व्यंग्य: थानेदार का बंपर ड्रा

-डा. गोपाल नारायण आवटे-

थानेदार साहब की पत्नी की फरमाइशें रोजाना बढ़ती जा रही थीं। वे परेशान थे, आखिर करें तो क्या करें? इधर लोगों में बहुत जागरूकता आ गई थी। थोड़ी भी आड़ीटेढ़ी बात होती कि मानवाधिकार आयोग को फैक्स कर देते थे। कुछ उठाईगीर तो आजकल मोबाइल फोन पर रेकौर्डिंग कर के उन्हें सुना भी देते थे। एक बार तो थानेदार साहब अपनी फेसबुक पर थे कि अचानक एक वीडियो दिखा। उन्हें लगा कि यह तो किस्सा कहीं देखा है। उस वीडियो की असलियत यही थी कि थानेदार साहब एक शख्स को पंखा बना कर लात, जूतों, डंडे से मार रहे थे। थोड़ी देर बाद जब जूम कर के कैमरा थानेदार के चेहरे पर गया, तो पता चला कि अरे, यह तो वे खुद ही हैं। कुछ महीने पहले उन्होंने एक अपराधी को जेब काटने पर मारा था और उस से जेबकटी का अपना हिस्सा मांगा था। पर उस ने नहीं दिया था, तब उसे पंखे पर लटका कर पिटाई की थी।

यह वीडियो वही था। इसी के चलते उन का तबादला हो गया था। वे तो शानदार सैटिंग वाले थे, हमेशा मंदिर में भिखारी से ले कर पुजारी और भगवान को चढ़ावा चढ़ाते थे, जिस की बदौलत लाइन हाजिर नहीं हो पाए थे। बात वैसे इतनी सी थी कि एक जेबकटी की रिपोर्ट आई थी। रिपोर्ट करने वाले बंदे ने बताया कि 6 हजार रुपए निकाले गए थे। बाजार का दिन था और उस दिन जेबकटाई का ठेका पोटा को दिया गया था। उसे पकड़ कर जब पूछा गया, तो उस ने कसम खा कर कहा था कि कुल जमा 8 सौ रुपए थे। अब सच्चा कौन था और झूठा कौन था, पता नहीं। बस, यही बात पता करने के लिए उसे पंखे पर लटका कर कुटाई की थी और सच की खोज को आम कर देने के चलते थानेदार साहब बदनाम हो गए थे।

बाद में पता चला कि जिस की जेब कटी थी, वही झूठ बोला था। उस की घर वाली ने साड़ी खरीदने के लिए रुपए जेब से निकाल लिए थे। थानेदार साहब की बहुत इच्छा हुई कि पोटा से माफी मांग लें। लेकिन वरदी के घमंड के चलते वे ऐसा नहीं कर पाए, क्योंकि पोटा ने बारबार कहा था, सर, बेईमानी के काम में ईमानदारी बहुत जरूरी है। मैं ईमानदारी से बता रहा हूं। लेकिन जो होना था, वह हो ही गया था। पर आज तक वे जान ही नहीं पाए थे कि आखिर किस ने वीडियो शूट किया था, क्योंकि आजकल तो पैन में भी शूटिंग की सहूलियत आने लगी है। जो नया थाना मिला था, वहां के भूखेनंगे, अमीर सब अच्छे दिनों की औलाद थे। उम्मीद से भरे हुए। महात्मा गांधी की बातों पर चलने वाले कि मामला आपस में सुलझा लो बेहतर है, इसलिए रिपोर्टारिपोर्टी कुछ होती नहीं थी। थानेदार साहब को हैरत थी कि आखिर ऐसी अहिंसक जगह पर थाना खोलने की जरूरत क्या थी? जिंदगी में अगर आप एक बार जो खर्चा करने लगें, उस पर लगाम लगाना अगले जन्म में ही मुमकिन है। पत्नीजी को जो खर्च की आदतें लग गई थीं, वे कम होने का नाम ही नहीं लेती थीं। रिश्तेदार भी भिखारियों की तरह आ कर जीजाजी, मामाजी कहते हुए महीनों तक पड़े रहते थे। ऐसे में माली हालत भिखारियों जैसी हो जाना जायज थी।

थानेदार साहब ने पुराने घाघ अपने हवलदार को बुला कर पूछा, यहां कुछ महीने और रहा, तो पैंटशर्ट उतार कर तीरथ जाना होगा। हवलदार ने उन्हें तसल्ली दी और अच्छे दिनों का वास्ता देते हुए कहा, इतंजार का फल मीठा होता है। आप इंतजार करें। बिल्ली के भाग्य से छींका टूट भी गया। मामला कुछ ऐसा हुआ कि कहीं एक लड़के और लड़की का चोंच लड़ाने का मामला था। कहानी में अमीरीगरीबी की जगह जातपांत आ गई। लड़की वालों ने कहा कि प्राण जाए पर जाति न जाए और लड़के को प्यार से बुला कर समझाया, मनाया और जब उस के दिमाग में बात नहीं गई, तो एक लट्ठ जो दिया तो वह मजनू ऐसा गिरा कि खड़ा ही नहीं हो पाया।

उसी दिन एक रिपोर्ट और आई कि एक घर में सेठसेठानी के यहां 2 लोगों ने बंदूक की नोक पर लूटमार कर ली थी। दोनों की रिपोर्ट आ गई और थानेदार साहब ने जांच के लिए एक हवलदार को लगा दिया। इधर पिछले हफ्ते घरवाली ने नोटिस दे दिया था कि अगर कुछ कमाई नहीं की, तो वह मायके चली जाएगी। उसी समय यह सुनहरे 2 केस हो गए। थानेदार साहब ने हवलदार को अपने कमरे में बुला कर खास हिदायत दी, पहले लूट वाले केस को सुलझाते हैं। हत्या वाला तो आईने की तरह साफ है। हवलदार थानेदार से ज्यादा शातिर था और उस ने करतब दिखाना शुरू कर दिया। जहां डकैती हुई थी, उस गांव के और उस गांव से लगे 10 गांवों के उठाईगीरों, गुंडों के अलावा शरीफ घरों के एक दर्जन लड़कों को पकड़ लिया। थाने के नाम से उन सब को ठंड लगने लगी थी। दिल्ली से और कुछ के लोकल विधायक, सांसद के फोन आने लगे। जिन के फोन आए, उन्हें एक अलग कमरे में बिठा कर चाय का आर्डर करवा दिया। चाय के बाद उन से माफी मांगते हुए एक घंटे और रुक कर कानून की मदद करने की गुजारिश की।

चाय की रिश्वत से ही लड़के मान गए और शांति के साथ मोबाइल पर फिल्में देखने लगे। जिन के फोन नहीं आए थे, उन्हें एकएक कर के कमरे में ले गए और उन्हें बताया गया कि इस मुकदमे की जमानत नहीं होती है और वकील की फीस में 50 हजार खर्च होंगे, फोकट में बदनामी और होगी। टुच्चे पत्रकार चटकारे लेले कर खबर छापेंगे सो अलग। हवलदार ने थानेदार साहब के सामने ऐसा दिल दहला देने वाला सीन पेश किया कि सब की घिग्घी बंध गई। कुछ प्रवचन सुन कर रोने लगे, कुछ थानेदार साहब के पैरों में गधे की तरह लोटपोट हो गए। हैरत की बात यह थी कि 2 आदमियों ने लूटा और बुलाया गया था 80 को। 20 थाने में फोन से छूट गए थे। अब जो रकम थी, वह 60 लोगों से ही वसूल करनी थी। उन के मोबाइल, पैन, चश्मे सब उतार कर गुप्त जांच कर ली गई थी और थानेदार साहब कहीं से 2 नंगे तार ले आए, उन्हें बिजली के स्विच में डालते हुए बोले, इसे छुआने के बाद जो 750 वोल्ट का करंट लगेगा, तो देश में आबादी रुक जाने में तुम सहयोगी हो जाओगे। तार देख कर भविष्य की चिंता कर के आखिर वे सबकुछ देने को तैयार हो गए, जिस की मांग रखी गई थी। कुछ कमजोर, नंगे लोग भी थे। कुल जमा तकरीबन 3 लाख रुपए की कमाई हो गई और 20 हजार हवलदार, पत्रकारों को और ऊपर भिजवाने के बाद भी 2 लाख का मुनाफा हो गया था। जो 2 लुटेरे थे, वे अभी भी खोजे जाने बाकी थे। वैसे, पूरी लूट 10-20 हजार रुपए की हुई थी। दूसरा केस तो इश्कमुहब्बत का था। शहर के सब आशिकों को पकड़ कर थाने ले आए और मर्डर केस के बारे में जो मुगलेआजम से ले कर प्रेम कहानी के आखिर तक कहानी सुनाई गई, तो आशिकों ने मां कसम खा कर कहा, वह हमारी बहन जैसी हैं। तब ही तो सालो, तुम ने अपने जीजा का मर्डर कर दिया, थानेदार साहब ने गुस्से में कहा। सब प्रेमी माथा ठोंकने लगे, कैसे मुंह से बहन शब्द निकल गया। मर्डर केस में मिली उम्रकैद में कैसे जवानी अंधेरे में डूब जाएगी…

उस महाकाव्य को हवलदार ने पढ़ कर सुनाया, तो सब थरथर कांपने लगे और इस केस में भी थानेदार साहब ने 6 लाख रुपए दक्षिणा में लिए थे। हत्यारे तो पहले से ही पता थे। उन का केस कमजोर करने के नाम पर एकएक लाख रुपए अलग से लिए और मामला मारने का नहीं, बल्कि एक हादसे का बना दिया गया था। जिनजिन को थानेदार साहब ने लूट या हत्या में बुलवाया था और छोड़ दिया था, वह सब उन के गुण गाते थक नहीं रहे थे और कुछ ने जो चाय पी लेने के बाद घर का रास्ता नापा था, वे भी खुश थे। कुछ छोटीमोटी शिकायत हुई भी तो विधायक, सांसद ने वे शिकायतें कचरे के डब्बे में फेंक दीं। वे थानेदार साहब का एहसान भूले नहीं थे कि उन के फोन करते ही थानेदार साहब ने चाय पिला कर उन्हें इज्जत के साथ छोड़ दिया था। थानेदार साहब बहुत खुश थे कि चलो, उन का लकी बंपर ड्रा खुल गया था। वे इंतजार कर रहे थे, काश, ऐसी लौटरी हर महीने खुलती रहे, तो नीचे से ऊपर तक सब खुश रहेंगे। दुनियादारी निभाना इसी को तो कहते हैं। थानेदार साहब आजकल बहुत खुश हैं और नई बंपर लौटरी का इंतजार कर रहे हैं।

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