व्यंग्य : जहरीला कौन

-हरिशंकर गजानन प्रसाद देवांगन-

बात लगभग उन्नीस सौ पचास के आसपास की है। एक गांव में, एक किसान की अचानक मौत हो गई। मौत किसलिए हुई, कारण पता नही चला। कारण ढूंढने वाले को फटकार ही मिली थी तब। समय निकल गया। अचानक मरने वालों की संख्या में इजाफा होने लगा। मौतों की बढती आंकडों ने, कुछ लोगों के पेट में, दर्द पैदा किया। प्रशासन पर दबाव बना। हल्के फुल्के जांच के बाद सरकार ने लोगों को बताया कि जमीन से जुड़े, लोगों की, अकाल मृत्यु का कारण, कोई और नहीं, बल्कि, जहरीले सांप है, जिसके काटने से इनकी मृत्यु हो रही है। जनता को इनसे बचने के उपाय बताए जाने लगे। इसके बाद भी अकस्मात मौंतों का सिलसिला कम नही हुआ, बल्कि दिनों दिन बढ़ती गई। सरकार ने, लोगों को, खेतों में, खलिहानों में, जंगलों में जाने से मना किया, और जरूरी होने पर ही सावधानी से जाने की सलाह दी। पर, जिनकी रोजी रोटी ही खेतों और खलिहानों से चलती हो वह कैसे नही जाएगा? तब सरकार ने लोगो को खेतों खलिहानों में जाने से पाबंदी लगाने का उपाय ढूढा। एक एक्ट बनाकर, जमीनों को, उद्योगपतियों को देना शुरू किया और यह भ्रम भी फैलाया कि, हमने, किसानों को, सांपों से बचाने के लिए, जमीन किसानों से लेकर बड़े घरानों को दी। परंतु, लोगों की मौत की बाढ़ तब भी नही रूकी।

तब सरकार के सलाहकारों ने, सांपों को ही मरवा देने का, उपाय बताया। बस फिर क्या था, देखते ही देखते सांपों की संख्या, तेजी से घटने लगी। सांपों को चिंता हुई। सारे जंगली जानवरों की मीटिंग में तय हुआ कि, कोई भी, मनुष्यों को न काटे, अन्यथा, उसका भी वही हश्र होगा, जो सांपों का हो रहा है। परंतु सांपों ने जब बताया कि, ये मौतें, उनके काटने से नहीं हुई, तो सभी को आश्चर्य हुआ। जानवरों ने, सरकार के समक्ष अपनी बात रखी। और सांपों को इस तरह बेमौत मारने से, रोकने की गुहार लगायी। सरकार ने सांपों को जहरीला बताते हुए, पहले तो जानवरों की बातों को मानने से इंकार कर दिया, फिर भी, विभागीय जांच कराने का आश्वाशन दिया। इस बीच विभिन्न पर्यावरणवादियों ने, संयुक्त राष्ट्र संघ तक गुहार लगा दी। संयुक्त राष्ट्र ने, सरकार को, जांच के लिए वित्तीय सहायता की पेशकश की। जानवरों के दबाव में, हमेशा झुकने वाली सरकार ने, मुफ्त के पैसों से, अलग जांच आयोग बिठाने की बात स्वीकार कर ली।

छह महीने के लिए, एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन कर दिया गया। खुले में हो रही सुनवाई में, सांपों को बात रखने का पहला मौका दिया गया। सांपों ने बताया कि दृ वास्तव में हम जहरीले हैं, परंतु कुछ वर्षों से, हमने, किसी भी मनुष्य को, काटना तो दूर, देखना तक बंद कर दिया है। और यह बात भी सोलह आने सच है कि, जमीन से जुड़े लोगों के, असमान्य मौत के पीछे हमारा नहीं, बल्कि मनुष्यों का ही हाथ है। उसने अपने तर्क में बताया कि, उन्नीस सौ पचास के पहले, हम उसी मनुष्य को ही काटते थे, जो हमारे रास्ते में बाधक बन जाता था, या हमको उसके सामने पड़ने से, उससे भय हो जाता था। तब हमारे जहर के प्रभाव से, उनका बच पाना सम्भव ही नही था। कुछ समय बाद, हमने देखा कि, मनुष्य ही मनुष्यों के खून को पी रहे हैं, तब, हमने सोचा-मनुष्यों के खून में, जरूर कोई न कोई अच्छी बात होगी, बस यही सोंचकर हमने भी लगातार, सिर्फ साधारण मनुष्यों को काटने का प्रयास किया। तभी हमारे दिमाग में एक बात और आयी कि, जब मैले कुचैले, पसीने से लथपथ शरीर का खून, इतना मीठा होता है, तो फिर, जो साफ सुथरे सफेद लिबास में, चिकने चुपड़े चेहरों में, खुशबूदार इत्र की महक बिखेरे रहते हैं, उनका खून कितना मीठा होता होगा, बस यही सोचकर ऐसे लोगों को भी निशाना बनाया, तब हमने जाना कि ये सभ्य मनुष्य भी हमारे ही जैसे हैं, ये नहीं मरे जज साहेब। यही वह समय था, जब मनुष्यों को भी सांप कहकर पुकारा जाने लगा था।फिर हम लोगों ने मनुष्यों को काटने का सिलसिला ही खत्म कर दिया। जज साहब, वक्त बीतते बीतते, इनके तरक्कियों का अंदाज लगा पाना, आपके लिए भी सम्भव नहीं। खेल खेल में, एक दिन हमारे कुछ साथियों ने मनुष्यों के खून की मिठास को तलाशते, कुछ लालबत्तीधारी सभ्य से दिखने वालों को काटने की हिमाकत कर की। थोड़ी देर बाद, कुछ सांप की मौत हो गयी। कुछ सांप कुछ वर्ष तक तड़पते रहे, जब दर्द नहीं सह सके तो फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली, कुछ अभी भी तड़प रहे हैं, वे न बैठ सकते, न उठ सकते, इनकी गिनती न जीने वालों मे कर सकते, न मरने वालों में। इसी समय से हम लोगों ने किसी भी साधारण मनुष्य तक को भी नहीं काटने का प्रण ले लिया। तब हमने जान लिया कि साफ सुथरा दिखने वाले सभ्य मानुष के खून में इतना जहर है तो मैला कुचैला दिखने वाला कितना जहरीला होगया होगा। हमने मनुष्यों की प्रगति को भांप लिया। अब आप बताइए, हम कहां जहरीले हैं? हमसे अधिक जहरीला, तो आज का आदमी है।

मनुष्यों ने जैसे ही, सांप का बयान सुना, रैली, धरना प्रदर्शन शुरू हो गया। सांपों के विरूद्ध, निंदा प्रस्ताव पारित होने लगे। इस चक्कर में, पीड़ित रिश्तेदारों का, बयान दर्ज नही हो पाया। आयोग का कार्यकाल, कितने बार, छह छह महीने के लिए बढ़ाया जा चुका था। अब, उसने सांपों के बयान के आधार पर, रिपोर्ट बनाने का फैसला कर लिया, तभी, अचानक दुखद खबर मिली दृ वह जज, खुद किसी का शिकार होकर, दुनिया से चल बसा-नाम हुआ फिर से, सांपों का। फाइल बंद कर दी गयी। शासन ने मनुष्यों के गुस्से को भुनाते हुए, फिर ऐलान कर दिया दृ जहां कहीं भी सांप दिखे, तुरंत उसकी इहलीला समाप्त कर दो। सांप बहुत डर गए। किसी तरह, किसी के आस्तीन में घुसकर, अदालत के शरण में जा पहुंचे।

अदालत में सांपों ने बताया कि-हमें बदनाम कर, हमारे कौम को खत्म करने की साजिश रची जा रही है। भारत, जब से आजाद हुआ है, तब से आज तक, बहुत ही कम मौतें, हमारे काटने से हुई, उससे कई हजारोंगुना अधिक मौतें, किन कारणों से हुई, आज तक अज्ञात है। इस अज्ञात कारण को ढूंढने की कोशिश, आज तक किसी ने नहीं की, हर अचानक मौत के पीछे, हमारा हाथ बताकर, हमारे परिवार के साथ, यह कैसा खिलवाड़? क्या वाकई तुम किसी को नहीं काटते? कभी कभी काटते हैं जज साहब, पर उससे कोई मरता नही। क्योंकि, हमें जबसे इस बात का अंदेशा हो गया कि हमें मारकर हमारे जहर का दुरूपयोग हो रहा है तब से, हमने अपना जहर छुपा दिया। तुम झूठ तो नही बोल रहे हो? हम आदमी नही, सांप हैं-जज साहब, हम झूठ नही बोलते। पर, हम मनुष्यों को नही बता सकते कि, जहर कहां छिपाया, केवल सांपों को बताते हैं, इसलिए आपको जगह बताना या दिखाना सम्भव नहीं।

सरकारी वकील ने इसे, झूठ करार देते हुए, जिरह में भाग लेते हुए, मरने वालों शरीरों के मेडिकल रिपोर्ट दिखाई। सभी मौतों में, सांप के जहर को, कारण बताया गया था। सांपों ने, उक्त जांच को गलत बताते हुए, पुनः जांच की अपील की। अदालत ने, अनेक मृत शरीरों को खंगालना शुरू किया। कुछ ताजे शव भी मिल गए। विभिन्न परीक्षणों से मालूम हुआ, सांप काटने का कहीं निशान नहीं मिला, परंतु मरने का तरीका हूबहू सांप काटने जैसा ही था, पर एक अंतर यह था कि, जो भी मरा था, वह, बहुत तड़प तड़प कर मरा था। कुछ खून के सेंम्पल भी मिले दृ पर गंध बड़ी अजीब थी। किसी में चारे का गंध, किसी में गोला बारूद का गंध, किसी मे पेट्रोल का गंध, किसी में कोयले की गंध। इसके अलावा भी अजीब अजीब सी गंध थी। गंध के आधार पर जांच बढ़ने लगी। खोजी कुत्ता संसद भवन के सामने आकर खड़ा हो गया। संसद भवन के भीतर, सांप का कोई बिल नही मिला। कुत्ते को, जांच के लिए, भीतर ले जाने की आज्ञा मिली। वह जैसे ही भीतर गया, तो कभी सत्तापक्ष की कुर्सी को सूंघकर भौंकता, कभी विपक्ष की कुर्सी को सूंघकर भौंकता।

फैसले देने के पूर्व, जज का ध्यान, जांच आयोग के हश्र की ओरचला गया। फैसला आया-विष तो सांप के ही जैसा है, पर इसे फैलाने वाला सांप नही, बल्कि सभ्य मनुष्य है, जो कभी सत्ता पक्ष, तो कभी विपक्ष की कुरसी पर बैठता है। यह सिलसिला आजादी के बाद से बदस्तूर जारी है। और मरने वाला व्यक्ति सभ्य मनुष्य नहीं, बल्कि इस देश की गरीब, मजदूर, किसान या साधारण जनता है। पर गलती सांपों की है, मनुष्य को बदनाम करने के उद्देश्य से, सांपों ने अपना जहर, उन्ही पेड़ों की कोटरियों में छुपा रखा है, जिससे बनी कुर्सियां, संसद में इस्तेमाल की जा रही थी, जिसका प्रभाव यह है, कि इन कुर्सियों पर जो भी बैठता है, वह जहरीला हो जाता है। बचा लिया गया, सभ्य मनुष्य, एक बार फिर। सांप ने, फैसलों पर, आपत्ति दर्ज करायी और पुनर्विचार की मांग की। उसका तर्क था, हमारा जहर, काला धन नहीं है, जिसे, इधर उधर, विदेशी बैकों की तरह छुपाना पड़े। हमने छुपाया है जरूर, पर उन पेड़ों पर नहीं, जिसकी कुर्सियां संसद में इस्तेमाल होती है। दूसरी बात, हम काटते हैं, तभी हमारे जहर का असर होता है, यहां बिना काटे, मृत पाया गया है। तीसरी बात यह कि, हमारे जहर से, मनुष्य बहुत कम समय में, बिना तड़प के भगवान को प्यारे हो जाते हैं। यहां लोग जाने कितने कितने दिनों तक, तड़प तड़प कर, मरे हैं। अंतिम बात यह कि, सभ्य मनुष्य, इतने जहरीले हैं कि जिस पर बैठते हैं, उस पर भी अपने जहर का असर छोड़ देते हैं, तभी तो कुत्ता संसद भवन की कुर्सियों को सूंघकर भौंकता है और यहां का हर नया प्रवेशी कितनी जल्दी जहरीला हो जाता है। अदालत जानती थी सच, पर कह नहीं सकती। फैसला जनता के हाथ छोड़ रखा है। जनता खंगाल रही है तबसे, और तय नही कर पा रही है-जहरीला कौन।

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