अयोध्या के बहाने हिन्दू मुस्मिल सौहार्द्र की राह पर कदम

-के.एम झा-

अयोध्या मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायलय के फैसले का सम्मान करते हुए सुन्नी वक्फ बोर्ड ने किसी भी पुनर्विचार याचिका को पूरी तरह नकार दिया है। इसके साथ ही सदियों पुराने अयोध्या मामले का सुखद अंत हो गया। गत 9 नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले से सदियों पुराने अयोध्या मामले का एक ऐसा हल निकाल दिया था, जिसके बारे में लगभग सभी पक्षों की एक ही राय थी कि इतने पुराने विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का इससे अच्छा फैसला और कुछ नहीं हो सकता था। इस विवाद को न्यायालय में ले जाने वाले सभी पक्षकारों ने इस फैसले पर संतोष व्यक्त करते हुए यह कहा था कि अब उसे सारी पिछली बातों को भूलकर आगे की ओर देखना चाहिए। इन पक्षकारो में इकबाल अंसारी और सुन्नी वक्फ बोर्ड भी शामिल थे ,जिन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने की किसी भी मंशा से इनकार किया था। तब सारे देशवासियों ने उनकी मुक्त कंठ से सराहना की थी और यह उम्मीद व्यक्त की थी कि अयोध्या में विवादित भूमि पर अब शीघ्र ही रामलला का भव्य मंदिर के निर्माण की शुरुआत हो सकेगी। इसके साथ ही न्यायालय के निर्देश पर सरकार द्वारा आवंटित की जाने वाली पांच एकड़ जमीन पर एक विशाल मस्जिद के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त हो सकेगा, लेकिन फैैसले के बाद कुछ समय तक देशभर में बना सौहार्द्र का माहौल उन ताकतों को रास नहीं आया , जो इस विवाद में सर्वोच्च न्यायालय में पक्षकार भी नहीं थे। इन्हीं में आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड शामिल है ,जो सर्वोच्च न्यायालय के उक्त फैसले को पुनर्विचार याचिका के द्वारा चुनौती की जिद पर अड़ा रहा। पिछले दिनों लखनऊ में संपन्न बोर्ड की कार्यकारिणी की बैठक में उसने यह फैसला भी किया है कि सर्वोच्च न्यायालय फैसले पर उसके द्वारा पुनर्विचार याचिका दाखिल की जाएगी। गौरतलब है कि मामले के तीन मुख्य पक्षकार इकबाल अंसारी ,सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा पहले यह कह चुके थे कि वे इस फैसले से संतुष्ट हैं और पुनर्विचार याचिका के जरिए इसे चुनौती देने की कोई आवश्यकता नहीं मानते हैं। जाहिर सी बात है कि वे ताकते इस विवाद को ओर लंबा खींचना चाहते हैं, जिससे कि मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त ना हो सके। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने के पीछे बोर्ड की केवल यही मंशा नजर आ रही थी की जिस मामले का पटाक्षेप हो चुका है, उसे फिर अदालत में ले जाकर फिर से लंबा खींचा जा सके। इस से भी बड़े आश्चर्य की बात यह रही कि खुद मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड में इस संबंध में सर्वसम्मति नही बन पा रही थी। बोर्ड ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने के लिए जो आधार गिनाए है वे सही है या नहीं है, पहले तो उन पर पर विचार करने का कोई तुक नहीं है और दूसरा यह है कि जब मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड इस विवाद में अदालत में कोई पक्षकार था ही नहीं है, तब फिर इस फैसले को चुनौती देने का स्वयं में अधिकार हासिल करने के पहले उसे सुन्नी वक्फ बोर्ड और इकबाल अंसारी से सलाह मशवरा करने की जरूरत क्यों नहीं समझी। आखिर इस तथ्य को भी कैसे छोड़ा जा सकता है कि मुस्लिम पर्सनल पर्सनल लॉ बोर्ड देश के मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था नहीं है। इससे केवल उनकी यही मंशा प्रतीत होती है कि जितना संभव हो, मामले को फिर से लंबे समय के लिए कानूनी दांव पेंच में उलझा दिया जाए। जहां तक सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात है तो कानून के दायरे में जो कुछ जायज है, उसे वह करने का अधिकार है, लेकिन बोर्ड के द्वारा यह सब केवल अपना महत्व बढ़ाने के लिए किया जा रहा था, जो देश के अधिकाश मुसलमानों को मंजूर नहीं था। गौरतलब है कि विगत दिनों जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने भी अयोध्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने के मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के फैसले की आलोचना की थी। उन्होंने दो टूक लफ्जों में कहा था कि देश के 95% से अधिक मुसलमान इस फैसले को स्वीकार कर आगे बढ़ना चाहते हैं। मात्र चंद लोग हैं ,जो मंदिर मस्जिद का विवाद बनाए रखना चाहते हैं। मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के फैसले पर से फिर तनाव पैदा हो सकता है। इसलिए बोर्ड को अपना इरादा छोड़ देना चाहिए। वही राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष गयुरुल हसन रिजवी तो यहां तक कह चुके है कि पुनर्विचार याचिका का फैसला मुस्लिम हित मे ही नही है। उन्होंने साफ कहा कि इससे हिंदुओ को लगेगा कि कोर्ट के फैसले के बाद भी मुस्लिम मंदिर निर्माण में बाधा बनना चाह रहे है। इससे हिन्दू मुस्लिम एकता को ही नुकसान होगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विगत दिनों हिंदू और मुस्लिम धर्मावलंबियों की कुछ प्रतिनिधि संस्थाओं के द्वारा यह सुझाव भी दिया जा चुका है कि अयोध्या में मंदिर निर्माण में मुसलमानों और मस्जिद के निर्माण में हिंदुओं को सहयोग देना चाहिए। यह सुझाव निश्चित रूप से स्वागत योग्य है और अगर इस पर अमल किया गया तो इस फैसले के बाद देशभर में बने सौहाद्र के माहौल को और मजबूती प्रदान होगी। अतः अब सवाल आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड एवं उन ताकतों से है कि क्या वह देश में सांप्रदायिक सौहार्द्र एवं आपसी भाईचारे की एक नई मिसाल कायम करने में अपनी ओर से कोई सहयोग देना चाहेंगे।

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