(कहानी) तिलिस्म: अपन-अपने

मम्मी, मम्मी आज तो मेली हौलिदे है। मैं आपकी हेल्प कलूंगा। और दो नन्हीं सी बाहें मेरी कमर के इर्द-गिर्द लिपट गयीं। गैस धीमी कर मैंने नन्हें आशू को गोद में उठाकर प्यार किया, अरे वाह! और मेरा राजा बेटा मेरी क्या हैल्प करने वाला है, बताये तो जरा! -नहीं मम्मी। मैं तो आशू से बड़ी हूं, आज मैं आप वाले स्पेशल काम के लिये बिल्कुल रेडी हूं। यह गौरी की आवाज थी, और अचानक मेरे दिमाग की बत्ती जल गयी। कहीं यह इसी हेल्प करने की योजना ही तो नहीं थी, जिसके बारे में तीनों बच्चे रात डायनिंग टेबल पर अपने पापा के साथ खुसुर-पुसुर कर रहे थे। मेरी उलझन अचानक बढ़ गयी, क्योंकि फिर से मोर्चाबंदी हो रही थी। अच्छा रानी बेटी! तुम आशू से बस एक बित्ते ही तो बड़ी हो। इसलिये मेरी मदद करने की दोनों को कोई जरूरत नहीं। चलो दोनों अपना-अपना दूध और नाश्ता खत्म करके जाकर खेलो। मुझे पता था कि उन्हें टालने की कोशिश नाकाम होने वाली है, क्योंकि अदिति का पदार्पण न हो, ऐसा संभव ही नहीं। -चलो बताओ आज क्या स्पेशल बनाया जाये, और शाम को कहां घूमने चलें?
-नहीं मम्मा, आज तो आप अपने बड़े वाले बक्से को खोलिये, और तुरंत हमारे गर्मी में पहनने वाले कपड़े निकालिये। तो अदिति भी आ गयी। -देखिये न, सर्दी तो है भी नहीं अब। आप जल्दी से हमारी लाइट और कूल ड्रैसेस निकालिये न, हमें चाहिये! हां मम्मा–प्लीज बक्सा खोलिये न हमें भी देखना है-प्लीज!! तीनों के समवेत स्वर काफी तेज गूंजने लगे। ओह हो। वैसे तो तीनों की कभी किसी बात पर एक राय नहीं होती। पर अब देखो तो! जाओ आज मेरा मूड नहीं है। कल तुम लोग जब स्कूल चले जाओगे, तब मै सब ऊनी कपड़े रखकर, तुम लोगों की गर्मी में पहनने वाली ड्रैसेस निकालकर रखूंगी। पक्की वाली प्रॉमिस। मैं महाभारत के अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में घिरा महसूस कर रही थी।
-पल आज ही क्यों नहीं? हमें देखना है, कि क्या उस बले से बाक्स में डाकुओं का खजाना छिपा लक्खा है। आशू की चमकती गोल-गोल आंखों में कार्टून चरित्रों का प्रभाव साफ दिख रहा था। -अरे नहीं बुद्घू! जबरदस्ती का बड़प्पन दर्शाती गौरी ने हमेशा की तरह उसकी बात काटी।
-कपड़े तो मम्मी बेड के अंदर भी रखती हैं। इसमें तो परी रानी का महल, गुडि़या, राजकुमार, जादू की छड़ी-ये बस कुछ होगा जिसे जादूगरनी से छिपाने की जरूरत मम्मी को पड़ती ही होगी। अब तो अदिति की रायशुमारी भी करनी होगी। जब उसकी तरफ देखा, तो हंसी आ गयी। गले में दुपत्र लपेटे, सुधीर का चश्मा अपनी नाक पर चढ़ाये किसी दार्शनिक की तरह वह एक पेन से अपने माथे पर खटखटा रही थी।
-मुझे तो लगता है इसमें मम्मा के न वैसे वाले सीक्रेटस हैं, जिन्हें वो किसी को दिखाना नहीं चाहती। बताइये न! क्या इसमें ब्वायफ्रेंड वाले लव लैटर्स और डायरी हैं और मुझे लगता है कि कुछ ऐसा भी होगा जो साजिशों का भंडाफोड़ कर देगा, और शायद पापा की कोई पुरानी याद वापस लौटा देगा-है ना? ये मेरी बिटिया टेलीविजन सीरियल की खुराक पर ही जिंदा है, आज पक्का पता चल गया। अब तो चक्रव्यूह से फटाफट निकलना होगा, सोचकर मैंने कहा, -अरे नहीं बेटा ऐसा कुछ भी नहीं वो तो सारे में सामान बिखर जायेगा। क्या फायदा पूरा दिन कपड़ों की उठाई-धराई में बरबाद करके। पर परिस्थिति फिर से बिगड़ गयी, जब पतिदेव अपने लैपटॉप के पीछे से बोले, अरे बच्चों मैं बताऊं असली बात क्या है। वो कहानी याद है न जिसमें राक्षस की जान तोते में होती थी। वैसे ही आपकी मम्मी की जान भी इस बक्से में है। लायी तो अपने मायके से थी, पर पता नहीं क्या अल्लम-गल्लम इसमे डालती रहती है, और जब मुझे ही कभी देखने नहीं देती, तो तुम लोग भला किस खेत की मूली हो? -बहुत हुआ। तुम लोग तो बात को कहां से कहां ले जाते हो! रुआंसी होकर मैं हथियार डालने ही वाली थी, कि दरवाजे की घंटी बजी और कृष्ण भगवान की तरह भैया ने अंदर प्रवेश किया। -दीदी, जीजाजी, बच्चों! कहां हो भई? देखो मैं गरमागरम जलेबी और कचौडि़यां लाया हूं। आओ जल्दी से पार्टी हो जाय। सभी का ध्यान उधर चला गया, और मैनें राहत की सांस ली। रात में, थकान से चूर होने के बावजूद नींद आंखों से कोसों दूर थी। सुधीर के संतुष्टि भरे खर्राटे कमरे में गूंज रहे थे, पर मेरी आतुर उत्तेजना मुझे सोने नहीं दे रही थी। वही उत्तेजना जो मुझे अपना बक्सा खोलकर देखने से पहले की रात हुआ करती है। सभी की कही बातें दिमाग में लगातार घूम रही थीं, और मेरी कसमसाहट बढ़ती चली जा रही थी। क्या करती। किसी से बता भी नहीं सकती थी कि घर में सभी लोगों ने जो कयास लगाये थे। मेरे बक्से के बारे में-सही थे। हां, उसमें बच्चों के नेफ्थलीन की गोली को लपेटे कपड़े तो थे ही पर उनके नीचे मेरा खजाना ही तो छिपा रखा था। लेकिन अगर कहीं उसे देखकर सुधीर या बच्चे मेरा मजाक उड़ायें या मेरी विरासत को मेरे सामने फालतू कबाड़ कह दें-तो मैं वाकई मर ही जाऊंगी। कैसे समझाती, उसमें मेरे वजूद का वह हिस्सा है, जिसने मुझको जोड़े रखा है और जिसे मैं किसी से भी कभी बांट नही सकती। अंदर रखा एक एक सामान यूं तो मुझे जुबानी याद है, पर उन्हें महसूस करके यादों की गलियों में टहलते हुये खुद से मिलने का मौका तो मुझे सिर्फ इसी वक्त, ऊनी सूती कपड़ों को रखने निकालने के बहाने ही मिला करता है और तब मैं अकेले रहना चाहती हूं।
प्रेम पत्रों का एक पुलिंदा तो है अदिति पर उन्हें मैं कालेज मैं खुद को ही लिखकर, खुशबूदार रंगीन लिफाफों को सहेलियों के सामने फिर खोला करती थी ताकि उन्हें लगे, मेरी परवाह करने वाला भी कोई तो है। बटन की एक आंख लगाये कपड़े की गुडि़या भी है, जिसकी दूसरी आंख भईया ने जलन के मारे उखाड़ दी थी, पर कक्षा में पहली बार प्रथम आने पर दादी का मेरे माथे पर वह पहला प्यार भरा चुंबन उनकी दी गई इस गुडि़या में आज भी बसता है। एक लंबा सूत का धागा रखा है जिसे विदाई के समय देते समय मां ने कहा था, बिटिया, आज से कोई दुख या तकलीफ हो, तो गटक जाना किसी से कुछ न कहना। पर हां कोई छोटी सी भी खुशी की बात हो तो इसमे गांठ लगा लेना। इन्हें गिनती रहना बिटिया तू खुश रहेगी। मां आशू के जन्म तक मैंने इसमें गांठ लगाई और खुश दिखने की आदत डाल ली। एक छिपाकर रखा, बदरंग सा बंदनवार है जिसे मै अपने खुद के घर में गृहप्रवेश के समय लगाऊंगी। अरे मेरे पास तो दादाजी की सच वाली कौड़ी भी तो रखी है अब तक। क्या झूठ बोलने पर सचमुच में वह गर्म होकर हाथ जला सकने की ताकत रख सकती होगी? क्या सुधीर उस कौड़ी को हाथ में लेकर शादी में खाई कसमें दोहरा पायेंगे। अम्मा जी, वो आपका आशू को पहनाया हुआ पहला झबला भी रखा है, जिसे सुधीर और बाउजी ने भी पहना था, लेकिन उसे केवल मेरा पहला पोता ही नहीं पोती हुयी तो वह भी पहनेगी।
अदिति से पहले की अपनी दोनों अजन्मी ललनाओं की तो निशानी तक न रख सकी, पर मांजी, अधबने मोजे और टोपे आज भी अधबने ही पड़े हैं। तुम्हारे मुंडन के समय गौरी, मैने छिपाकर रख ली थी एक भूरी सुनहरी लट, यह तुमसे मेरा वादा था, कि लड़की होने का दुःख जो पूरे परिवार के चेहरे पर तब झलक रहा था, मेरी बेटी, तुझे कभी उसे छूने भी नहीं दूंगी। बच्चों के अपने हाथें से बनायें रंग-बिरंगे कार्ड संजोये है मैंने। अदिति चेन स्टिच से काढ़कर माई मदर लिखा रूमाल, वो तुम्हारा मुझे दिया पहला उपहार, मैं तुम्हें वापस उस दिन दूंगी जब तुम मां बनोगी। पापा! जिस दिन बच्चों की जिम्मेदारियां पूरी हो जायेंगी मैं यही सुनहरा पेन उठाकर आपके लिये कविता लिखूंगी। रंग-बिरंगी पोटलियों में और क्या क्या है-तभी मेरी तंद्रा टूटी।
-अरे यार! क्या तुम नींद में बड़बड़ाकर करवटें बदल रही हो। आओ मेरी बांहों में। -हां सुधीर, तुम्हें तो शायद याद भी न होगी वो पहली लाल रंग की ड्रेस जो तुमने मुझे भेंट की थी, और जिसे सिर्फ एक ही बार पहनने की हिम्मत मैं कर पायी थी। पर तुम्हारे प्यार भरी कसमों की गर्माहट उसमें बस गयी थी। मैं जानती हूं सुधीर, तुम बेवफाई कर चुके हो। इस एक गरल को गटकने से मेरे दिल पर कितनी गांठें पड़ गयीं, तुम्हें तो पता तक न चला। शायद इसी लाल पोशाक का वास्ता है, कि धड़कनें नहीं थमती। तेजी से बढ़ते मेरे बच्चे, नीड़ छोड़ उड़ जाने वाले ही हैं। उससे पहले और बाद में भी जो कुछ भी है तुम्हारा ही है सुधीर। मेरा खुद का अगर कुछ भी कहीं पर भी है-तो वह उसी बक्से के अंदर कपड़ों के नीचे दबा पड़ा है। तुम सबके सामने उसे खोलने पर सारा ताना-बाना ही बिखर जायेगा। तो प्लीज! मेरे इस दुनिया से जाने तक इंतजार करना। लो, आखिरकार दिन बस निकलने ही वाला है। मैं मन ही मन कहे जा रही थी।

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