व्यंग्य : मेरा अनुसन्धान कार्य प्रगति पर है…..

-सुशील यादव-

माधो किस मिटटी के बने हो मेरे यार…..?

इस जैसे प्रश्न का सामना हर शख्स को जीवन में कभी न कभी करना पड़ जाता है। वो दोस्त जिन पर पानी की कितनी बौछार फेंक लो घुरने-गलने का नाम नहीं लेता…….। वो आदमी जो बैंक के कर्जों में लदा है, अदायगी के लिए सरकार का मुंह ताकता है……। वो जो अपने को सियासत का माहिर समझे बैठा है, चैन की बंशी फूंके जा रहा है, वो भी जो हर काम में लाल-सलाम ठोकता है, जोर जुल्म के टक्कर में, टाइप नारे को हाथ उछाल के कहने का अंदाज बताता है।

मेरा अनुसन्धान कहता है, वे सब ‘माधो-केटेगरी’ के लोग हैं……?

पहले मुर्गी या अंडा की तर्ज पर, इन दिनों मैंने शास्वत अनुत्तरित प्रश्न-” माधो किस मिटटी के बने हो यार ” को हल करने का स्वस्फूर्त साहित्यिक ठेका ले रखा है?

आप पूछेंगे साहित्य में ठेकेदारी प्रथा कब शुरू हुई ?

आपने स्वमेव इसे उठाना कैसे आरंभ कर दिया?

इस ठेकेदारी के एवज कोई परंपरागत गुस्सा लेने-देने का सवाल आया या नहीं…?

मुझ पर कुछ साहित्यिक बेवड़े कदाचित ये इल्जाम लगाएं?

अपने फायदे के लिए मैंने इस प्रश्न का समयानुकूल सियासी इस्तेमाल किया है?

अपने इलाके में आप घुइयां भी पकाएंगे तो लोग पड़ौस के घर से बिरयानी की खुशबू से टांका भिड़ा देंगे। आज यही हो रहा है।

इलेक्शन के दिनों में, आपके जनेऊ पर कौन लांछन लगा दे कह नहीं सकते?

लिहाजा, जितने मुंह उतनी बातों का पीरिएड चल रहा है, चलने दीजे, दोस्तों, इस अनुसन्धान और शोध की फील्ड में मेरा नया कदम है। यहां ज़रा जम लूँ, फिर कहूँ?

मुझे शोध-और अनुसन्धान के जानकार लोगों ने चेताया था, यहां खूब धांधली होती है…? मत घुस, अपनी आत्मा को सरे आम बेचने पर आमादा है तो कोई रोकने वाला भी नहीं….।

इस फील्ड में तमाम किस्म के घोटाले हैं।

रजिस्ट्रेशन से लेकर दी लिट् अवार्ड होने तक घिसाई ही घिसाई है, कोई पैसे देकर लिखवा रहा हैं, कहीं कट-पेस्ट से काम चल रहा है।

गाइड को अपने शिष्य से आलू-प्याज टमाटर की पड़ी रहती है….? जिस दिन पेट्रोल के भाव का बढना सुनते हैं, गाड़ी को ‘फुल-टेक’ करवाने की गुरु इच्छा जाग्रत हो जाती है। आज गुरु दिवस पर क्षमा याचना के साथ, बताने को जी कर रहा है, ‘शिष्यत्व’ को बचाये रखने वालो की आखिरी पीढ़ी चल रही है।

शिष्य-भाव शिरोधार्य करने वाले, ये माधो किस मिटटी के बने हैं?

पता करने पर ज्ञात हुआ कि इन सबकी हसरत, येनकेन- प्रकारेण, पी एच डी वाला कन्वोकेशन में खिंची फोटो दीवार में टँग जानी चाहिए, जैसी होती है।

मकसद इतना होता तो किसी नत्थू-खैरे को परवाह नहीं थी। मगर इसकी आड़ में दूसरों का हक़ छीना जा रहा है।डी लिट् धारी इन लोगों को नौकरियाँ, बिना ट्रेक बदले, बिना झंडी सिंग्नल देखे, बुलेट ट्रेन की गति से दौड़ा-दौड़ा के दी जा रही है।यही इस माधो तन्त्र की खराबी है…..?

सच कहता हूँ तो इस बात पे ताली बजनी चाहिए, अपुन माँगता भी अइसीच…..?

मुझे माधो नम्बर २ यानी मेरी अंतरात्मा से बहुत डर लगता है शायद आपको भी लगता हो?

ये है भी बहुत ऊंची चीज। आपसे जो उगलवाना है उसे प्रश्न बना के सामने रख देती है। इस गुगली से बच सकते हो तो बचो, नहीं तो डंडे के सामने पैर अड़ाने के लिहाज से आपको आपकी अंतरात्मा आ धिक्कारती है।

एक दिन मुझसे कह बैठी, अपने आप को जो साहित्य में धुरन्धर, धाकड़ माने बैठे हो इन शब्दों का मतलब भी पता है?

ये भाषा बिलकुल मेरे बेटर-हाफ के ताने से मिलती-जुलती है!

कभी कभी यूँ महसूस होता है अंतरात्मा, और बेटर-हाफ में गजब का बहनापा है। काश वे किसी बात पर कभी सौतिया डाह भी रखती…..?

जो बात प्रेक्टीकली बीबी कहना चाहती है, लिहाजवश कह नहीं पाती, वही बात अंतरात्मा पर्दे पीछे से कह देती है।

बीबी यानी बेटर-हाफ की पाठशाला का चालीस सालो से विद्यार्थी होने का और अंतरात्मा से लगभग पच्चास साल से जूझने का मतलब ये नहीं कि केवल घास-घुइयां ही छीले हों, अपनी ओर से मैंने सावधानी-वश जीवन के अठ्ठारह साल घटा दिए है क्यों की तब तक इसके अस्तित्व में होने का प्रमाण नही दिया जा सकता।

मेरी और अंतरात्मा की बहस के बाद आप अंतिम निर्णय पर पहुंच गए यानी माधो की मिटटी का जुगाड़ कहां-खान से किया जा सकता है, तो समझो आपने करोड़पति वाले पन्द्रहवें प्रश्न को हल कर लिया?

हमने साहित्य की सेवा में जी जान लगा दिया। झाड़ू-पोंछा के बाद जितना भी वक्त मिला इसमें लगा दिया। ये साहित्य वाले हमारी तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखे? बड़े-बड़े मंचों पर पहुंचने से पहले धकिया दिए जाते।

अगला घोंचू (मेरी नजर में) पढ़े तो वाह-वाह, क्या धांसू लिखा है और हम पढ़े तो लोग टाइम पास करने मोबाइल में बिजी हो जाते? उस घोंचू से सवाल तलब करने की इच्छा आज भी बरकरार है ” किस मिटी के बने हो मेरे यार?”

मेरी अंतरात्मा की बहुत दिनों से इच्छा थी किसी राष्ट्रीय स्तर के नेता से रूबरू बात करे? मैंने कई प्रयास किये ! लालू को घेरा तो कहने लगा, ये सजायाप्ता है इसका राजनैतिक वेल्यु अब कहां है?

मैंने कहा कल इनकी तूती बोलती थी?

विदेशी जमीन पर अपना भाषण झाड़ आये हैं?

आप कम क्यों आंकते हैं इन्हें?

उसने नाक-भौ सिकोड़ लिया? अंतरात्मा का इस तरह नाक-भौं वाले पोज में सेल्फी लेने के लिए मोबाइल उठाते ही उसने अपने मेक-अप बॉक्स से जाने क्या निकाला कि उसका चेहरा हंसता-मुस्कुराता दिखा?

मैंने उससे कहा यार माधो, यूँ ही हंसते रहा कर न जाने तू किस मिटटी का बना है?

अगली बार तुझे मैं छत्तीसगढ़ के सी. एम. से जरूर मिलवाऊंगा, पता नहीं तेरे माधो कृत मूरत किसी का मन मोह ले,  लाटरी किस माधो के नाम कब खुल जाए कोई जानता है क्या…..?

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