अब (पंजाबी कहानी)

-महिन्दर जीत-

इकबाल की पतंग फट गई तो वह कॉप और अड्डे से कागज छुड़ाकर तीन कमान बना रहा था। तब इकबाल बहुत छोटा था। मां ने देखा तो बोली, नोकीली चीजों से नहीं, खेलते बेटे…. किसी की आंख में तीली लग गई तो, गजब हो जायेगा… ला तेरे लिए झण्डा बना दूं।

झंडा बनाकर इकबाल के हाथ में पकड़ाती हुई फिर वह बोली, इनकलाब जिंदाबाद!

इकबाल भी बोला उठा इनकलाब जिंदाबाद! और गली की ओर भाग गया। झंडा उसके हाथ में था।

यह आजादी के पहले की है। उन दिनों नेताओं की इज्ज़त की जाती थी। जिस जगह से नेता गुजरते थे, लोग उनके चरणों की धूल उठा कर पल्ले में बांध लेते थे। घरों में माताएं उन नेताओं की कहानियां सुना कर बच्चों को उनके जैसा बनने की प्रेरणा दिया करती थीं। आत्म त्याग की मूर्तियां समझे जाते थे ये नेता। उन नेताओं की दी हुई कुर्बानियों की बात सुन कर स्वयं सिर श्रद्धा से झुक जाता था, उनके आगे, उनकी तस्वीरों के आगे।

जब आजादी मिली, तब इकबाल बड़ा हो गया था। वह पढ़ाई में सबसे आगे रहता। जलसे और जुलूसों में भी झंडा पकड़ कर सबसे आगे चलता। इन्हीं दिनों आया राम गया राम के चर्चे अखबारों में होने लगे। देश की उन्नति के लिए आत्म त्याग की बात नहीं रह गई थी। देश से कुछ लेने के लिए झंडा पकड़ कर हर कोई व्यक्ति स्वयं को लीडर बनाए बैठा था। अपने निजी लाभ के लिए झट दल बदले जाते थे। लोगों की विचारधारा को गलत मोड़ देने के लिए नारे लगाए जाते थे। पर राजनीति का भार इतना पड़ गया था कि अब कोई भी नेता सीना तान कर खड़ा रहने के काबिल नहीं रहा था। राजनीति के मंच पर इतने सारे नेता इकट्टे हो गए थे कि नीचे बुनियादों से उनका बोझ नहीं झेला जा रहा था। पूरी राजनीति डगमगा रही थी।

इकबाल की रेखें फूट गई थीं और वह विद्यालय में पहुंच गया था। अब वह न तो झंडा पकड़ता था और न नारे लगाता था। किसी जुलूस में भी नहीं जाता, किसी जुलूस के साथ भी नहीं जाता था। झंडे की जगह उसने कलम पकड़ ली थी। उसके आसपास अम्बार लगा रहता था कागजों का, अखबारों का पत्रिकाओं का।

एक रात जब वह देर से अपने कमरे में लौटा तो बहुत थका हुआ लग रहा था। कमरे में रोशनी करने के लिए इकबाल ने बत्ती की स्वीच दबाया, वोल्टेज पूरा न आने के कारण पीली सी रोशनी कमरे में फैल गई। उसने मजाकिया हंसी हंसी, पर अपनी भीतरी पीड़ा को दबाए रखने के लिए मुंह से कुछ बोला नहीं। वह उठ कर खाट पर ही बैठा रहा। उसे पहली बार इकबाल की आंखों में उदासी दिखाई दी। पहली बार उसके हाथों की हरकत में छटपटाती हुई विवशता थी।

साथी ने सहज स्वभाव ही पूछा, क्यों बाली क्या बात है, परेशान लगते हो? यह कैसी दुनिया है दोस्त। यहां निजी स्वार्थ के लिए कोई दूसरे का हक छीनने में परहेज नहीं करता। जहां, लिखे और बोले हुए शब्दों की आड़ में मनुष्य के विश्वासों का घात किया जा रहा है, जहां राह रौनक करके धत्ता बता जाते हैं, बेबस लोगों को, जनता सब कुछ जानते हुए भी चुप है… गुमसुम है, कोई भी मुंह से नहीं बोलता… कुछ इस तरह का तानाबाना इन नेताओं ने चारों ओर फैला रखा है… पर स्वार्थ का जो ज़हर ये ऊपर बैठे लोग, आज के वातावरण में घोल रहे हैं, कल उनके बेटे-पोतों को भी उसी हवा में सांस लेनी है… क्या इनको पता नहीं है… अपनी आंखों के सामने नई पीढ़ी की घुंटती हुई सांस हम सब कैसे देख सकेंगे?…

पहली बार इकबाल की वाणी में विद्रोह की स्वीकृति थी।

कई दिनों के बाद जा कर बात खुली तो पता लगा कि इकबाल उस दिन इतना दुखी क्यों था। उनके घर से कुछ दूर झुग्गी-झोंपड़ी वालों की आबादी थी। कई दशकों से ये लोग एक स्थान पर अपना निवास बनाए बैठे थे। इकबाल का बचपन झुग्गी वालों के बच्चों के साथ बीता था। दुख-सुख की सांझ थी उनके साथ। अचानक एक दिन उन झोपडि़यों की जगह निरा मैदान बन गया था और वे लोग तितर-बितर हो गए थे।

झोपडि़यों वाली जगह का कभी कोई वाली-वारिस नहीं दिखाई दिया था। बिना किसी रोक-टोक के झोपडि़यां बढ़ती गईं और वर्ष बीतते गए थे। आसपास ऊंची-ऊंची इमारतें भी उग आई थीं। कई धनाढ्यों की नजरें इस स्थान पर लगी हुई थीं। बाधा केवल हिम्मत करके झोपडि़यों को हटवाने की थी।

इकबाल जानता था कि कानूनी तौर पर झोपड़ी वालों को कोई आसानी से हटा नहीं सकता। अगर जरूरत थी तो बस सभी के एकजुट हो कर रहने की। इकबाल उनको कानून समझाता। एकता की ताकत के वास्ते दे-दे कर उन्हें रुपये इकट्ठे करके जमीन खरीदने की प्रेरणा देता। इस प्रकार अनजाने में, इकबाल ने झोपड़ी वालों के लिए झंडा उठा लिया। झोपड़ी वाले खूब उत्साह से दिन रात मेहनत करके पैसे जोड़ने लग गए। इकबाल को झोपडि़यों के स्थान पर उभरते मकानों के सपने आने लग गए।

अब इकबाल अपनी पढ़ाई खत्म करके शिक्षक हो गया था। एक दिन स्टाफ रूम में बैठे हुए किसी ने कहा-प्रोफेसर इकबाल, झुग्गी-झोपड़ी वालों के लिए झंडा उठाकर तुम इनको नई राह की ओर ले जा रहे हो।

सही मार्गदर्शन की जरूरत थी, वह मैंने जरूर दिखला दी है, मुझे आशा है कि एक दिन वे लोग इस स्थान को अपना कह सकेंगे।

पर वे तो तुम्हें अपना नेता समझते हैं।…

नहीं। नेता बनने का मेरा उद्देश्य नहीं है… पर मुझे विश्वास है कि झोपड़ी वालों में पल रही सच्चाई उनको आपस में बांधे रखेगी… फिर ये सभी मेहनती लोग हैं, अपने परिश्रम की कमाई के स्वयं स्वामी हैं…. मैं कौन होता हूं मार्गदर्शन देने वाला…

मेरे विचार में प्रो. इकबाल हमारे युग के मनुष्यों की जबान से इनकी रूह बोलना नहीं सीखी है… भगत सिंह ने असेम्बली में बम फेंक कर इसी सोती रूह को झकझोरा था। विदेश में रहने वाले भारतीय कामगाटा मारू जहाज में बैठ कर स्वदेश के लिए वापस लौट चले थे, सिर्फ इसी रूह की आंखें खोलने के लिए। सुभाष चन्द्र बोस ने भेष बदले फौज बनाई, युद्ध किया सिर्फ लोगों की रूह को मोशन देने के लिए… पर देख लो… इतनी कुर्बानियों के बाद भी इतने वर्षों के बाद…

पर अब हम आजाद देश के नागरिक हैं… हम अपने स्वाभिमान और विश्वास के कारण विधड़क हो कर अपने हक प्राप्त कर सकते हैं, अपनी जिम्मेदारियां निभा सकते हैं… इकबाल ने गम्भीर होकर कहा।

मुझे लगता है, तुम अपने आदर्शवाद में सिमटे हुए अपने पास को अच्छी तरह समझ नहीं पा रहे हो… राजा महाराजा और विदेशी हाकिमों की गुलामी करते-करते अपने लोगों का स्वाभिमान कण कण हो के बीते रहे वर्षों के साथ झरता रहा है। इन्हें पुशतों से आंखें नीची रखने की आदत पड़ चुकी है। रोशनी देखने के लिए, सिर उठाने की जरूरत इन्हें अभी नहीं पड़ी है। जो लोग हाकिमों का दिया हुआ खा-खा कट धन्य धन्य करते हों, उनके लिए अपनी मेहनत की पहचान कर पाना आसान नहीं है…।

झोपड़ी वाले सीधे सादे से लोग थे। वे इकबाल से केवल स्नेह ही नहीं करते थे, इसकी लगन देखकर उनके दिल में बड़ा आदर था, इसके लिए पर राजनीति के खिलाडि़यों के लिए स्नेह या आदर का कोई मूल्य नहीं होता। वे अपनी चालों के कारण आवश्यकता पड़ने पर जिसको चाहे बस में कर लेते हैं। उन्होंने इकबाल से कुछ नहीं बताया। अपने पूर्वजों का रूख झोपड़ी वालों की ओर कर दिया। नित्य नये लोग, नयी-नयी राजसी पार्टियां स्वयं अपने झंडे के नीचे लाने के लिए उनके पास आने लगीं। एक ने आकर रोटियां बांटीं। ऊनी कम्बल दिये। रहने के लिए नये मकान मुफ्त दिलाने का आश्वासन दिया।

खाने के लिए रोटी, पहनने के लिए कपड़ा और रहने के लिए मकान, ये तीनों चीजें, एक साथ, बिना किसी श्रम के जिसने दिलाने का वादा किया हो, उसके पीछे भला कौन नहीं लगता। धीरे-धीरे सभी झोपड़ी वाले उसके पीछे लग गए। जब भी वह झोपड़ी वालों को वस्तुस्थिति का आभास कराने जाता, वह आदमी और रोटियां बांटता, नारे लगवाता, कपड़े बांटता, झंडे पकड़ाता और नारे लगवाता।

एक दिन नारे लगवाता हुआ वह आदमी झोपड़ी वालों को झोपडि़यों से दूर ले गया। थक टूट कर जब वे लोग वापस लौटे तो झोपडि़यों की जगह समतल मैदान बन चुका था। उनके बच्चे, बूढ़े और औरतें दहाड़ें मार-मार के रो रहे थे। उन्होंने बताया कि एक जीप में दमकते कपड़ों वाला कोई आदमी आया था। उसने जीप में बैठे-बैठे ही नोट बांटे और कई झोपडि़यां अपने आप गिर गईं। बची-खुची, लाठी और बंदूकों वालों ने आ कर ढहा दीं। वह रोटियां बांटने वाला, मुफ्त जगह दिलवाने वाला आदमी ढूंढ़ने पर भी नहीं मिला।

इस हादसे को हुए काफी साल बीत गए। इकबाल के आसपास किताबों के ढेर बढ़ गए थे। विद्यार्थी इसकी कक्षा में मगन होकर पढ़ते थे। पर इकबाल ज्यादा बात नहीं करता था। उसकी आंखों के आगे कभी वे चेहरे आ अटकते जो हंसते हुए वतन के लिए सूली पर चढ़ गए थे और कभी वे चेहरे घूम जाते जिन्होंने कभी कुछ गंवाया नहीं और केवल नारे लगाते रहे और आज भी लगा रहे हैं।

जाड़ों के दिन थे। इकबाल छत पर खड़ा उड़ती हुई पतंगों को देख रहा था। रंग-बिरंगी पतंगें, अलग-अलग आकार को समेटे आकाश में ऐसे ऊपर नीचे हो रही थीं, जैसे खुली हवा पर अपना हक दिखा रही हों। फिर उसकी दृष्टि बारीक से धागे पर पड़ी। सभी पतंगें किसी न किसी डोर के अधीन थीं। कोई डोर पतंग को ढील दे कर दूसरी डोर से पेंच लगा रही थी, और कोई खींच कर विरोधी डोर को काट रही थी। आसमान पर मिली बैठी पतंगों को देखकर अनुभव कर रहा था जैसे वे अपनी उड़ान में मस्त हैं। डोर की अधीनता से अनजान हैं। इकबाल की चेतना तब उड़ान से धरती पर आई जब उसके बच्चे ने उसकी टांगों को अपने आलिंगन में आ भरा।

बोलो जी, क्या चाहिए? इकबाल ने अपने बच्चे को मुंडेर पर बैठाते हुए पूछा।

अपने हाथ में थामे फटी हुई पतंग दिखाते हुए वह बोला, यह फट गई…।

तो क्या हुआ… नई ले आओ… नहीं तो इन तीलियों में कागज चिपका कर झंडा बना लो। फटी हुई पतंग को लेते हुए इकबाल ने सहज स्वभाव ही कह दिया।

नहीं, झंडा नहीं… रिंकू है न… वह पतंग के कागज में कुछ रख कर धमाका करने वाले गोले बना लेता है… बड़ी जोर की आवाज आती हैं… मुझे भी… मुझे भी गोला बना दीजिए… मैं भी धमाका मारूंगा।

इकबाल के हाथ फटी हुई पतंग का झंडा बनाने-बनाते स्वयं ही रूक गए।

(अनुवादकः स्व. घनश्याम रंजन)

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