नौटंकीः लोकजीवन को आनन्दित करने वाली विधा

हृदयनारायण दीक्षित भारत उत्सव प्रिय देश है। सतत् कर्म यहां जीवन साधना है। पूरे वर्ष कर्म प्रधान जीवन और बीच-बीच में पर्व त्योहार और उत्सवों का आनंद। भारत के मन का उत्स सांस्कृतिक है। उत्स का अर्थ है केन्द्र। उत्सव परिधि है। उत्सव उल्लासधर्मा होते हैं। वे भारत के लोक को भीतर और बाहर तक आच्छादित करते हैं। मकर संक्रान्ति का उत्सव अभी-अभी समाप्त हुआ है। यह भारत के सभी हिस्सों में अपने-अपने ढंग से सम्पन्न हुए हैं। पवित्र नदियों में कड़ाके की ठंड में स्नान ध्यान, पूजन और आनन्द।…

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कोरोना वैक्सीन पर भ्रम नहीं जागरुकता फैलाएं

योगेश कुमार सोनीकोरोना की वैक्सीन का इंतजार भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया कर रही थी। हमारे देश का सौभाग्य है कि इसे अपने यहां तैयार किया गया है। 16 जनवरी से पूरे भारत में चरणबद्ध तरीके से वैक्सीन लगने की प्रक्रिया भी शुरु हो चुकी है। प्रमाणिकता के लिए देश के सबसे बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोगों व केंद्र सरकार की योजना के अनुसार पहले वैक्सीन स्वास्थ्यकर्मियों को दी जा रही है। सभी राज्यों में डॉक्टरों, नर्सों और फ्रंटलाइन के अन्य स्वास्थकर्मियों को टीका लगाया जा रहा है।पूरी दुनिया…

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मप्र में बढ़ते बर्डफ्लू के बीच शिवराज सरकार के सार्थक प्रयास

डॉ. मयंक चतुर्वेदी वर्ष 2021 की शुरुआत के साथ मध्य प्रदेश में कौओं के सामूहिक मौत के मामले आते ही यह आशंका व्‍यक्‍त की जाने लगी थी कि हो न हो यह बर्ड फ्लू है, इसके लिए सावधानी और बचाव के जो उपाय तुरंत किए जाने चाहिए थे, वह शुरू हो गए। प्रदेश की शिवराज सरकार इस तेजी के साथ इसकी रोकथाम में सक्रिय हुई कि भले ही पक्षियों में इसके संक्रमण को रोका जाना संभव न हो, लेकिन उनके जरिए इंसानों में कोरोना की तरह इसका वायरस संचार न…

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आंदोलन कहीं किसानों को ही विफल करने की नीति न साबित हो !

अरुण वर्मा कहते हैं कि शंका का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था। फिर शंका के पीछे कुछ लोगों की अपनी राजनीति और अपने एजेंडे हों तो फिर इसका समाधान और मुश्किल है। कृषि नीति के खिलाफ आंदोलन की बुनियाद भी सिर्फ शंकाओं के आधार पर रखी गई है। कुछ लोगों की चाहत है कि सीएए और एनआरसी के विरोध पर दिल्ली में दिए गए धरना का रिकार्ड कृषि आंदोलन तोड़े। इसलिए आंदोलन के दिन की गिनती जारी है। यदि कुछ लोगों की जिद नहीं होती तो सरकार…

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सावधान! क्या वाट्सएप बनेगा बेईमान ?

ऋतुपर्ण दवे इण्टरनेट, संचार क्रान्ति में वरदान तो जरूर साबित हुआ और देखते ही देखते मानव जीवन की अहम जरूरत बन भी गया। हकीकत भी यही है कि ‘दुनिया मेरी मुट्ठी में’ का असल सपना इण्टरनेट ने ही पूरा किया। लेकिन अब बड़ा सच यह भी है कि इस सेवा का जरिया बने यूजर्स से ही कमाई कर रहे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स चोरी-छिपे न केवल सायबर डकैती करते हैं बल्कि यूजर्स डेटा को ही अपने पास स्टोर करने की कोशिशें करते रहते हैं। यह न केवल निजता का उल्लंघन है…

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सुपर पावर बनने की दौड़ में कहां खड़ा है भारत

विक्रम उपाध्याय कोविड के बाद की अर्थव्यवस्था कैसी होगी? कौन सुपर पावर बनेगा, किसकी अर्थव्यवस्था तबाह होगी? यह बहस विभिन्न मंचों पर चल रही है। चीनी अर्थशास्त्री विशेषकर इस बहस को हवा दे रहे हैं। यह कहा जा रहा है कि इस दशक के अंत तक चीन दुनिया का सबसे बड़ा अर्थतंत्र होगा। ब्रिटेन स्थित सेंटर फाॅर इकोनाॅमिक्स एंड बिजनेस रिसर्च का दावा है कि कोविड पर जल्दी काबू पाने के कारण चीन 2028 तक अमरीका और यूरोप से बहुत आगे निकल जाएगा। इसी संस्था ने यह भी भविष्यवाणी की…

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जनतंत्रः मानव समाज की आंतरिक एकता

हृदयनारायण दीक्षित भारतीय चिन्तन की मूल भूमि लोकतंत्र है। अनेक विचार हैं। 8 प्रतिष्ठित दर्शन हैं। विचार भिन्नता है। सब मिलकर लोकतंत्र की भावभूमि बनाते हैं। लोक और जन वैदिक पूर्वजों के प्रियतम विचार रहे हैं। लोक बड़ा है। आयतन में असीम लेकिन विश्वास में हृदयग्राही। लोक प्रकाशवाची है। भारतीय चिन्तन में लोक एक नहीं अनेक हैं। यजुर्वेद के अंतिम अध्याय में कई लोकों का उल्लेख है, “असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः – असुरों के अनेक लोक हैं। वे अंधकार से आच्छादित हैं। आत्मविरोधी इन्हीं में बारंबार जाते हैं।”…

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संयुक्त राष्ट्र संघ में अगर अब भी हिन्दी नहीं आएगी तो कब आएगी?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक संयुक्त राष्ट्र संघ में अगर अब भी हिन्दी नहीं आएगी तो कब आएगी? हिन्दी का समय तो आ चुका है लेकिन अभी उसे एक हल्के से धक्के की जरूरत है। भारत सरकार को कोई लंबा-चौड़ा खर्च नहीं करना है, उसे किसी विश्व अदालत में हिन्दी का मुकदमा नहीं लड़ना है, कोई प्रदर्शन और जुलूस आयोजित नहीं करने हैं। उसे केवल डेढ़ करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष खर्च करने होंगे, संयुक्त राष्ट्र के आधे से अधिक सदस्यों (96) की सहमति लेनी होगी और उसकी कामकाज नियमावली की धारा 51 में…

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दुनिया के देशों में बजता है भारतीय वैक्सीन का डंका

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि कोरोना महामारी से निजात के लिए सरकार द्वारा दो-दो वैक्सीन को अनुमति के बावजूद हमारी वैक्सीन को हम ही संदेह के कठघरे में खड़े करने में सबसे आगे हैं। एक साथ दो वैक्सीन के आपात उपयोग के लिए अनुमति देने वाला भारत दुनिया का पहला देश है। कल तक अमेरिका, सोवियत रूस व अन्य देशों की ओर वैक्सीन की आस लगाए दुनिया के देशों को सबसे अधिक विश्वास भारतीय वैक्सीनों पर ही रहा है। यही कारण है कि…

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श्मशान में भी बेशर्म भ्रष्टाचार, सुनने में थोड़ा अजीब लगता है लेकिन हकीकत यही है।

ऋतुपर्ण दवे श्मशान में भी बेशर्म भ्रष्टाचार! सुनने में थोड़ा अजीब लगता है लेकिन हकीकत यही है। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे जब श्मशान में मृतक की अंत्येष्टि के दौरान लोग धूप-पानी से बचने की खातिर बनी नई-नई गैलरी में खड़े हों, ठीक उसी समय भ्रष्टाचारियों की करतूत यमदूत बनकर आए और श्मशान में ही लोगों को मौत की नींद सुला जाए। ऐसा सिर्फ हमारे देश में भ्रष्टाचारियों पर सरपरस्ती के चलते ही हो सकता है और हुआ। देश में न जाने कितनी इससे मिलती-जुलती घटनाएं हो चुकी…

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