प्रियंका की सक्रियता से क्यों मची है खलबली

-सुंदरचंद ठाकुर-

गर कोई कहे कि प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में पदार्पण करने से किसी को ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला और खासकर मोदी सरकार के लिए तो कतई खतरे की बात नहीं तो वह इस देश में महिला राजनीतिकों के प्रभाव को लेकर अल्पज्ञान का शिकार माना जाएगा। कोई अगर इसे सिर्फ कांग्रेस के परिवारवाद के एक पहले से तय कदम के रूप में देखता हो, जिसे कि देर सबेर लिया ही जाना था तो उसे भी इस कदम को उठाने के समय पर गौर करना होगा क्योंकि राजनीतिक पंडित तो इसे समकालीन राजनीति के ग्रह-नक्षत्रों की स्थितियों के हिसाब से सटीक कदम मान रहे हैं। इन पंडितों का आकलन है कि प्रियंका के आने से भारत के राजनीतिक माहौल में न सिर्फ गहमागहमी बढ़ेगी बल्कि कूट बातों और अफवाहों के बुलबुले भी उड़ेंगे जिससे परिदृश्य और भी रोमांच भरा दिखाई देगा। अलबत्ता तमाम किस्म की बातें और अफवाहें तो प्रियंका के मैदान में उतरते ही शुरू भी हो चुकी हैं। उन्हें वाराणसी में सीधे प्रधानमंत्री के बरक्स खड़ा कर दिया गया है। कांग्रेसियों जो कि पिछले बारह वर्षों से ईश्वर से एक ही दुआ मांग रहे थे कि किसी तरह प्रियंका राजनीति के अखाड़े में आ जाएं तो वे तमाम पार्टियों को छठी का दूध याद दिला दें, की क्या इससे बड़ी कोई और मुराद हो सकती थी, जो अब पूरी हो गई है। उन्हें लगता है कि अब जबकि प्रधानमंत्री मोदी की वैसी हवा न रही जैसी 2014 में थी, इसलिए प्रियंका की राजनीतिक परिदृश्य में मौजूदगी का बड़ा असर होना ही है। यह गलत भी नहीं। प्रियंका की इतनी लोकप्रियता तो है ही कि वह बहुत से नेताओं की अपने दम पर हवा निकाल सकती हैं। उनकी ऐसी काबिलियत का अनुमान उनके दोबारा राजनीति में सक्रिय होने पर देशभर की मीडिया की प्रतिक्रिया से भी लगाया जा सकता है जिसने एक स्वर में इसे कांग्रेस का मास्टर स्ट्रोक यानी तुरुप की चाल बताया। कांग्रेस लोकसभा चुनावों में सबसे ज्यादा असरदार राज्य यूपी में अपना असर खोने की कगार पर पहुंच चुकी थी और सपा व बसपा उसे कगार से भी धकेल देने की फिराक में थे लेकिन प्रियंका को पूर्वी उत्तरप्रदेश का प्रभारी बना राहुल गांधी ने उन्हें धकेलकर बाहर करने की साजिश करने वाले प्रतिद्वंद्वियों को ही हैरान कर दिया है। प्रियंका के आने मात्र से ही कांग्रेस में इतना जोश भर गया है कि वह यूपी में 30 सीटें पाने का नामुमकिन दिखता ख्वाब देखने का साहस कर पा रही है। अब जरा इस पर भी विचार कर लिया जाए कि आखिर प्रियंका की मौजूदगी से कांग्रेसियों की उम्मीदें इस कदर क्यों बढ़ गई हैं? आखिर वह ऐसा भी क्या जादुई काम करनेवाली हैं? इस मुल्क में भले ही महिलाओं को सबरीमला में प्रवेश करने देने को लेकर लोग बुरी तरह गुस्सा हो जाते हों लेकिन वही महिलाएं जब राजनीति के क्षेत्र में अपने ताकतवर मंसूबे दिखाती हैं तो उन्हें महानायिका बनाने में भी वे पीछे नहीं रहते। इंदिरा गांधी को ऐसी ही महानायिका बना दिया गया था। लोगों ने अपने प्यार और अंधे विश्वास से उन्हें इतना ताकतवर बना दिया कि वह देश को इमरजेंसी में झोंकने जैसा तानाशाहीपूर्ण कदम उठाने का दुस्साहस भी कर गईं। ममता बनर्जी और जयललिता के रूप में हम दो और दुस्साहसी महिलाओं को याद कर समझ सकते हैं कि जनता जब किसी महिला नेता को चाहने लगती है तो वह जैसे उसे सर्वशक्तिमान बनाने का संकल्प ले लेती है। फिर प्रियंका शक्ल-सूरत से अपनी दादी पर गई हैं जो कम से कम एक तिहाई वोटरों के लिए एक भावनात्मक लक्षण है लेकिन इससे ज्यादा अहम यह है कि प्रियंका भारतीय राजनीति के भीतरी तत्वों से बखूबी परिचित हैं और इससे पहले भी कई बार चुनावों में सक्रिय भूमिका निभा चुकी हैं। राजनीति के पंडितों के मुताबिक, प्रियंका की सबसे बड़ी ताकत उनका सुलझा हुआ व्यक्तित्व है। वह जब साड़ी पहनकर और सिर को पल्लू से ढककर भीषण गर्मी में चुनाव प्रचार करने निकलेंगी और अपनी मां से अलग एकदम खांटी हिंदी में लोगों से संवाद करेंगी तो इस देश की अपेक्षा से ज्यादा भावुक जनता उन पर अपना कितना प्यार न्योछावर करने को उतारू हो जाएगी, इसका फिलहाल कोई अनुमान नहीं लगा सकता?

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