मनी मैनेजमेंट में भी एक्सपर्ट है महिलाएं

एक धारणा है कि महिलाएं मनी मैटर्स को डील करने से कतराती हैं। बैंक, निवेश और अन्य गतिविधियों से दूर रहती हैं। घर का मनी मैनेजमेंट कर सकती हैं, लेकिन बाहर का नहीं, लेकिन हाल ही के वर्षो में बैकिंग सेक्टर में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने इस धारणा को गलत साबित किया है। आज आधे दर्जन से भी ज्यादा सार्वजनिक व निजी बैंकों की चेयरपर्सन महिलाएं हैं, जो अपनी काबिलियत के दम पर नंबर वन पोस्ट पर पहुची हैं। लगभग हर बैंक में महिलाकर्मी तन्मयता से बैंकिंग गतिविधियों को अंजाम देती नजर आती हैं। इतना ही नहीं, महिलाएं एलआईसी, शेयर बाजार, कंपनीज की ऑडिट, अरबों रुपये का लेखा-जोखा रखने में आ रही चुनौतियों को भी बखूबी निभा रही हैं। कमाल का है इनका कॉन्फिडेंस। ज्यादातर महिलाओं ने ऑनलाइन लेन-देन में भी अपना हाथ आजमाना शुरू कर दिया है। वे घर में बैठकर सारी ट्रांजैक्शंस करती हैं।

कमतर नहीं किसी भी तरह:- महिलाओं में एकाग्रता ज्यादा होती है। वे डेडीकेटेड होती हैं। वे छोटे से बजट को बेहतरी से मैनेज कर लेती हैं तो उन्हें सोचना क्या है? उनकी सिक्स्थ सेंस भी उन्हें कामयाबी दिलाती है। अगर कोई कहता है कि महिलाओं को पैसे का लेन-देन नहीं आता या वे फैसले नहीं ले सकतीं तो वह गलत साबित हो रहा है। आज कई वित्तीय संस्थानों की चेयरपर्सन महिलाएं हैं। वे टॉप लेवल पर हैं और फाइनेंस से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेने के काबिल हैं फिर हम कैसे कह सकते हैं कि महिलाओं को मनी मैटर्स डील करने में कोई परेशानी आ सकती है। एसबीआई में ब्रांच मैनेजर सुधा कौल टिक्कू सख्त एतराज जताती हैं महिलाओं को किसी भी तरह से कमतर समझने में। वह बैकिंग प्रोफेशन को महिलाओं के लिए बेहतर मानती हैं। साथ ही फाइनेंशियल इश्यूज की बाबत पति के विश्वास का भी जिक्र करती हैं। कहती हैं, पति मेरे बैंकिंग सेंस को मानते हैं। घर के फाइनेंशियल फैसले तो हम मिलकर लेते हैं। तनख्वाह उनकी ज्यादा है, लेकिन चेकबुक मेरे ही पास होती है। उन्हें लगता है कि मैं बेहतर तरीके से डील कर सकती हूं।

क्या नहीं मैनेज कर सकते हम:- लाइफ और हेल्थ इंश्योरेंस में डील करती हैं रूतिमा गुप्ता। उन्हें फाइनेंशियल बैकग्राउंड की सर्विसेस अच्छी लगती हैं। आईटी इंडस्ट्री से स्विच किया है उन्होंने इस काम में। रूतिमा का मानना है, जब हम घर का मनी मैनेजमेंट कर सकते हैं तो बाहर का क्यों नहीं? पति क्या करते हैं, हमें पैसे दे देते हैं और कहते हैं कि तुम घर का सामान लाना। बच्चों की जरूरतें देखना। घर आने वालों की खातिरदारी देखना। हम सब कुछ मैनेज करते हैं। मोलभाव करके अच्छी चीज खरीदते हैं और पति हैं कि एक शोरूम में जाते हैं तो वहीं से परचेज करके निकलते हैं। रूतिमा आहत दिखती हैं इस बात से कि जब महिलाओं की काबिलियत पर शक किया जाता है। वह कहती हैं, जब किसी कस्टमर के पास पॉलिसी करने जाती हूं तो वे मुझसे कहते हैं कि आप ही डील करेंगी या आपके पति काम करेंगे? जब मैं उन्हें बताती हूं कि हां, मैं ही डील करूंगी और उन्हें पॉलिसी समझाती हूं तो इश्यू सॉल्व हो जाता है, लेकिन मार्केट में यह बहुत ज्यादा है कि महिलाओं को मनी मैटर्स डील करने में दिक्कत होती है। जबकि मेरे पति इस बिजनेस में बाद में आए हैं और वे मुझसे ही हर बात समझते हैं। वैसे भी हमारे यहां वित्तीय स्थितियों को पुरुष ही हैंडल करते हैं। रूतिमा को लगता है कि पति को अपनी पत्नि पर विश्वास करना चाहिए। वे सब कर सकती हैं।

दे रही हूं बराबर कॉम्पिटिशन:- मैंने शुरू से ही सोचा था कि स्टॉक मार्केट में आना है और रिसर्च में जाना है और इस फील्ड में आ गई। मुझे नहीं लगता कि मैं किसी से किसी भी लिहाज में कम हूं। अपने साथियों को बराबर का कॉम्पिटिशन दे रही हूं। शेयर्स पर रिसर्च करती हूं। बड़ी कंपनीज के प्रॉफिट एंड लॉस की रिपोर्ट्स बनाती हूं। कई फॉर्मूला होते हैं। सब स्टडी करती हूं। यहां तक कि घर का पर्सनल फाइनेंस भी मैं ही देखती हूं। कहां इनवेस्ट करना है, सेविंग्स कैसे करनी है, सब मेरे ही डिसीजन होते हैं। महिला हूं तो किसी से कम हूं ऐसा मैंने कभी नहीं सोचा। कहती हैं पिछले पांच सालों से बोनांजा पोर्टफोलियो लिमिटेड से जुड़ी सीनियर रिसर्च एनालिस्ट निधि सारस्वत। एमबीए फाइनेंस करने के बाद उन्होंने इस फील्ड को चुना। वे कैश सेगमेंट में भी काम कर चुकी हैं। निधि को कहीं से भी नहीं लगता कि महिलाओं को फाइनेंशियल मैटर्स को डील करने में जरा भी दिक्कत आ सकती है। वह चाहती हैं कि ज्यादा से ज्यादा महिलाएं इस प्रकार के प्रोफेशन में आएं। वह कहती हैं, ज्यादातर लेडीज को गाइडेंस ही नहीं मिलती। मेरी कई फ्रेंड्स ऐसी हैं जिन्हें यह नहीं पता कि ऐसे ऑप्शंस भी हैं महिलाओं के लिए।

माइंडसेट की बात है सिर्फ:- परमिंदर को आए दिन उनके पति कहते, तुम सारा हिसाब-किताब समझ लो। मैंने कहां-कहां इनवेस्ट किया है, कौन-कौन से डॉक्यूमेंट्स कहां रखे हैं, यह जान लो। कभी तुम्हें अकेले भी संभालना पड़ सकता है सब कुछ। मैं नहीं चाहता तुम किसी पर डिपेंडेंट रहो। मेरी गैरमौजूदगी में कोई तुम्हें बेवकूफ भी बना सकता है, लेकिन हमेशा परमिंदर का जवाब होता, मैं भला अकेली क्यों रहूंगी। हमेशा आपके साथ रहूंगी। मैं क्यों इस पचड़े में पड़ूं। हार गए पति समझाकर, लेकिन वह कभी उनके साथ डॉक्यूमेंट्स समझने नहीं बैठीं। अचानक पति को अपनी नौकरी के सिलसिले में कई महीनों के लिए विदेश जाना पड़ा तो परमिंदर को इस बात की अहमियत का अहसास हुआ। पति की सलाह न सुनने की गलती का पछतावा हुआ। उन्हें पता ही नहीं था कि एलआईसी की किस्त कैसे भरेंगी? बिजली, पानी के बिल कहां अदा होंगे? बैंक के काम कैसे किए जाएंगे? आगे का फाइनेंस कैसे मैनेज होगा? वह कभी पड़ोसी से रिक्वेस्ट करतीं तो कभी किसी जानने वाले से काम करने की गुजारिश करतीं। उन्हें खराब लगता, लेकिन उनके पास और कोई चारा नहीं था। उधर, विदेश में बैठे पति लाचारगी महसूस करते। आखिरकार परमिंदर ने अपने काम खुद करने शुरू किए। ऑनलाइन ट्रांजैक्शन करना सीखा। बैंकों में जाना शुरू किया। आरंभ में कुछ गलतियां जरूर हुई, लेकिन धीरे-धीरे वे कॉन्फिडेंट होती गई। आज वे सिर्फ फाइनेंशियल मैटर्स को ही नहीं सुलझातीं, बल्कि पति के कमाए पैसे को आगे इनवेस्ट करने की प्लानिंग भी करती हैं। खुद का उदाहरण देते हुए वह कहती हैं, जब मैंने हाउसवाइफ होते हुए सब सीखा है तो किसी के लिए भी यह मुश्किल नहीं हो सकता। केवल अपने माइंडसेट की बात है। आप खुद को कमजोर समझेंगी तो कमजोर ही रह जाएंगी।

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