहली हवाई यात्रा थी. मुंबई से ले कर चेन्नई तक की दूरी कब खत्म हो गई उन्हें पता ही नहीं चला. हवाई जहाज की खिड़की से बाहर देखते हुए वह बादलों को आतेजाते ही देखती रहीं. ऊपर से धरती के दृश्य तो और भी रोमांचकारी लग रहे थे. जहाज के अंदर की गई घोषणा ‘अब विमान चेन्नई हवाई अड्डे पर उतरने वाला है और आप सब अपनीअपनी सीट बेल्ट बांध लें,’ ने कविता को वास्तविकता के धरातल पर ला कर खड़ा कर दिया. हवाई अड्डे…

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व्यंग्य : आटा, डाटा और नाटा

-अशोक गौतम- दोस्तो, आज पूंजीपति और सर्वहारा के बीच का संघर्ष गौण हो गया है या कि सर्वहारा वर्ग पूंजीपतियों से लड़तेलड़ते मौन हो गया है. इसीलिए, समाज में समता लाने वाले वादियों ने भी सर्वहारा के लिए लड़ना छोड़ सर्वहारा के चंदे की उगाही से शोषण की समतावादी मिलें स्थापित कर ली हैं. आज संघर्ष अगर किसी के बीच में है तो बस आटे और डाटे के. अब वे हम से डाटे के हथियार से हमारा आटा छीन रहे हैं. हम से समाज का नाता छीन रहे हैं. हम…

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गहरी जड़ें (कहानी)

-अनवर सुहैल- असगर भाई बड़ी बेचैनी से जफर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जफर उनका छोटा भाई है। उन्होंने सोच रखा है कि वह आ जाए तो फिर निर्णय ले ही लिया जाए, ये रोज-रोज की भय-चिंता से छुटकारा तो मिले! इस मामले को ज्यादा दिन टालना अब ठीक नहीं। कल फोन पर जफर से बहुत देर तक बातें तो हुई थीं। उसने कहा था कि – ‘भाईजान आप परेशान न हों, मैं आ रहा हूँ।’ असगर भाई ‘हाइपर-टेंशन’ और ‘डायबिटीज’ के मरीज ठहरे। छोटी-छोटी बात से परेशान हो जाते…

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कहानी : ‘ठक-ठक’ बाबा

-मिहिर- दोपहर की उजास जब खिड़कियों तले फूटकर भीतर को आती थी, तो उनसे गर्मियों की धूप-छांव कुछ उदास हो जाती थी। तब दोपहर के भोजन मैं कुछ खा-गिरा कर उधम मचाते हम बालकों की टोली को अम्मा कुछ देर सुलाने के लिए बगल में लेट जाती थी। खिड़की उदास। तलैया उदास। मरणासन्न उदासी को तोड़ती मक्खियों की भिनभिनाहट में गांव की बारादरियां हवाओं से लाचार होतीं। दोपहर के समय गांव कुछ उकताया-सा धूप के ढलने का इंतजार करता, सुस्ताया होता था। बालकों के शोर से कुछ पल की निजात…

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व्यंग्य: बनते-बिगड़ते फ्लाई ओवर

-यशवंत कोठारी- जब भी सड़क मार्ग से गुजरता हूं किसी न किसी बनते बिगड़ते फ्लाई ओवर पर नज़र पड़ जाती है। मैं समझ जाता हूं सरकार विकास की तय्यारी कर रही है, ठेकेदार इंजिनियर-कमीशन का हिसाब लगा रहे हैं, और आस पास की जनता परेशान हो रही हैं। टोल नाके वाले आम वाहन वाले को पीटने की कोशिश में लग जाते हैं। फ्लाई ओवर का आकार -प्रकार ही ऐसा होता हैं की बजट लम्बा चौडा हो जाता है। अफसरों की बांछें खिल जाती हैं। सड़क मंत्री संसद में घोषणा करते…

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व्यंग्य : चंदा रे चंदा

-प्रभात गोस्वामी- आज रेडियो पर वर्ष 1971 की फिल्म- ‘लाखों में एक’ का गीत ‘चंदा ओ चंदा, किसने चुराई तेर -मेरी निंदिया’, सुन रहा था कि अचानक हमारे एक मित्र छम्मन जी, आ टपके. राजनीति के अखाड़े में एक ‘नवजात पार्टी’ के साथ जुड़कर छम्मन अपना भविष्य तलाश रहे हैं. बोले- भाई साहब क्या गाना है ? चुनाव आते ही हम सभी -जनप्रतिनिधियों की नींद इस ‘चंदा’ ने ही उड़ा रखी है. वो गुनगुनाने लगे ‘-तेरी और मेरी, एक कहानी/हम दोनों की कदर किसी ने ना जानी’. आजकल छोटी पार्टियों…

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लघुकथा : बोलता मटका

-सिद्धार्थ संचोरी- एक बार एक कुम्हार एक मटका बना रहा था। तो मटके और कुम्हार के बीच रोज नोंक-झोंक होती रहती थी।  मटका जब भी कुछ बोलता कुम्हार उसे पीटना शूरु करता। एक दिन जब मटका बड़ा हो गया तो उसे कुम्हार अपनी दुकान पर ले गया। अब जब भी ग्राहक उस मटके की और देखते तो कुम्हार उसे दूसरे मटके दिखा देता। इस बात से मटका बहोत नाराज रहता था। कभी कभार नोंक-झोंक  ज्यादा हो जाती तो मटके की और मरम्मत की जाती या ये कहो के ठोक पीट …

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कहानी: पीपल का पेड़

-डॉ. गीता गीत- आज धीरेन्द्र दा के सारे कार्यक्रम सम्पन्न हो गये। एक-एक करके सभी मेहमान जा चुके हैं। सबेरे पंकज भी परिवार सहित अपने मामा ससुर के घर चला गया है। पर जाते-जाते धीरा बौदी से बोल गया है-मां, तुम खूब सोच लो, मैं कल आऊंगा। मुझे तुम्हारे फैसले का इंतजार है। तुम सोच समझकर कल अपना फैसला बता देना। इक्का-दुक्का मिलने वालों का क्रम जारी है। फिर भी लग रहा है चारों ओर निस्तब्धता व्याप्त है। शाम घिर आयी है। धीरा घर के आंगन के पीपल के पेड़…

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अपेक्षाएं (कहानी)

-सुभाष चंद्र कुशवाहा- दशहरे की छुट्टियों में मैं गांव में था। घर-बार, बाग-बगीचे, ताल-तलैये, बंसवारी अपनी जगह थे, थोड़ी-बहुत आकार-प्रकार की भिन्नता के साथ। पुराने संगी-साथियों में कुछ थे, कुछ काम-धंधे के वास्ते बाहर गए थे। धान की कटाई हो चुकी थी। समीप के बाजार में बजते दुर्गापूजा के नगाड़े, देर रात तक सुनाई देते। बरसात से धुले मौसम का रंग-रूप निखरा हुआ था। इस बार गांव पहुंचने पर पहले जैसा उल्लास नहीं दिखा। बाबू जी में और न पट्टीदारी की भौजाई चहकती हुई आई थीं। दोनों मामा मिलने नहीं…

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व्यंग्य : कहां दाल, कहां मुर्गी!

-ब्रजेश कानूनगो- मुर्गी फिर चर्चा में है इन दिनों। महंगाई के दौर में कुछ अलग ढंग से चर्चा में है। प्रजातंत्र में किसी भी चीज पर चर्चा की जा सकती है। संविधान में ही व्यवस्था दी गयी है कि राष्ट्र के नागरिक किसी भी बात पर पूरी स्वतंत्रता से अपने विचार प्रकट कर सकते हैं। चाहें तो सेंसेक्स की चिंता करें या आर्थिक मंदी की। सड़क के गड्ढों की बात करें या संसद के अवरोध की। भ्रष्टाचार पर लगाम के उपायों की करें या बढ़ती महंगाई पर रोकथाम की। कोई…

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