(व्यंग्य) हमें खेद है

-मनोहर पुरी-

कनछेदी के हाथ में न्यायालय की मोहर लगे सरकारी लिफाफे को देख कर मैं उसी प्रकार चौंक पड़ा था जैसे कोई मां अपने बच्चे के हाथ में पकड़े हुए सांप को देख कर चौंकती है। कनछेदी के बासी बैंगन जैसे लटके हुए मुहं ने मुझे और भी अधिक चिन्तित कर दिया था। सोचा न जाने कनछेदी किस पुलिसिया मुसीबत में फंस गया है। पुराने जमाने में जिस प्रकार गांव में किसी के घर तार आने पर मातम छा जाता था वैसी ही कुछ मुर्दनी कनछेदी के मुखमण्डल पर दिखाई दे रही थी। इस समय मुझे कनछेदी का चेहरा ग्रहण लगे चन्द्रमा सा दिखाई दे रहा था।

मुझे पास आता देख वह मेरी ओर तेजी से लपका जैसे अदालतों में वकीलों के दलाल किसी मुद्दई को देख कर झपटते हैं। इस लपकने झटकने की सोच से ही मुझे लगा एक और झटका। आम तौर पर कनछेदी मुझे देख कर आंखें चुराता था और कुछ जरूरी भी कहना होता था तो धीरे धीरे बताता था। इससे पहले कि मैं उससे पूछता कि कनछेदी क्या हुआ है, तुम्हारा कमल सरीखे खिले रहने वाला चेहरे को किस बुरी नजर ने छुआ है। उसने हाथ में पकड़ा बंद लिफाफा मुझे थमाते हुए कहा, ”अच्छा हुआ भाई साहब आप यहीं मिल गये। नहीं तो आपके घर तक पहुंचते पहुंचते मेरे तो प्राण ही निकल जाते। न जाने क्या बबाल सुबह सुबह कोर्ट का अर्दली घर में आ कर डाल गया है। जैसे मेरी तो जान ही निकाल गया है।’

मैंने लिफाफे को उलट पलट कर देखा। उसमें साफ तौर पर पाने वाले का नाम कनछेदी ही लिखा था। उसे न्यायालय के त्रुटि निवारण विभाग द्वारा भिजवाया गया था। मैंने कहा, ”कनछेदी घबराने की कोई बात नहीं। कोर्ट का कोई नोटिस इत्यादि आया होगा। इसे हम देख लेते हैं। जैसी जरूरत होगी इसका उत्तार दे देंगे।”

”पर मेरा तो इन दिनों कहीं किसी से कोई लफड़ा नहीं हुआ और न्यायालय के लेवल की तो मेरी औकात ही नहीं। फिर क्यों…….?” कनछेदी हवा में हिलते पत्तो की भांति कांप रहा था।

इससे पहले कि कनछेदी को दिल का दौरा पड़े मैंने फटाफट वह लिफाफा खोल डाला। उसे सरसरी तौर पर पढ़ते हुए मैंने कहा, ”कनछेदी पत्र अंग्रेजी भाषा में है मैं तुम्हें इसका हिंदी अनुवाद करके बताता हूं और इसमें लिखी एक एक बात साफ साफ समझाता हूं। लिखा है–

महोदय,

आपकी ओर से प्रेषित आपकी कन्या के विवाह का निमंत्रण माननीय न्यायाधीश महोदय के नाम आया था। वह निमंत्रण पत्र हमारे त्रुटि निवारण विभाग को त्रुटि निवारण करके उचित कार्यवाही के लिए अग्रेषित किया गया है। इस निमंत्रण पत्र में निम्नलिखित त्रुटियां पायीं गई हैं। कृपया इन्हें तुरन्त दूर करके भिजवायें ताकि हम इसे माननीय न्यायाधीश महोदय की सेवा में पेश कर सकें और वे इस पर आवश्यक कार्यवाही करने का आदेश दे सकें। आपके द्वारा त्रुटि निवारण के पश्चात ही हम इस पर टिप्पणी कर सकेंगे और उसी के अनुरूप माननीय न्यायाधीश आप द्वारा आयोजित समारोह की शोभा बढ़ाने के लिए पधार सकेंगे

इस निंमत्रण पत्र को अंग्रेजी और हिन्दी दो भाषाओं में छापा गया है। इसमें लिखी हिन्दी का अनुवाद अंग्रेजी में करवा कर भिजवायें। इतना ही नहीं निमंत्रण पत्र अंग्रेजी के ऐसे अक्षरों में छापा गया है जो कि आज कल प्रचलन में न होने के कारण न्यायालय में मान्य नहीं है। सुनहरी स्याही में छपे होने के कारण इन्हें ठीक से पढ़ पाना संभव नहीं है। अनेक शब्द धुंधले होने के कारण अस्पष्ट हैं। कृपया ऐसा कार्ड भिजवायें जिसके अक्षरों को ठीक से पढ़ा जा सके ताकि हर बात को साफ तौर पर समझा जा सके।

कार्ड के ऊपर आपने एक मंत्र लिखा है। यह मंत्र जिस ग्रंथ से लिया गया है उस मूल ग्रंथ की सत्यापित कापी कार्ड के साथ संलग्न करें। इस पर गणेश का धार्मिक चिन्ह भी छापा गया है। न्यायालय पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष होता है इसलिए किसी भी धार्मिक चिन्ह को प्रोत्साहित नहीं करता। उचित हो इस धार्मिक चिन्ह को हटा दिया जाये।

कार्ड के बाहर लिफाफे पर जो शीर्षक लिखा गया है वह भीतर लिखे शीर्षक के साथ मेल नहीं खाता। कृपया स्पष्ट करें कि इसे क्यों अनदेखा किया जाये। कार्ड पर डाक टिकट का प्रयोग किया गया है। यह टिकट न्यायालय के लिए वैध नहीं हैं। वैसे भी कम मूल्य का टिकट लगाया गया है। कृपया आवश्यक राशि के स्टाम्प पेपर के साथ कार्ड संलग्न करके भिजवायें।

कार्ड में वर्णित कार्यक्रम क्रमबद्ध तरीके से और तिथिवार नहीं लिखा गया है। इसे तिथिवार ठीक करके भिजवायें। इतना ही नहीं कार्ड की सत्यता को सत्यापित करता हुआ प्रमाण पत्र साथ में सलंग्न नहीं किया गया है। ऐसा प्रमाण पत्र नोटरी अथवा ओथ कमीशनर से स्त्यापित करके भिजवायें।

यह आवश्यक है कि आप उपरोक्त सभी त्रुटियों का निवारण करते हुए हमें नया कार्ड भिजवाये ताकि हम उसका निरीक्षण परीक्षण करके त्रुटिरहित कार्ड साहब की सेवा में प्रस्तुत कर सकें और वे आपके समारोह की शोभा बढ़ा सकें। पत्र मिलने के एक सप्ताह के भीतर उत्तार न देने पर इसे निरस्त समझा जायेगा।

कनछेदी पूरा पत्र ध्यान से सुन रहा था और मन ही मन उसकी एक एक बात को गुन रहा था।

मैंने कहा कनछेदी क्या तुने माननीय न्यायाधीश को अपनी बिटिया के विवाह का निमंत्रण भिजवाया था और मेरे को इस विषय में कुछ भी नहीं बताया था। यह उसी निमंत्रण पत्र का जवाब है। अब इसका उत्तार देने के लिए तुम्हारा क्यो खस्ता हाल है।

कनछेदी ने कहा, ”भाई साहब मामला न्यायालय का है। समय पर उत्तार न दिया तो कोई समन आयेगा और कुछ गड़बड़ हुआ तो वारंट में बदल जायेगा। आप तुरन्त इस का उत्तार भिजवाइये और न्यायालय के बाबुओं को साफ साफ समझाइये। उन्हें लिखिये कि हमें खेद है कि अब साहब को त्रुटिरहित कार्ड भिजवाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उनकी विवाह में सम्मिलित हो कर शोभा बढ़ाने की बची कोई सूरत नहीं है। क्रमबद्ध न होने पर भी विवाह तिथिवार सम्पन्न हो चुका है।

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