(व्यंग्य) डेमोक्रेसी के शहंशाह

(डिस्क्लेमर-नीचे दिया किस्सा पूरी तरह मनगढ़ंत है। ऐसा किसी देश में नहीं होता। हिंदुस्तान में होने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता।)

एयरपोर्ट पर चौक-इन की लाइन लगी थी। यात्री ट्रॉलियों पर सामान लादे अंदर आ रहे थे। तभी लाउड स्पीकर पर घोषणा हुई -बाअदब, बामुलाहिज़ा, होशियार! शहंशाहे डेमोक्रेसी, जनाबे एमपी, जनता के सेवक, तशरीफ़ ला रहे हैंऽऽऽ। लोगों को धकेल कर रास्ता साफ करवा दिया गया। सारे यात्री एक ओर ऐसे खड़े हो गये जैसे कह रहे हों-एमपी साहब, आप आगे जाओ। हमारा क्या है, हम कल चले जाएंगे। आपके बिना तो देश के काम अटक जाएंगे। तो, लालबत्ती वाली कार डिपार्चर गेट के सामने आ कर रुक गई। लेकिन उसमें से कोई उतरा नहीं। क्योंकि दरवाज़ा खोलने को एयरपोर्ट मैनेजर पहले से मौजूद नहीं था। एयरपोर्ट मैनेजर काम छोड़ कर भागता हुआ आया। फिर भी कार तक पहुंचने में उसे दस सेकंड की देर हो गयी। मैनेजर ने दरवाज़ा खोला। लाल बत्ती वाली कार से, एक व्यक्ति उतरा। उसके सिर पर भी लाल बत्ती लगी थी। लाल बत्ती डेमोक्रेसी के शहंशाहों का ताज होती है। तो, शहंशाहे डेमोक्रेसी ने कार से उतर कर एयरपोर्ट मैनेजर को डांटा, तुम दस सेकंड देरी से आये! ऐसे एयरलाइन चलाओगे? एयरपोर्ट मैनेजर कह सकता था, सर, आप खुद एक घंटा देर से आये हैं। मैं आधा घंटा इंतज़ार करके चला गया था। लेकिन, उसने ऐसा नहीं कहा। ऐसी बात शहंशाह अकबर के ज़माने में कही जा सकती थी। अकबर के दरबार में दरबारी जान की अमान पाऊं कह कर मन की बात बोल सकता था। शाही युग में जान की अमान मिल जाती थी। डेमोक्रेसी में नहीं मिलती। डांट खा कर एयरपोर्ट मैनेजर के मुंह से बस एक शब्द निकला, जी! शहंशाहे डेमोक्रेसी ने फिर डांटा, अब जी-जी करते रहोगे या माबदौलत को अंदर भी ले जाओगे? मैनेजर ने मन में कहा, सर, आप न मा-बदौलत हैं, न बाप-बदौलत। आप बस हाईकमान बदौलत हैं। लेकिन, वह बोला नहीं। उसने इशारा किया और असिस्टैंट मैनेजर ने शहंशाहे डेमोक्रेसी का बैग उठा लिया। मैनेजर शहंशाहे डेमोक्रेसी के सामने उस मुद्रा में झुक गया, जिसके बारे में दुष्यंत कुमार ने मैं सजदे में नहीं था कहा था। फिर कमर से आधा झुका मैनेजर, बार-बार कोरनिश करता हुआ एमपी साहब को वीआईपी लाउंज की ओर ले चला। मैनेजर का झुका सिर एमपी महोदय की दिशा में था, और पिछवाड़ा उस दिशा में जिधर जाना था। कोरनिश करता मैनेजर पीछे की ओर जा रहा था और नेता जी उसके पीछे-पीछे आगे की ओर। डेमोक्रेसी में यही होता है-जनता पीछे जाती है, नेता आगे। वीआईपी लाउंज में, डिप्टी मैनेजर शहंशाहे डेमोक्रेसी का प्रिय पेय ले कर खड़ा था। काजू-पिस्ता-बादाम के ढेर सजे हुए थे। शहंशाह ने पेय का एक सिप लिया और पिस्ता टूंगते हुए कहा, स्वागत की तैयारी ठीक नहीं थी। तुम दरवाज़े पर दस सेकंड देर से पहुंचे। फ़्लाइट में तो सब इंतज़ाम सही है न? एकदम सही है, सर। पिछली बार जैसी गड़बड़ नहीं होनी चाहिए? नहीं होगी जिल्ले डेमोक्रेसी। कुछ गलत हो जाए तो बंदे की गरदन हाजि़र है। एमपी साहब मेवे टूंगते गये और जाम में डूबते गये। एमपी साहब की शिकायत वाजिब थी। पिछली दो फ़्लाइटों में गड़बड़ हो गयी थी। पहली बार, एयरहोस्टेस ने एमपी साहब की ओर अलग से ध्यान नहीं दिया था। दूसरी बार, एयरहोस्टेस शहंशाहे डेमोक्रेसी के स्टैन्डर्ड की नहीं थी। न बलखाती चाल, न लहराते बाल, न उमर सोलह साल ! और, उसे तमीज़ भी नहीं सिखाई गयी थी। इस बार एयरहोस्टेस को समझा दिया गया था-देखो, शहंशाहे डेमोक्रेसी सुरूर में बहक जाएं तो बखेड़ा मत करना। एयरलाइन को परेशानी से बचाना। युग बदलते हैं तो हालात बदल जाते हैं। लेकिन, हालात बदलने से सब कुछ नहीं बदल जाता। शाही युग न रहे तो भी शहंशाह रहते हैं। वैसे, शाही युग में कोई एक शहंशाह होता था। डेमोक्रेसी में अनेक होते हैं। ज़ाहिर है, जितने शहंशाह होंगे, शहंशाही भी उतनी ही होगी। लोग यह बात समझते क्यों नहीं?

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