गुजरात का आदिवासी नाराज क्यों?

-ललित गर्ग-

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आदिवासी एवं जनजातीय लोगों के कल्याण एवं उन्हें राष्ट्रीय मूलधारा से जोड़ने के अपने संकल्प को लेकर अपनी प्रतिबद्धता को बार-बार दोहराते रहते हैं, दूसरी ओर उन्हीं के गृहराज्य गुजरात के आदिवासी अपने अस्तित्व एवं अस्मिता को लेकर बार-बार आन्दोलनरत होने को विवश हो रहे हैं। जब तक यह विरोधाभास समाप्त नहीं होगा, आदिवासी कल्याण की योजनाओं पर प्रश्नचिन्ह खड़े होते रहेंगे।

विदित हो इनदिनों गुजरात के छोटा उदयपुर में आदिवासी जनजातीय समूह बृहत स्तर पर आन्दोलन कर रहे हैं, जिसमें आदिवासी जननायक संत गणि राजेन्द्र विजयजी एवं विभिन्न दलों के राजनेता एक मंच पर आकर आदिवासी जनजातीय अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं, ऐसा इसलिये हो रहा है कि किन्हीं सरकारी प्रावधानों में राठवा जाति को आदिवासी नहीं माना जा रहा है, जबकि लाखों की संख्या वाली यह जनजाति आदिवासी है और आजादी के बाद से उसे आदिवासी ही मानते हुए सारी सुविधाएं मिलती रही है। उनके अस्तित्व को धुंधलाने की कुचेष्ठाओं को लेकर हो रहे इस आन्दोलन के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, लेकिन सरकार उनकी उचित मांगों को लेकर किसी निर्णायक मोड़ पर पहुंचती हुई नहीं दिख रही है। आदिवासी अधिकारों के हक में एवं उनके कल्याण के लिये तत्पर दिखाई देने वाली भाजपा सरकार आखिर मौन क्यों है? इस आन्दोलन एवं सरकार की उदासीनता के बीच की दूरी दर्शाती है कि सरकार की कथनी और करनी में बड़ा अन्तर विरोधाभास है।

यह अन्तर और विरोधाभास इसलिये है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन्हीं दिनों एक बार फिर झारखण्ड के रांची में आदिवासी एवं जनजातीय लोगों के कल्याण एवं उन्हें राष्ट्रीय मूलधारा से जोड़ने के अपने संकल्प को दोहराते हुए उन्होंने इसके लिये आदिवासी जनजीवन में शिक्षा के लिये एकलव्य माडल आवासीय स्कूलों की श्रृंखला को अधिक सशक्त बनाने एवं इसे पीपी माॅडल पर संचालित करने पर जोर दिया है। निश्चित ही उनके इस संकल्प से आदिवासी जनजीवन एवं वहां के बच्चों में शिक्षा की एक रोशनी का अवतरण होगा। मोदी एवं भाजपा सरकार आदिवासी समुदाय का विकास चाहती हैं, ‘आखिरी व्यक्ति’ तक लाभ पहुँचाने की मंशा रखती हैं और आदिवासी हित एवं उनकी संस्कृति को जीवंत करने के लिये तत्पर है। केन्द्र सरकार की एकलव्य मॉडल स्कूलों की महत्वाकांक्षी योजना से आदिवासी क्षेत्रों में व्यापक बदलाव आएगा। देशभर में तीन साल में 462 एकलव्य स्कूल खोलने का लक्ष्य है। इस लक्ष्य को पूरा होने का अर्थ आदिवासी जनजीवन की दशा एवं दिशा बदलना। लेकिन प्रश्न है कि गुजरात को आदिवासी क्यों नाराज है? क्यों उनके अधिकारों को कुचला जा रहा है? क्यों नहीं उनकी जायज मांगों को स्वीकार किया जाता? भाजपा की प्रान्तीय सरकार में ही उनको क्यों आन्दोलन की जरूरत पड़ रही है? ये प्रश्न समाधान चाहते हैं।

राष्ट्र की विडम्बना रही है कि आदिवासी समुदाय को बहला-फुसलाकर उन्हें अपने पक्ष में करने की तथाकथित राजनीति आदिवासी जनजीवन की तकलीफों के बढ़ते जाने का कारण रही। इन आदिवासी-समुदायों को बार-बार ठगे जाने के ही षडयंत्र होते रहे हैं। देश में कुल आबादी का 11 प्रतिशत आदिवासी है, जिनका वोट प्रतिशत लगभग 23 हैं। क्योंकि यह समुदाय बढ़-चढ़ का वोट देता है। बावजूद देश का आदिवासी दोयम दर्जे के नागरिक जैसा जीवन-यापन करने को विवश हैं। यह तो नींव के बिना महल बनाने वाली बात होती रही है। आदिवासी समुदाय को बांटने और तोड़ने के व्यापक उपक्रम भी विभिन्न राजनीतिक दल करते रहे हैं, ये दल अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए तरह-तरह के घिनौने एवं देश को तोड़ने वाले प्रयास करते हुए इन आदिवासी के उज्ज्वल एवं समृद्ध चरित्र एवं संस्कृति को धुंधलाते रहे हैं, प्रधानमंत्री ने इनकी पीड़ा को गहराई से महसूस करते हुए समय-समय पर उनके कल्याण की बहुआयामी योजनाओं को आकार दिया है। आज इन आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार एवं विकास का जो वातावरण निर्मित होता हुआ दिखाई दे रहा है तो इसका श्रेय मोदी सरकार को जाता है। देश के विकास में आदिवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका है और इस भूमिका को सही अर्थाें में स्वीकार करना वर्तमान की बड़ी जरूरत है और इसी जरूरत को पूरा करने के लिये मोदी सरकार प्रतिबद्ध है।

हाल ही में मुझेे गुजरात के छोटे उदयपुर के कवांट में नरेन्द्र मोदी के द्वारा शिलान्यास किये गये एकलव्य माॅडल आवासीय विद्यालय को देखने का अवसर मिला। जिसका संचालन आदिवासी संत गणि राजेन्द्र विजयजी के नेतृत्व में सुखी परिवार फाउण्डेशन द्वारा किया जा रहा है। इस विद्यालय की उपलब्धियों, शिक्षा का स्तर, छात्रों का अनुशासन, विविध गतिविधियों में सहभागिता, विद्यालय के उन्नत विज्ञान, गणित, आदि की प्रयोगशालाएं, छात्र-छात्राओं को राष्ट्रीय एवं प्रांत स्तर पर मिले पुरस्कार आदि देखकर सुखद आश्चर्य हुआ। किसी भी माॅडर्न स्कूल की तुलना में यह विद्यालय कम नहीं था। जबकि अन्य प्रांतों के एकलव्य विद्यालयों को देखने का अवसर भी मिला। सरकारी संरक्षण में चल रहे स्कूलों की तुलना में पीपी माॅडल पर चल रहे इस विद्यालय में दिनरात का फर्क है। केन्द्र सरकार एवं प्रांत सरकारों को पीपी माॅडल पर गैर-सरकारी संगठनों को एकलव्य स्कूलों के संचालन पर प्राथमिकता देनी चाहिए। इससे आदिवासी कल्याण के वास्तविक लक्ष्यों को हासिल करने में सफलता मिलेगी। क्योंकि आदिवासी लोग मेहनत से काम में जुटे हैं। पढ़ाई-लिखाई के प्रति जागरूकता फैल रही है। बड़े-बड़े अधिकारी गांवों से निकलकर देश चला रहे हैं। हमारा देश बहुत धनी देश है लेकिन यहां के लोग गरीब हैं। इस बात में सच्चाई है। हमारी आदिवासी धरती में सोना छिपा है। हमारे लोग मेहनती हैं। वे अपने श्रम की बूंदों से इस भूमि को सींचकर भारत के नये भविष्य की कहानी गढ सकते हैं। फिर से भारतवर्ष को सोने कि चिड़िया बनाया जा सकता है। इसके लिये हमें अपने आदिवासी गांवों की ओर प्रस्थान करना होगा। आदिवासी जनजीवन एवं उनके अधिकारों के लिये सहानुभूति से विचार करना होगा, ताकि उनको आन्दोलन के लिये विवश न होना पड़े, उनकी ऊर्जा का उपयोग एक नई शक्ति का संचार करने में हो ताकि देश तरक्की कर सके। आदिवासी उन्नत होंगे तो राष्ट्र उन्नत होगा।

भारत के समग्र विकास में आदिवासी समुदाय की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका है। वास्तविक विकास आदिवासी जल, जंगल, जमीन एवं गांवों के विकास पर ही निर्भर है। इसलिये आधुनिक विकास की विसंगतियों एवं विषमताओं को दूर करने के लिये हमें आदिवासी समुदाय को विकसित करना होगा। आदिवासी समुदायों को विकसित, शिक्षित एवं समृद्ध बनाकर ही हम भारत का वास्तविक विकास कर सकते हैं। विकास की धीमी एवं असंतुलित गति के लिए सरकारों की दूषित नियोजन व्यवस्था भी उत्तरदायी रही है। आदिवासी अंचलों में में शैक्षिक सुविधाएं वांछित स्तर की नहीं हैं। अच्छी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है इसलिए आदिवासी अनेक प्रकार के रोगों से त्रस्त हैं। अज्ञानता और पिछड़ेपन के कारण भी वे सफाई का महत्व नहीं समझते और बीमारियां उनको जीवनपर्यंत लगी रहती है। बहुत से गांवों में अच्छी यातायात व्यवस्था अभी भी बहुत दूर की बात है। आदिवासी के लाभ के लिए शुरू की गई अनेक योजनाओं के अंतर्गत आवंटित धन दौलत गलत स्थान पर पहुंच जाता है। इस प्रकार आदिवासी की दशा को सुधारने के लिए अरबों रुपए व्यय किए गए हैं किंतु कोई संतोषजनक प्रगति इस दिशा में नहीं हुई। लेकिन मोदी सरकार इन विसंगतियों एवं विषमताओं से आदिवासी समुदायों को मुक्ति दिलाने के लिये संकल्पित एवं प्रतिबद्ध है। वह न केवल आदिवासी संस्कृति, कला, संगीत, जीवनमूल्यों को विकसित करने को तत्पर है बल्कि उनक रोजगार, ग्रामोद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जीवनस्तर को उन्नत बनाने के लिये अनेक बहुआयामी योजनाओं को आकार दे रही है। हमें आदिवासी जल, जंगल, जमीन एवं जीवन आधारित विकास का माॅडल विकसित करना होगा, जिसके माध्यम से भारत को समृद्ध एवं शक्तिशाली बनाना संभव है। इसमें एकलव्य माॅडल स्कूलों की केन्द्र सरकार की योजना मील का पत्थर साबित होगी। मोदी सरकार को ही आदिवासी असंतोष एवं उपेक्षा की बार-बार बनती स्थितियों को स्थायी रूप से समाप्त करने के लिये ठोस नीति बनानी होगी ताकि गुजरात के आदिवासी समुदाय में होने वाले आन्दोलनों पर विराम लग सके।

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