मायावती को उगलाना होगा जनता का पैसा

-योगेश कुमार सोनी-

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को कोर्ट ने निर्देश जारी किया है कि वह मूर्तियों व स्मारकों में लगे पैसे लौटाए। एक दशक पूर्व 2009 में दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने सख्त लिहाज से यह आदेश पारित किया। हालांकि मामले की सुनवाई के अगली तारीख 2 अप्रैल तय की गई है। मायावती के वकील ने यह चालाकी दिखानी चाही व अगली तारीख को मई के बाद रखने के लिए गुहार लगाई क्योंकि लोकसभा चुनाव नजदीक हैं लेकिन कोर्ट ने उनका यह अनुरोध स्वीकार नही किया। सर्वोच्च अदालत ने कानूनी भाषा में कहा, ‘प्रथम दृष्टया तो बीएसपी प्रमुख को मूर्तियों पर खर्च किया गया जनता का पैसा लौटाना होगा। उन्हें यह पैसा वापस लौटाना चाहिए।’ बसपा सुप्रीमों के नाम से जाने वाली इस नेता ने बतौर मुख्यमंत्री रहते हुए उत्तर प्रदेश में हाथी और अपनी कई मूर्तियां लगवाई थीं। इनके साथ कांशीराम और बाबा साहेब आंबेडकर की भी कई मूर्तियां भी लगाई गईं थी। उस वक्त उत्तर प्रदेश में मायावती के मूर्ति लगाने का विरोध समाजवादी पार्टी के अलावा अन्य दलों ने भी किया था। हालांकि अब एसपी-बीएसपी की तल्खियां दूर हो गई हैं और दोनों पार्टियां गठबंधन में 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ने जा रही हैं। लेकिन अब बात यह समझने की है कि हिन्दुस्तान जैसे देश में कोई भी सरकार करोडो अरबों का गबन खुलेआम किस आधार पर करती है। इसका सबसे बड़ा सजीव उदाहरण मायावती का मूर्ति व स्मारक घोटाला है। देश की आजादी के बाद मायावती सरकार पहली ऐसी सरकार मानी जा रही है जिसने अपनी मनमानी व तानाशाही के चलते अपने जीते जी अपनी मूर्ति व अपने नाम से पार्क व अन्य योजनाएं तैयार बनाई जो नकारात्मकता का सबसे सजीव उदाहरण बना। अपने प्रचार-प्रसार के लिए प्रदेश को कोना नही छोडा गया था। प्रदेश के सिवाय पूरे देश की जनता के मन में यह कुंठा आज तक आती है लखनऊ व नोएडा में मायावती ने स्मारकें बनवाई हैं उतना पैसा यदि प्रदेश की तरक्की में लग जाता तो कोई एक व्यक्ति भी गरीब नही रहता। मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने कई पार्कों व मूर्तियों का निर्माण करवाया था जिसमें से नोएडा सबसे ज्यादा चर्चा में आया था क्योंकि यहां हाथी की पत्थर की 30 मूर्तियां व कांसे की 22 प्रतिमाएं लगवाई थी जिसमें करीब 685 करोड़ रुपये का खर्चा आया था। इसको लेकर फाइनेंस एक्सपर्टस् का मानना यह था कि नोएडा एशिया की सबसे महंगी जगहों में आती है व जितनी जगह पर व जितना पैसा लगाकर यह स्मारक बने हैं उतने मे कई रोजगार खुल सकते थे जिससे हजारों घरानों की बेरोजगारी दूर हो सकती थी। ऐसा लखनऊ व अन्य तमाम स्थानों पर संभव था। यदि जनता का पैसा जनता के बीच सही तरह से लग जाए तो एक नए राष्ट्र का निर्माण हो सकता है। मन दुखी ज्यादा तब होता है जब खुलेआम जनता के पैसे की बर्बादी चल रही होती है लेकिन कोई कहने, सुनने व रोकने वाला नही होता। बाद में तो मात्र सिर्फ दुख जताना व विरोध करना ही रह जाता है। संबंधित एजेंसियां सिर्फ दर्शक बनकर रह जाती हैं। आपको जानकारी होनी चाहिए कि किसी भी सरकार को इतना बजट मिलता है कि वह राज्य अपनी जनता को किसी भी मूलभूत व बुनियादी सुविधाओं से वंचित नही हो सकता बशर्ते फंड का सही प्रयोग हो जाए। हमारे देश के अधिकतर नेता जिनके पास खाने के लिए रोटियां भी नही होती थी वो आज अरबपति से कम नही बल्कि यहां तक भ्रष्टाचार नही रुकता इनके चेले चपाटे व रिश्तेदार भी बड़े पूंजीपति बन जाते है। ऐसे भ्रष्टाचारियों को यह सब करना इतना सरल इसलिए भी लगता है चूंकि व हमारे देश के लचीले कानून को भलिभांति जानते हैं। वह समझ चुके हैं कि यदि करोड़ों अरबों को डकार भी जाए तो कानून इतना समय़ दे देता है कि सारा माल आराम से फिट किया जा सकता है। साथ ही किसी भी केस के निर्णय आने में जितना समय लगता उतनें में किसी भी इंसान की पूरी जिंदगी कट जाती है। इसका एक अन्य उदाहरण लालू का चारा घोटाला है। हालांकि ऐसी तो लंबी फेहरिस्त है हम कितनों की विषय में बताएं अब तो इंटरनेट की दुनिया में सब जग-जाहिर है। आपको एक जानकारी और होनी चाहिए कि राज्य सरकारों पर उस समय केंद्र सरकार सब देखते व समझते हुए इसलिए भी कार्यवाही नही करती क्योंकि पूर्व में हमेशा गठबंधन की सरकारें रही हैं। एक भी दल यदि हाथ खींच ले तो सरकार गिरने का खतरा बन जाता है। इसलिए ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ वाली तर्ज पर सबने देश को बढ़िया ले लूटा है। इन सब की हकीकत इसलिए भी सामने आ रही है क्योंकि यह सब मोदी से भयवीत या कहें सब बीजेपी के खिलाफ हो गए। यदि हम केवल उत्तर प्रदेश के परिवेश की बात करें तो सपा-बसपा यहां की सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टी हैं जो हमेशा से एक दूसरे की सबसे कट्टर रही हैं। 2014 लोकसभा चुनाव में जिस तरह इन दोनों पार्टियों ही हार हुई उससे यह एक दम टूट गई व इस वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में अपनी हैसियत कामय करने के लिए दोनों कट्टर दुश्मन एक हो गए। इससे कार्यकर्ताओं व जनता या यू कहें कि आज के पढ़े लिखे युवा में एक संदेश तो चला गया कि राजनीति एक व्यापार है व कोई किसी का दुश्मन नही होता। लेकिन साथ ही अब युवाओं को यह भी समझना पड़ेगा कि राजनीति में पढ़े लिखे लोगों का प्रवेश न करना अपने सर पर अनपढ़ का राज कराना होता है। अधिकतर नेता बेहद कम समय में ही पूंजीपति बन जाते है क्योंकि वो देश की सेवा करने के लिए राजनीति में नही आते वो सिर्फ और सिर्फ अपना घर भरने व अपने नाम को चमकाने के लिए आते हैं। इसके अलावा माननीय अदालत से भी हम यह प्रार्थना करते हैं कि ऐसे घोटाले करने वालों की सजा जल्दी हो व ऐसी हो कि भविष्य में इस तरह का घोटाला करने से पहले कोई भी नेता सौ बार सोचे क्योंकि एक आम आदमी अपने जीवन निर्वाह करने में न जाने कितनी कठिनाईयां उठाता है यह बात हम सब अच्छे तरीके से जानते हैं। अपना व अपने बच्चों का मन मारकर व सरकार को टैक्स देता है और वह पैसा भ्रष्ट सरकारें अपने लिए प्रयोग करती हैं। यदि मायावती को यह पैसा वापिस देना पड़ा तो निश्चित तौर पर अन्य घोटालेबाजों के लिए यह मिसाल बन जाएगी।

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