व्यंग्य : डेंगू, चिड़िया, गाय और भावुकता

-निर्मल गुप्त-

डेंगू क्या आया, बेचारी चिड़ियों और गली मोहल्लों में भटकने वाली गायों को पीने के लिए साफ पानी मिलना दूभर हो गया। सबको पता लग गया कि डेंगू वाला मच्छर साफ पानी में पनपता है। चिड़ियों के लिए घर की छत पर रखे जलपात्र और सार्वजनिक नांद रीती कर दी गईं। एक की वजह से दूसरे की जान सांसत में आ गई। अब देखिए न, बिल्ली छीके पर टंगी दूध मलाई की मटकी ढूंढ़ती घर में आई तो सारे चूहे बिल में जा छिपे, अलबत्ता वह मुंडेर पर बैठे कबूतर को चट कर गई। मटकी फ्रिज में सुरक्षित बची रही। बिल्ली भी भूखी नहीं रही। सब अपने-अपने मंतव्यों में कमोबेश कामयाब रहे। कबूतर की जान गई सो गई बाकी चीज तो बच गईं। यह बिल्लियों के लिए मनोनुकूल समय है। उनके पास खुद को बनाए रखने के तमाम विकल्प हैं। वह दूध दही से लेकर चूहा और सागभाजी से लेकर कबूतर तक सब खा लेती है।

चटखारे लेकर खाती है, लेकिन चपर चपर की आवाज को दूर तक नहीं जाने देती। दबे पांव चलती है। चालाकी का होना उसके डीएनए में बताया जाता है। इस बात की पुष्टि अभी होनी बाकी है। अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर व्यंग्य रचा जाता है।आलोचना के लिए प्रमाणित लैब की जांच रिपोर्ट अपरिहार्य होती है।बिल्ली ने कबूतर मार कर खाया, यह बात तो पक्की है, लेकिन कब और क्यों खाया, इसकी पड़ताल होनी शेष है। यह बात यदि सही हो कि वह नौ सौ चूहे खाकर तीर्थाटन कर आई थी, इससे यह साबित नहीं होता कि वह मासूम है। वैसे भी भोजन की परंपरा से किसी का सदाचरण तय नहीं होता। भोज्य पदार्थों में मिलावट के जरिए धनकुबेर बनने वाले अकसर बड़े धार्मिक बने दिखते हैं। मुल्क की अस्मिता को मुनाफे की तराजू पर रख पर बेच देने वाले पर्यावरण संरक्षण के हक में सबसे पहले नारा बुलंद करते हैं।

नकली दवाइयों का कारोबार करने वाले समाजसेवी के गेटअप में देवदूत टाइप के लगते हैं। यह कांव कांव करने वाले कौओं, पल पल रंग बदलते गिरगिटों, उभयलिंगी मच्छरों, स्वामिभक्त कुत्ता, मुंह बिचकाने वाले बंदरों और हर बात पर चुप्पी साध लेने वालों के लिए ठीकठाक समय है। बाकी लोगों को बचे रहने के लिए दूसरे की थाली में रखी रोटी की जात की मुखबरी करनी होगी। थाली में रखी सब्जी का धर्म बताना होगा। किसी न किसी टोली में शामिल होकर जयकारा करना होगा।ध्यान रहे, डेंगू का वायरस मौसमी है, बीत जाएगा। जब तक वायरस सक्रिय रहेगा चिकित्सा का धंधा करने वालों के यहां उत्सव का सा माहौल रहता है। गरीबी भूख, प्यास और कुपोषण के जरिए कोई वोटबैंक नहीं बनता। इससे किसी नेता की छवि न निर्मित होती है, न बिगड़ती है।

इसलिए इस पर कोई डिबेट नहीं होती। आहार की प्रकृति के अनुसार सेक्युलरिज्म का सार्टिफिकेट जारी होता है। दूसरों को चिढ़ा चिढ़ा कर खाने खिलाने से अभिव्यक्ति की आजादी प्रकट होती है। इससे पता चलता है कि आप मुल्क के दस प्रतिशत विद्वानों की जमात में हैं। इस पर बयान दर बयान जारी होते हैं। चिड़ियों के लिए रखे पानी के पात्र देर-सवेर भर दिए जाएंगे। गायों के लिए सेवाभाव से दिया जाने वाला चारा-पानी फिर मिलने लगेगा। आजकल हमारी भावुकता जरा सहमी हुई है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

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