राहुल उद्योगपति तो हैं नहीं फिर उनकी संपत्ति में इतनी वृद्धि कैसे हो गयी?

-ललित गर्ग- अधिकांश जनप्रतिनिधि संसद का प्रतिनिधित्व करते हुए किसी व्यापार, उद्योग एवं लाभ कमाने वाली ईकाई से सीधे नहीं जुड़े होते हैं, फिर उनकी धन-सम्पत्ति इतनी तेजी से कैसे बढ़ जाती है? यह विरोधाभास नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र का दुर्भाग्य है। वर्ष 2019 के आम चुनाव में वैसे देखा जाये तो न सत्तापक्ष और न विपक्ष के पास कोई बुनियादी मुद्दा हो। यह मुद्दााविहीन चुनाव है जो लोकतंत्र के लिये एक चिन्ताजनक स्थिति है। बावजूद इसके एक अहम मुद्दा होना चाहिए कि हमारे जनप्रतिनिधि इतने जल्दी अमीर कैसे हो…

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राहुल की ‘आय’ घोषणा कांग्रेस के गरीबी हटाओ नारे की विफलता दर्शाती है

-अरुण जेटली- 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा जी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था। 48 वर्षों के दो तिहाई समय में उनकी पार्टी ही सत्ता में रही। लेकिन उन्होंने न गरीबी हटाई और न ही ‘गरीबी हटाओ” के नारे को ही छोड़ा। भारत में कांग्रेस पार्टी से ज्यादा किसी भी राजनीतिक दल ने देश को 70 सालों से अधिक समय तक नहीं ठगा है। इसने भारतीयों को कई तरह के नारे तो दिए लेकिन उन्हें लागू करने के लिए बहुत थोड़े ही संसाधन दिए। नेहरू युग में भारत की…

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आत्मघाती दस्ते की घात से घायल कांग्रेस

प्रभुनाथ शुक्ल देश की पुरानी पार्टी कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी दल के वरिष्ठ नेताओं की उल-जलूल बयानबाजी से परेशान हैं। चुनावी माहौल में पार्टी के नेता आत्मघाती दस्ते की भूमिका निभाते दिखते हैं। सेना के शौर्य पर सैम पित्रोदा का सवाल इसका उदाहरण है। राहुल गांधी पार्टी में नया जोश भर रहे हैं। वह कांग्रेस को नई ऊंचाइयों पर ले जाना चाहते हैं। लेकिन आला नेता अपनी बेतुकी बयानबाजी से पार्टी की छवि खराब करते दिखते हैं। इसका लाभ सीधे-सीधे भाजपा उठा रही है। 17 वीं लोकसभा के…

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समाज का दर्पण है रंगमंच

रमेश ठाकुर नाटक, रंगमंच व रंगकर्मी शब्द सुनते ही मन प्रफुल्लित और आनंदित हो जाता है। इंसान भले ही कितना भी व्यस्त क्यों न हो, ‘रंगरस धारा’ में बहने से खुद को नहीं रोक पाता। दरअसल रंगमंच के नाटक सभी के जीवन से सीधा संबंध रखते हैं। बूढ़े हों या बच्चे, हर वर्ग के लिए रंगमंच अनगिनत विधाओं का बहता संगम है। एक जमाना था जब मनोरंजन का सबसे सुगम एकमात्र साधन सिर्फ रंगमंच हुआ करता था। लेकिन सिनेमा के आने से इनकी राहों में कांटे बिछ गए। सिनेमा से…

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न्यूज़ीलैंड में खून की होली

‘सभ्यताओं के टकराव’ का सिद्धांत बना मानवता का शिकारी   -राम पुनियानी- न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च में 15 मार्च 2019 को हुए भीषण नरसंहार ने दुनिया को दहला दिया है। हत्यारा ब्रेंटन हैरिसन टेरेंट, ऑस्ट्रेलियाई नागरिक है। दो मस्जिदों पर हुए इस हमले में करीब 50 लोग मारे गए, जिनमें से नौ भारतीय मूल के थे। टेरेंट ने इस कत्लेआम की सोशल मीडिया पर लाइव स्ट्रीमिंग करने के लिए अपने सिर पर एक कैमरा लगा रखा था। उसने यह खून-खराबा इसलिए किया क्योंकि उसका मानना था कि मुस्लिम प्रवासी और उनके…

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फिर आया मौसम दलबदल का

-योगेश कुमार सोनी- राजनीति बड़ी अजीब होती है। यहां सुविधा के हिसाब से सिद्धांत गढ़े जाते हैं। चुनावी महादंगल की तारीखें तय होने के साथ बागी व दलबदलू नेता भी सुविधानुसार अपनी दुकान सजाने में जुट गए हैं। आम से लेकर खास, इस बार का लोकसभा चुनाव किसी विश्व कप कम से कम नहीं आंक रहे हैं। इसलिए हर छोटा-बड़ा नेता अपने वर्चस्व को आजमाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाह रहा। इसका प्रमाण दलबदलुओं व बागियों के रुप में देखने को मिल रहा है। पिछले कुछ दिनों से देखा…

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चुनाव में ”कालाधन” से परहेज करें सियासी दल

-रमेश ठाकुर- देश में चुनावी मौसम है। यह ऐसा मौसम है जब ‘कालाधन’ दान के रूप में सबसे ज्यादा बाहर आता है। चुनाव खर्च के लिए सभी सियासी दलों को भारी मात्रा में धन की आवश्यकता पड़ती है। उसे पूरा करने के लिए रसूख वाले लोग अपनी पोटली से कालाधन निकालकर राजनीतिक दलों को चंदा के रूप में देते हैं। चुनाव में धन की जरूरत होती है। इसलिए सच्चाई जानने के बाद भी सियासी दल मना नहीं कर पाते। 2019 का चुनाव प्रचार सिर्फ दौलत पर टिका है। भारत का…

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जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की

फ़िरदौस ख़ान होली बसंत ऋतु में मनाया जाने वाला रंगों का पावन पर्व है। फाल्गुन माह में मनाए जाने की वजह से इसे फागुनी भी कहा जाता है। देश भर में हर्षोल्लास के साथ यह पर्व मनाया जाता है। म़ुगल शासनकाल में भी होली को पूरे जोश के साथ मनाया जाता था। अलबरूनी ने अपने स़फरनामे में होली का खूबसूरती से ज़िक्र किया है। अकबर द्वारा जोधा बाई और जहांगीर द्वारा नूरजहां के साथ होली खेलने के अनेक क़िस्से प्रसिद्ध हैं। शाहजहां के दौर में होली खेलने का अंदाज़ बदल…

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रंगोत्सव पर मिलावटी रंगों से रहें सावधान

रमेश ठाकुर- होली का त्योहार नजदीक आते ही हर तरफ रंगों की फुहार बहने लगती है। करीब सप्ताह भर पूरा वातावरण रंगोत्सव में सराबोर रहता है। ग्रामीण अंचल से लेकर महानगरों तक दूसरे पर्व-त्योहारों के मुकाबले होली का क्रेज ज्यादा रहता है। फागुन के अंतिम दिनों में चारों तरफ रंगीली फुहारों की रसधारा होती है लेकिन अब रसधारा में रंग की जगह जहर का प्रयोग होने लगा है। रंग के नाम पर धड़ल्ले से जहरनुमा केमिकल का गोरखधंधा हो रहा है। यह रंग त्योहार के दिन ही सबको बेरंग कर…

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सादगी की मिसाल थे मनोहर पर्रिकर

-योगेश कुमार गोयल गोवा के मुख्यमंत्री तथा देश के पूर्व रक्षामंत्री 63 वर्षीय मनोहर पर्रिकर 17 मार्च की रात कैंसर से जंग लड़ते हुए चिरनिद्रा में सो गए। एडवांस्ड पैंक्रियाटिक कैंसर से जूझ रहे पर्रिकर लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। लेकिन अस्वस्थता के बावजूद काम के प्रति उनका जोश और जज्बा बेमिसाल था। वह सदैव दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा। काफी समय से वह जब भी दिखाई दिए, उनके चेहरे पर सदैव नासोगेस्ट्रिक ट्यूब लगी रहती थी। हमेशा चिकित्सीय उपकरणों से लैस नाक में ड्रिप लगाए हुए…

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