झारखंड अलग राज्य की लड़ाई लड़ने वाले मुसलमानों के हालात नही बदले: एस अली।

रांची : पूरा झारखंड अपनी स्थापना का 24वां जश्न मना रहा है. यहां के अख़बारों के पन्ने झारखंड की इतिहास-गाथा से भरे पड़े हैं. लेकिन अलग झारखंड राज्य के लिए जिसने सबसे पहले आवाज़ उठाई, वो आज एक सिरे से गायब हैं. 

झारखंड राज्य के इतिहास की बात करें तो सबसे पहले असमत अली ने अलग झारखंड राज्य की मांग उठाई थी. ये सन् 1912 की बात है. बिहार जब बंगाल से अलग हुआ था, तो उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत से झारखंड को अलग राज्य बनाने की मांग की थी. असमत अली इस हुकूमत में एक मुलाज़िम थे. इसकी चर्चा अबरार ताबिन्दा ने अपनी पुस्तक ‘झारखंड आंदोलन में मुसलमानों की भागीदारी’ में विस्तृत रूप से की है. उससे पहले धरती आबा बिरसा मुंडा या तिलका मांझी आदि वीरों ने जल, जंगल और ज़मीन पर अपने अधिकार की बात ज़रूर की थी. उसके लिए बलिदान तक दिया था. लेकिन अलग राज्य की कोई सुनिश्चित कल्पना तब तक सामने नहीं आई थी.

मरंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा ने बहुत बाद में आदिवासी महासभा के बैनर तले अलग झारखंड की आवाज़ उठाई. 1936 में मोमिन कांफ्रेंस ने भी अलग झारखंड राज्य के गठन का न सिर्फ़ प्रस्ताव पास किया, बल्कि 1937 में ठेबले उरांव के नेतृत्व में आदिवासी उन्नत समाज का खुलकर साथ दिया. वहीं 1937 में टाटा औद्योगिक घराने के एक मुलाज़िम रफ़ीक़ ने त्रिपुरा कांग्रेस में बिहार के पठारी क्षेत्र को अलग राज्य बनाने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया था.

आदिवासी महासभा के दस्तावेज़ों के अनुसार 1938 में तक़रीबन 7 लाख मुसलमान महासभा के साथ थे, जो झारखंड के आन्दोलन में हमेशा साथ खड़े रहें. आज़ादी के बाद भी मुस्लमान इस पूरे आन्दोलन में जयपाल सिंह के साथ खड़े रहें.

1952 में चिराग़ अली शाह ने भी अलग झारखंड राज्य की मांग को पूरा करने के लिए अपनी आवाज़ बुलंद की. 1962 में जयपाल सिंह के साथ मिलकर ज़हूर अली ने ‘जोलहा-कोलहा, भाई-भाई’ का नारा दिया.

1983 में दुमका में ‘झारखंड दिवस’ मनाने के जुर्म में अबू तालिब अंसारी की गिरफ़्तारी हुई. आप झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता थे. 1989 में इन्हें केन्द्रीय समिति का सचिव बनाया गया. इसी साल राजीव गांधी ने ‘कमिटी ऑन झारखंड मेटर्स’ बनाया, जिसके तहत दिल्ली जाकर बातचीत करने वालों में अबू तालिब अंसारी भी शामिल थे. इस दौर में कांग्रेस के सरफ़राज़ अहमद भी अलग झारखंड राज्य के हक़ में खुलकर बयान देते रहें. मिल्लत क्लब के अध्यक्ष रहे मुन्ना वारसी झारखंड आंदोलनकारियों को आर्थिक सहयोग और भीड़ उपलब्ध कराते थे।

यही नहीं, मुसलमानों ने झारखंड के लिए क़ुर्बानियां भी दीं. 21 जनवरी, 1990 में खेलारी में अशरफ़ खां, 4 जून, 1992 को कंटाडीह सोनाटी, टाटा के मो. शाहिद एवं आदित्यपुर जमशेदपुर के मो. जुबैर, 18 मार्च, 1993 को कोटशीला के वहाब अंसारी, शेख़ कुतबुद्दीन, मिदनापुर सिंहभूम के इस्लाम अंसारी और 1998 में चक्रधरपुर के मुर्तजा अंसारी ने नाकाबंदी के दौरान पुलिस की गोलियों का शिकार होकर अपनी जान झारखंड के लिए क़ुर्बान कर दी. मुसलमान हर तरह से झाखंड को अलग राज्य बनाने के  में पूरी तरह से सबके साथ खड़ा रहा है.

 *अल्पसंख्यक मामलों के जानकार  शमीम.अली* बताते हैं कि, झारखंड आंदोलन में मुसलमानों की सबसे अहम भूमिका रही है, परंतु राज्य बनने के बाद आर्थिक और राजनीतिक नुक़सान सबसे अधिक मुसलमानों को उठाना पड़ रहा है. न असमत अली की कोई चर्चा करता है और न ही रफ़ीक़ की, बाद के आंदोलनकारियों की बात ही छोड़ दीजिए.

वो बताते हैं कि, राज्य में 50 लाख से अधिक मुस्लिम आबादी होने के बावजूद लोकसभा या राज्यसभा से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है, जबकि अलग राज्य होने के समय 05 विधायक के साथ लोकसभा और राज्यसभा में सांसद झारखंड से थे।

81 सीटों वाले विधानसभा में सिर्फ़ 04 ही मुस्लिम विधायक हैं. जबकि संयुक्त बिहार में इस क्षेत्र से मुसलमानों का प्रतिनिधित्व दोनों जगह आज की तुलना में काफी बेहतर था. 

झारखंड बनने के बाद सरकारी नौकरी, रोजगार और विकास के मामले पर हमारे साथ भेदभाव बढ़े है और बड़े पैमाने पर मुसलमानों ने रोजगार हेतु दूसरे राज्य पलायन किया है, ना ही हमारे संवैधानिक अधिकार मिल पा रही है और ना ही आबादी के अनुपात सभी जगहों पर भागीदारी, पिछले 08 वर्षों में 64 से अधिक माॅबलिंचिग हुई है अधिक्तर पीड़ितों के न्याय और मुवाअजा नही मिला। 10 जून 2022 को विरोध मार्च निकाले दो नवयुवक पुलिस के गोली से मारे गये और 09 घायल हुए. 543 उर्दू स्कूलों का स्टेटस छीन लिया गया और जुमा की छुट्टी खत्म कर दी गई. मदरसों के शैक्षणिक कार्य एवं शिक्षकों की बहाली के लिए संकल्प 1090 वर्ष 1980 को नही माना जा रहा. 2018 में हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद +2 स्कूलों में उर्दू टीचर के पद नही दिये गये और ना ही प्रारम्भिक विधालय के बचे 3712 उर्दू शिक्षक के पदों को भरा जा रहा,

मान्यता व गैर मान्यता प्राप्त मदरसों के कई मामलें शिक्षा विभाग और जैक में लटके है, वक्फ बोर्ड, अल्पसंख्यक वित्त विकास निगम, अल्पसंख्यक आयोग, हज समिति को संवैधानिक व न्यायिक दर्जा तक प्राप्त नही है और ना बल्कि सैकड़ों एकड़ वक्फ भूमियों पर कब्ज़ा और विवाद है।

केन्द्र की प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम का लाभ मुसलमानों को नही मिला, यही हाल एसपीकूयईएम, नई रौशनी, लर्न एण्ड अर्न योजना और 15 सुत्री कार्यक्रम की है, सरकारी स्तर पर मसले हल करना तो दूर की बात सरकार जानकार लोगों से मिलना भी नही चाहती।

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