सऊदी अरब : आतंकवाद का विरोधी या संरक्षक?

-तनवीर जाफरी-

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में गत् 14 फरवरी को भारतीय सुरक्षा बलों को निशाना बना कर किए गए हमले में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के 41 जवानों की शहादत के बाद भारत-पाक के मध्य तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई है। इस तनाव की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी भारत-पाक के मध्य चल रहे तनाव पर अपनी चिंता व्यक्त की है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने गत् दिनों कहा कि ‘पुलवामा आतंकवादी हमले व इसमें 41 जवानों के शहीद होने के बाद से भारत और पाक के बीच बेहद खतरनाक स्थिति है। हम चाहते हैं कि यह संघर्ष खत्म हो। कुछ ही दिन पहले बड़ी सं या में लोग मारे गए। हम इसे बंद होते हुए देखना चाहते हैं। अमेरिका इस प्रक्रिया में बहुत अधिक शामिल है। इस समय भारत व पाकिस्तान के मध्य बहुत सारी समस्याएं हैं। व्हाईट हाऊस दोनों देशों के संपर्क है और आशा है कि कश्मीर में शीघ्र ही खून-खराबा बंद हो जाएगा’। परंतु साथ ही ट्रंप ने यह भी कहा कि ‘भारत बहुत सखत कदम उठाने पर विचार कर रहा है। उसने हमले में अपने लगभग 50 लोग खो दिए हैं। मैं इसे भी समझ सकता हूं’। 14 फरवरी को पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले के तुरंत बाद घटी कुछ घटनाएं ऐसी भी हैं जिन्हें इसी पुलवामा हमले के संदर्भ में देखना बहुत ज़रूरी है। इनमें पहली घटना तो सऊदी अरब के क्राऊन प्रिंस सलमान के पाकिस्तान दौरे से जुड़ी है। प्रिंस सलमान का पाक दौरा 16 फरवरी को प्रस्तावित था। परंतु प्रिंस ने अपने दौरे को एक दिन के लिए स्थगित कर यह संदेश देने की कोशिश की कि वह भारत-पाक के मध्य पुलवामा हमले को लेकर चल रहे आरोप-प्रत्यारोप के वातावरण में स्वयं को अलग रखने की कोशिश कर रहे हैं। परंतु उन्होंने 16 फरवरी के बजाए17 फरवरी को पाकिस्तान का दौरा किया तथा 20 अरब डॉलर की भारी-भरकम सहायता भी पाकिस्तान के लिए घोषित की। इसके पश्चात प्रिंस को हालांकि पाकिस्तान से सीधे भारत आना था। परंतु उन्होंने तनावपूर्ण हालात की गंभीरता को समझते हुए पाकिस्तान से पहले सऊदी अरब वापस जाने का फैसला किया और फिर वहां से सीधे नई दिल्ली के लिए रवाना हुए। भारत आकर प्रिंस क्राऊन ने जहां कई प्रकार के समझौते किए वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने स्वभाव के अनुरूप प्रोटोकॉल तोड़ते हुए एयरपोर्ट के रनवे पर पहुंचकर उनका स्वागत किया। प्रिंस सलमान ने आतंकवाद की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त की तथा इसके विरोध का संकल्प भी जताया। अब सऊदी अरब-पाकिस्तान-भारत के इस त्रिकोणीय राजनैतिक समीकरणों के मध्य यह सवाल ज़रूर उठता है कि जिस पाकिस्तान को आर्थिक सहायता देने से अमेरिका पीछे हट गया और अमेरिका यह भी कई बार कई अवसरों पर कह चुका है कि जो पैसा पाकिस्तान को वहां के विकास कार्यों के लिए अथवा शिक्षा या स्कूल व अस्पताल के लिए दिया जाता है पाकिस्तान द्वारा उनका दुरुपयोग किया जाता है। भारत सहित दुनिया के कई देशों के आरोप हैं कि भुखमरी, बेरोज़गारी तथा मंहगाई से जूझ रहा पाकिस्तान आतंकवाद को प्रोत्साहित करने में अधिक धनराशि खर्च करता है लिहाज़ा इन्हें आर्थिक सहायता देने की कोई ज़रूरत नहीं। ऐसा भी नहीं है कि यह आरोप केवल कथित धार्मिक दुर्भावनाओं के चलते भारत की ओर से ही लगाए जा रहे हों। पाकिस्तान की इस प्रकार की आतंकवादी गतिविधियों से उसका सबसे घनिष्ठ व सांस्कृतिक व धार्मिक समानताएं रखने वाला अफगानिस्तान भी बेहद दु:खी है। अफगानिस्तान को जिन तालिबानों ने खंडहर बनाकर रख दिया था उसका पालन-पोषण पाकिस्तान में ही हुआ। अफगानिस्तान के लोग आज पाकिस्तान से अधिक भारत पर भरोसा करते हैं। इसी प्रकार ईरान भी पाकिस्तान से बेहद दु:खी है। पिछले ही दिनों इसी प्रकार की आतंकवादी गतिविधियों को लेकर ईरान व पाकिस्तान के मध्य काफी तनावपूर्ण स्थिति देखने को मिली। ईरान भी पाकिस्तान को कई बार आतंकी गतिविधियों को प्रोत्साहन देने से बाज़ आने की नसीहत दे चुका है। स्वयं पाकिस्तान व उसकी सेना ब्लूचिस्तान के लोगों के साथ कैसा व्यवहार कर रही है यह भी दुनिया देख रही है। इन हालात में यदि सऊदी प्रिंस पाकिस्तान को 20 अरब डॉलर सहायता भी देते हैं और भारत में आकर आतंकवाद के विरुद्ध अपने घडिय़ाली आंसू भी बहाते हैं साथ-ही साथ न तो पुलवामा हमले का जि़क्र करते हैं न ही हमारे जवानों को श्रद्धांजलि देते हैं न ही पाकिस्तान में फल-फूल रहे आतंकी संगठनों या उनके सरबराहों की निंदा करते हैं ऐसे में प्रिंस सलमान के आतंकवाद विरोधी वक्तव्य के आिखर क्या मायने रह जाते हैं? अब यदि सऊदी अरब व आतंकवाद के मध्य रिश्तों की बात करें तो प्रिंस सलमान का आतंकवाद के विरुद्ध दिया जाने वाला कोई भी बयान महज़ एक मज़ाक या ढकोसला ही नज़र आता है। दुनिया आज आिखर इसी सऊदी क्राऊन प्रिंस से यह क्यों नहीं पूछना चाहती कि कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा को वैश्विक स्तर पर फैलाने में सऊदी अरब का कितना योगदान है? खुद सऊदी अरब में कट्टरपंथी शासकों द्वारा उनकी अपनी विचारधारा से मेल न खाने वाले अन्य समुदायों के साथ कितना ज़ुल्म किया जाता है? धर्म के नाम पर सऊदी अरब में आए दिन मानवता का गला घोंटा जाता है। मानवाधिकार का सरारसर उल्ंलघन होता रहता है। यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के प्रतीक बन चुके ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादी का संबंध भी न केवल सऊदी अरब से ही था बल्कि उसकी अपनी विचारधारा भी वही थी जो अरब शाही घराने की है। और निश्चित रूप से सऊदी अरब के शाही परिवार ने अपनी इसी आतंकपूर्ण विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए पाकिस्तान में जि़या-उल-हक के सिर पर अपना हाथ रखा था और उसी समय से पाकिस्तान सऊदी अरब से धन ऐंठता रहा और हािफज़ सईद व मसूद अज़हर जैसे आतंकी सरगनाओं की नर्सरी लगाता रहा। उपरोक्त हालात अपने-आप में इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पर्याप्त हैं कि सऊदी अरब का आतंकवाद के विरुद्ध बोलना न केवल एक दिखावा है बल्कि यह मात्र औपचारिकता पूर्ण वक्तव्य कहा जा सकता है। हकीकत तो यही है जो सऊदी अरब की सरज़मीन से लेकर उसके आतंकवादी सरगनाओं से रिश्तों तथा पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद के संभावित परिणामों के रूप में दिखाई दे रही है। वैसे भी प्रिंस सलमान अपनी शाही जीवन शैली, ऐशपरस्ती, एय्याशी तथा इन सबके ऊपर बेशुमार धन खर्च करने वाले पिं्रस के रूप में वि यात हैं। और गत् वर्ष अपने अमेरिका दौरे के दौरान इस 33 वर्षीय प्रिंस ने अपनी इस ऐशपरस्ती को अपनी शाही जीवन शैली का हिस्सा बताते हुए यह भी कहा था कि ‘मैं एक अमीर व्यक्ति हूं गऱीब नहीं और मैं गांधी या नेल्सन मंडेला भी नहीं बल्कि मैं एक शासक परिवार से हूं जो सैकड़ों सालों से है’। उनका बयान भी यही इशारा करता है कि आम लोगों की चिंताओं व उनके दु:ख-दर्द की फ़िक्र गांधी व मंडेला जैसे समाज की ज़मीनी हकीकत जानने वाले राजनेता ही समझ सकते हैं उन समस्याओं को वह शाही घराना कैसे समझ सकता है जिसे अपनी विरासत में कट्टरपंथ, रूढी़वाद, ऐशपरस्ती तथा धर्म के नाम का दुरुपयोग कर आम लोगों पर ज़ुल्म ढाने जैसी विरासत हासिल हुई हो। यह सऊदी शासन की कट्टर विचारधारा ही है जिसने आज पूरे विश्व में इस्लाम व आतंकवाद के मध्य संबंध होने की बात प्रचारित कर रखी है। ऐसे में इस बात का गंभीर चिंतन होना ज़रूरी है कि वास्तव में सऊदी अरब आतंकवाद का विरोधी है या संरक्षक?

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