गुरु की स्वीकार्यता

हर वक्त संसार को गुरु की द्रष्टि से देखो। तब यह संसार मलिन नहीं बल्कि प्रेम, आनन्द, सहयोगिता, दया आदि गुणों से परिपूर्ण, अधिक उत्सवपूर्ण लगेगा। तुम्हें किसी के साथ संबंध बनाने में भय नहीं होगा क्योंकि तुम्हारे पास आश्रय है। घर के अन्दर से तुम बाहर के वङ्कापात, आंधी, वर्षा व कड़ी धूप देखोगे। भीतर वातानुकूलित व्यवस्था है- शीतल और शान्त। बाहर गर्मी और अशांति है पर तुम परेशान नहीं होते, क्योंकि कुछ भी तुम्हें बेचैन और विचलित नहीं कर सकता। कोई तुम्हारी पूर्णता नहीं छीन सकता। यही है गुरु का उद्देश्य। संसार के सभी संबंध उलट-पुलट हो जाते हैं। संबंध बनते हैं और टूटते हैं। यहां राग भी है, दोष भी। यही संसार है। पर गुरु कोई संबंध नहीं, गुरु की मौजूदगी होती है। गुरु का सान्निध्य अनुभव करो। गुरु को अपने संसार का अंश मत बनाओ। संसार का हिस्सा बनाते ही, वही अप्रिय भावनाएं उठती हैं- उन्होंने ऐसा कहा, उन्होंने ऐसा नहीं कहा, वह उनका अधिक प्रिय है, मैं नहीं हूं। जीवन में गुरु का सान्निध्य सभी संबंधों में पूर्णता लाता है। यदि गुरु के निकट अनुभव नहीं कर रहे, तो यह तुम्हारे मन, धारणा, अहंकार के कारण है।

जो कुछ भी महत्वपूर्ण है, अंतरंग है, उसे गुरु के साथ बांटो। जो तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण है, आंतरिक है, जब तक तुम उसे गुरु को नहीं व्यक्त करते, तब तक निकटता का अनुभव नहीं कर सकते। आप कैसे हैं? गुरु से हृदय खोलकर मन की गहराइयों में समाई अपने जीवन की आंतरिक व महत्वपूर्ण बातें करो। महत्वहीन या सांसारिक बातें न करो। यदि तुम गुरु के साथ निकटता अनुभव नहीं कर रहे, तो गुरु की आवश्यकता ही क्या है? वह तुम्हारे लिए केवल एक और बोझ है। बस, उसे अलविदा कह दो। तुम गुरु के साथ हो ताकि तुम गुरु के आनन्द में सहभागी हो, उनकी चेतना के सहभागी। इसके लिए पहले तुम्हें अपने आप को खाली करना है, जो पहले से है, उसे गुरु को दे देना है। मन में जितना भी कूड़ा हो, किसी भी प्रकार का, गुरु लेने के लिए तैयार हैं। तुम जैसे भी हो, गुरु तुम्हें स्वीकार कर लेंगे। वे अपनी ओर से बांटने को तैयार हैं- तुम्हें केवल अपनी ओर से तैयार होना है।

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