लघुकथा : बोलता मटका

-सिद्धार्थ संचोरी-

एक बार एक कुम्हार एक मटका बना रहा था। तो मटके और कुम्हार के बीच रोज नोंक-झोंक होती रहती थी।  मटका जब भी कुछ बोलता कुम्हार उसे पीटना शूरु करता। एक दिन जब मटका बड़ा हो गया तो उसे कुम्हार अपनी दुकान पर ले गया। अब जब भी ग्राहक उस मटके की और देखते तो कुम्हार उसे दूसरे मटके दिखा देता। इस बात से मटका बहोत नाराज रहता था। कभी कभार नोंक-झोंक  ज्यादा हो जाती तो मटके की और मरम्मत की जाती या ये कहो के ठोक पीट  के सुधारने की कोशिश की जाती। धीरे-धीरे मटके की कीमत बढ़ती गई पर मटका अभी भी बाजार की रौनक के काबिल नहीं ये कुम्हार का कहना था। अब बात यूं हुई कि एक दिन मटके में ये अहम आने लगा के उसकी कीमत दूसरे मटको से बहोत ज्यादा है। अब तो उस मटके की कीमत दूसरे दुकानदार के मटके से भी ज्यादा हो गई। अब मटके की जब भी खातिरदारी होती मटका चुपचाप सह लेता।एक दिन दुकानदार ये सब देख उस मटके  को किसी ग्राहक को दे दिया और वो भी बाजार की सबसे ऊँची कीमत पे। मटका  भी अपने अहम मे था फट से ग्राहक का हो गया और दुकानदार को याद करता, उसकी चोट को याद करके वो उस दुकानदार के पास जा नहीं पाया। पर अपनी जो कीमत उसे मिली और उस मटके को रखने के लिये जो ग्राहक मिला वो भी उसका बहोत ख्याल रखता था। कुछ भी हो उसे उस कुम्हार से कही ज्यादा अच्छा परिवार मिल गया। जिसके आगे आलीशान  गाड़ी खड़ी रहती है और वो घर नहीं जैसे महल हो। ये सब देखकर मटका सोचता है जो भी हो आखिर मुझे मेरी कीमत मेरे गुणों से मिल ही गई। यही पिता और पुत्र का सम्बन्ध होता है। पिता अपने पुत्र की वो कीमत जानता है जो उस पुत्र को पता नहीं होती और पुत्र कभी ये समझ नहीं पाता कि उसके हर सुख के पीछे उस पिता की निस्वार्थ मेहनत है।

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