सौगात (कहानी)

-कंचन-

स्मिता तेज कदमों से चलती हुई स्टेशन की एक खाली बैंच पर बैठ गई। कानपुर वाली ट्रेन आने में अभी 2 घंटे बाकी थे। एक बार उस ने सोचा कि वेटिंगरूम में जा कर थोड़ा सुस्ता ले, पर फिर विचार बदल दिया। आज उस के दिल में जो खुशी का ज्वार फूट रहा था, उस के आगे कोई भी परेशानी माने नहीं रखती थी। स्मिता आज दिनभर की घटनाओं के क्रम और रफ्तार को सोच कर हैरान थी। आज सुबह ही ब्रह्मपुत्र मेल से 8 बज कर 25 मिनट पर कानपुर से इलाहाबाद पहुंची थी। होटल दीप में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इलाहाबाद के प्रसिद्ध व्यवसायी विपिन चंद्र की तरफ से स्मिता को निमंत्रणपत्र भेजा गया था। विपिन चंद्र पेशे से फैक्टरियों के मालिक होते हुए भी दिल से कवि और कलापारखी थे। वे साल में इस प्रकार के कवि सम्मेलन 1-2 बार आयोजित करते थे। ऐसे सम्मेलनों में वे जानेमाने कवियों के साथ उभरते नए कवियों को भी बुलाते थे, ताकि उन की कला को मंच मिल सके और आर्थिक रूप से भी उन की मदद हो सके। हमारे देश में आर्थिक तंगी से तंग हो कर कितनी ही प्रतिभाएं हर रोज दम तोड़ देती हैं। स्मिता सोचने लगी कि यह भी एक तरह का समाज कल्याण कार्य है।

सिविल लाइंस स्थित दीप होटल कुछ खास बड़ा नहीं था, परंतु पुराना और जानामाना अवश्य था। आटो वाले को दीप होटल का पता था इसलिए स्मिता को उस ने मात्र 20 मिनट में ही होटल के बाहर उतार दिया। स्मिता ने होटल में जा कर रिसैप्शनिस्ट को अपना परिचयपत्र और निमंत्रणपत्र दिखाया। रिसैप्शनिस्ट ने उसे लौबी में बैठाया और कहा, मैं अभी मैनेजर साहब को खबर करती हूं। स्मिता ने सोफे पर बैठते हुए सोचा, कवि सम्मेलन के लिए मैं ही शायद सब से पहले आ गई हूं। स्टेशन पर बैठी रहती तो अच्छा था। सम्मेलन शुरू होने में अभी डेढ़ घंटा बाकी है। क्या करूंगी साढ़े 10 बजे तक? स्मिता ने सामने रखी पत्रिकाओं पर निगाह डाली और एक पत्रिका उठाने ही जा रही थी कि पीछे से किसी की आवाज आई, आप को आने में कोई तकलीफ तो नहीं हुई न?

जी, नहीं, कह कर स्मिता ने जैसे ही नजर घुमाई तो देखा सामने प्रणव खड़ा था। कोट पर लगे बिल्ले से पता चला, प्रणव ही मैनेजर था। स्मिता हैरान थी, उस का सहपाठी, प्रेमी प्रणव इस साधारण से होटल में मैनेजर था? कितनी तनख्वाह पाता होगा, 15-20 या 25 हजार? प्रणव तो इतना मेधावी छात्र हुआ करता था, और उस के आईएएस बनने की खबर भी तो आई थी, उस का क्या हुआ?

प्रणव ने स्मिता को पहचान कर कहा, मेहमान कवियों में जब तुम्हारा नाम देखा तो मुझे जरा भी उम्मीद नहीं थी कि स्मिता तुम होगी, तुम तो मलिक थीं न?

हां, तो? 25 साल तक कुंआरी बैठी रहूं और पढ़पढ़ कर बुड्ढी होती रहूं? अरे भई, राम नरेश सहाय से मेरी शादी हुए 23 साल हो गए हैं, स्मिता ने हंसते हुए कहा। अपनी गरिमा और गांभीर्य की चादर को उतार कर स्मिता अचानक पहले वाली कालेज गर्ल बन गई थी।

प्रणव ने कहा, चलो, मेरे केबिन में चल कर बात करते हैं। इतना कह कर प्रणव ने एक कर्मचारी को बुला कर चायनाश्ता मंगवाया और स्मिता के साथ केबिन में चला आया। होटल की तरह प्रणव का केबिन भी कुछ खास बढिया न था। स्मिता और प्रणव दोनों टेबल के दोनों ओर आराम से बैठ गए। स्मिता ने पूछा, तुम बताओ, यहां पर कैसे? मैं ने तो सुना था तुम एक बार टीवी के किसी क्विज शो में गए थे। बाद में सुना तुम्हारा आईएएस में सलैक्शन हो गया है।

प्रणव मुसकरा कर बोला, मेरे बारे में बड़ी खबरें रखती रहीं। कालेज में तो मुझे कभी भाव नहीं दिया।

सही कहा तुम ने, कभी भाव नहीं दिया, पर खबरें रखने में क्या जाता है? स्मिता ने बात को बदल कर पूछा, यह बताओ, तुम ने शादी की? इस होटल में कैसे नौकरी कर रहे हो? शक्ल तो देखो, अपनी उम्र से 10 साल बड़े लग रहे हो। प्रणव ने हंस कर कहा, जब से आई हो प्रश्नों की बौछार कर रही हो। एक बात तो तय है कि तुम्हें मेरी परवा पहले भी थी और अब भी है। हालांकि तुम ने अपने मुंह से कभी कुछ कहा नहीं, पर मुझे तुम्हारी भावनाओं का एहसास है। इतने में नाश्ता आ गया तो जैसे स्मिता को बात बदलने का मौका मिल गया, कहने लगी, अरे वाह, क्या बढिया समोसे हैं। होटल में खाना बढिया बनता है, यह मानना पड़ेगा। प्रणव समझ गया स्मिता पहले की तरह प्यार की बातों को किसी बहाने टालने का प्रयास कर रही थी। वह स्वयं भी समझता  था कि अब स्मिता एक शादीशुदा औरत थी। उस ने कालेज के दिनों में ही प्रणव के प्रणय निवेदन को स्वीकारा नहीं था। स्मिता और प्रणव दोनों चुपचाप नाश्ता करने लगे। दोनों अपनेअपने ढंग से अतीत को देख रहे थे।

कालेज के रंगारंग कार्यक्रम में स्मिता और प्रणव पहली बार मिले थे। दोनों को युगल गान के लिए चुना गया था। प्रणव में संगीतकारों वाली समझ थी। गीत बढिया गाया जाए, उस के लिए यह काफी न था। गीत को विभिन्न वाद्यों के मेल से कैसे सजा कर पेश किया जाए यह उन के लिए माने रखता था। तमाम तैयारियों के बाद जब कार्यक्रम के दौरान प्रणव और स्मिता ने गीत गाया तो उन्हें खूब तालियां मिलीं। कालेज के शिक्षकों ने भी उन की प्रशंसा की। धीरेधीरे उन के सहपाठियों ने उस युगल गान के बहाने उन की युगल जोड़ी बनानी शुरू कर दी। ऐसी बातें सुन प्रणव तो खुश होता था पर स्मिता हंस कर कहती, तुम लोग कहानी बना रहे हो, ऐसा कुछ नहीं है प्रणव ने कई बार स्मिता से इस बारे में बात करनी चाही पर स्मिता कोई न कोई बहाने से टाल जाती। धीरेधीरे प्रणव समझ गया कि स्मिता शायद उसे प्रेमी के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहती थी। इस के बावजूद वह स्मिता का दोस्त बने रहना चाहता था। प्रणव पढ़ाई में अत्यंत प्रखर छात्र था। उस ने स्मिता को अपने नोट्स दिए। पुस्तकालय से किताबें इश्यू करा कर दीं। स्मिता को याद है वह प्रायोगिक परीक्षा का दिन, जब प्रणव ने उस में आत्मबल जगाया था। कालेज के नियम के अनुसार, प्रत्येक परीक्षार्थी को शिक्षक के सामने 2 पर्चियां उठानी होती थीं। उन में किन्हीं 2 प्रयोगों के नाम लिखे होते थे। परीक्षार्थी को उन प्रयोगों में से एक का चुनाव कर शिक्षक को बताना पड़ता था और उसी प्रयोग को प्रयोगशाला में करना पड़ता था। स्मिता ने जिन पर्चियों का चुनाव किया था उन में लिखे दोनों प्रयोग उसे मुश्किल लग रहे थे। आखिरकार उस ने एक प्रयोग चुना और शिक्षक को बताया। स्मिता प्रयोगशाला में प्रयोग करने जा रही थी कि अचानक प्रणव ने आ कर कहा, चेहरे का बल्ब क्यों औफ है? कौन सा प्रैक्टिकल मिला? स्मिता ने धीरे से अपनी पर्ची दिखाई।

अरे, यह तो बहुत आसान है। समय से पहले कर लोगी तुम, घबराना नहीं। उस ने उस प्रयोग के बारे में जरूरी टिप्स दिए और शिक्षकों की नजर बचा कर जल्दी से खिसक गया। उस की इन्हीं छोटीछोटी मदद के कारण स्मिता अच्छे अंकों से पास हो गई। इसी बीच स्मिता के पिता का तबादला हैदराबाद हो गया। प्रणव ने बड़ी मिन्नत कर के स्मिता से मिलने का समय मांगा तो वह मान गई। स्मिता ने अपने भाई को भी उसी समय कालेज से ले जाने का समय दे दिया। प्रणव पुस्तकालय के बाहर स्मिता से मिलते ही बोला, सुना है तुम हैदराबाद जा रही हो?

हां।

यहीं होस्टल में रह जाओ न?

यह संभव नहीं है।

पता है मैं ने हमारे गाने की रिकौर्डिंग अपने घर में मम्मी को सुनाई है। मम्मी को तुम्हारे बारे में भी बताया है। मेरे पेरैंट्स मुझे आईएएस अधिकारी के रूप में देखना चाहते हैं जबकि मैं तो संगीतकार बनना चाहता हूं। जगजीत सिंह-चित्रा सिंह के जैसी हमारी जोड़ी भी क्या खूब जमेगी, है न?स्मिता गंभीरता से बोली, जो वह कई बार अकेले में अभ्यास कर चुकी थी, देखो प्रणव, मैं कोई चलतीफिरती मूर्ति नहीं हूं जो तुम्हारे प्यार को समझ न सकूं। मैं एक रूढिवादी परिवार से हूं। हमारे घर में प्यार शब्द को सिर्फ गाने में इस्तेमाल करने की इजाजत है। प्यार कर घर बसाने की तो मैं सपनों में भी नहीं सोच सकती। तुम एक मेधावी छात्र हो। अपने मांबाप की इच्छा पूरी कर आईएएस अधिकारी बनो, देश की सेवा करो। हर जोड़ी जगजीत सिंह-चित्रा सिंह जैसी कामयाब नहीं बनती है। फिल्म अभिमान की कहानी याद है न? अभिमान में अमिताभ-जया दोनों गायक कलाकार थे। दोनों में प्यार हुआ, शादी हुई। उस के बाद जो दोनों के अहं आपस में टकराए तो बस, कहानी बन गई। स्मिता थोड़ा रुक कर बोली, मुझे उम्मीद है कि तुम्हें मुझ से कई गुणा सुंदर और गुणी जीवनसंगिनी मिलेगी। इतने मे स्मिता के भैया आते दिखाई दिए। स्मिता ने आगे बढ़ कर प्रणव का परिचय भैया से करवाया। उन तीनों में औपचारिकतावश 2-4 बातें हुईं। इस के बाद स्मिता हमेशा के लिए उस कालेज और प्रणव की जिंदगी से चली गई। अतीत के पन्नों से निकल स्मिता ने नजरें उठाईं तो प्रणव को अपनी ओर देखते पाया। स्मिता ने सोचा, प्रणव क्या देख रहा है? कहीं उसे चेहरे की हलकीहलकी झुर्रियां तो दिखाई नहीं दे रहीं? आने से पहले तो मैं फेशियल करवा आई थी।

इतने में प्रणव ने कहा, तुम ने अपने बारे में कुछ नहीं बताया।

हैदराबाद आ कर मैं ने राजनीतिशास्त्र में उस्मानिया विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर यानी एमए की डिगरी हासिल की, स्मिता सहज हो कर बोलने लगी, इस के बाद डेढ़ साल स्कूल में शिक्षिका रही। बस। फिर शादी हो गई। एक बेटा हो गया। बेटा अब बड़ा हो गया है। उसे पढ़ाने की जिम्मेदारी अब मेरी नहीं है, कोचिंग वालों की है। इसलिए अब खाली समय में थोड़ा लिखने का प्रयास करती हूं। कहानी खत्म। यह कह कर स्मिता खिलखिला कर हंस पड़ी। फिर प्रणव से पूछा, तुम यहां कैसे आए, यह तुम ने अब तक नहीं बताया?

प्रणव बोला, क्या करोगी जान कर? हर कहानी रोचक नहीं होती है न।

इसीलिए तो जानना चाहती हूं। यह कहानी रोचक कैसे नहीं बन पाई? प्लीज, अपनी मित्रता की खातिर ही सही, कालेज के बाद की जिंदगी के बारे में बताओ। हो सकता है, शायद मैं तुम्हारे कुछ काम आ सकूं।

मेरे काम? तुम्हारे पतिदेव को बताऊं, स्मिता ऐसा कह रही है? कह कर प्रणव हंसने लगा। स्मिता झेंप गई, फिर बोली, मेरे कहने का मतलब तुम्हारी मदद करना था। तुम्हारी बात पकड़ने की आदत अभी गई नहीं है। प्रणव मुसकरा रहा था। थोड़ी देर बाद उस ने शांतभाव से कहना शुरू किया, तुम्हारे जाने के बाद मैं ने भी राजनीतिशास्त्र में स्नातकोत्तर का कोर्स जौइन किया। प्रथम वर्ष में ही मैं ने आईएएस की प्रारंभिक परीक्षा पास कर ली और मुख्य परीक्षा की तैयारियों में लग गया। जिस दिन मुख्य परीक्षा पास की तो मैं और निश्ंिचत हो गया। सोचा, बस, अब अंतिम सीढ़ी साक्षात्कार रह गई है। साक्षात्कार को अभी कुछ दिन बाकी थे कि मेरे पिताजी अकस्मात हार्टअटैक के कारण चल बसे। मैं ने जोधपुर अपने घर जा कर मां और दीदी को संभाला। जिस दिन साक्षात्कार था, उसी दिन पिताजी का श्राद्ध था। मैं रस्मों और रिश्तेदारों में उलझा हुआ था। यह कहतेकहते प्रणव शांत हो गया। थोड़ी देर बाद यंत्रवत फिर कहने लगा, रिश्तेदारों के जाने के बाद मैं ने प्राइवेट ही स्नातकोत्तर डिगरी हासिल करने के लिए फौर्म भर दिया। साथ ही, घर चलाने के लिए छोटेमोटे काम ढूंढ़ने लगा। कभी दुकान का सेल्समैन तो कभी स्कूल का क्लर्क।

स्मिता व्यथित हो कर बोली, आईएएस की तैयारी बीच में ही छोड़ दी, दोबारा प्रयास कर सकते थे? प्रणव के स्वर में झुंझलाहट सुनाई पड़ी जब वह बोला, अरे मैडम, कविताएं और कहानियां वास्तविक नहीं होती हैं, यह कह कर वह चुप हो गया। स्मिता ने कहना चाहा कि कविता और कहानी सभी यथार्थ से ही प्रेरित होती हैं। तभी तो साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। इस समय स्मिता ने चुप रहना ही बेहतर समझा। थोड़ी देर बाद प्रणव स्वयं ही संयत हो बोला, मेरे बाबूजी अपनी ईमानदारी की कमाई से केवल घर का खर्च चलाते और हमें पढ़ाते थे। उन के जाने के बाद सिर्फ पुश्तैनी मकान रह गया था। दीदी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती और मैं अपनी कमाई से घर और बाहर का काम संभालने लगा। जिंदगी मंथर गति से चल रही थी कि पता चला, मां ब्लड कैंसर से ग्रस्त हैं। शायद हम दोनों भाईबहन के भविष्य की चिंता में ही मां ऐसा रोग लगा बैठी थीं। उन्होंने बीमारी को हम से छिपा कर भी रखा था, पड़ोस की आंटी को पता था। 4 महीने में मां भी हमें छोड़ गईं। प्रणव थोड़ा रुका। स्मिता को उस की आंखों में आंसू दिखे। उस ने भी महसूस किया कि मांबाप का साया सिर से उठ जाए तो कैसी बेचारगी होती है। यों ही बच्चे अनाथ नहीं कहलाते। प्रणव फिर संवेदनशून्य हो कर कहने लगा, अब मेरी दीदी के ब्याह की जिम्मेदारी मेरी थी। पता चला दूल्हे तो शादी के बाजार में भारी दहेज में बिकते थे। कहीं कोई बात बन नहीं रही थी। ऐसे में एक परिवार में बात चली तो लड़के वाले हमारे पुश्तैनी मकान के बदले दीदी को बहू बनाने को तैयार हो गए। मैं अपने ही घर में अपने जीजा और दीदी के सासससुर का नौकर बन कर रह गया। दीदी कुछ कह नहीं पाती थीं क्योंकि वे अपने पति को छोड़ कर भाई पर दोबारा बोझ बनना नहीं चाहती थीं।

जब जीवन असहनीय हो गया तो मैं यहां भाग आया। यहां भी छोटेमोटे काम किए, फिर दीप होटल में काम मिला। अब शादीशुदा हूं 2 बच्चे हैं। कह सकती हो कि जिंदगी कट रही है। स्मिता सोचने लगी, जीवन खुल कर जीना और सिर्फ काटने में अंतर होता है। पैदा होते ही हम मौत की तरफ बढ़ते हुए जिंदगी काटते ही तो हैं। प्रणव की आवाज आई तो स्मिता ध्यान से सुनने लगी। प्रणव कह रहा था, मेरा अनुभव यह कहता है कि जिंदगी अचानक ही घटी घटनाओं का क्रम है। जैसे आज इतने सालों बाद तुम मिली हो, वह भी कवयित्री बन कर। पता है, कभीकभी ऐसा लगता है यदि जिंदगी को फ्लैशबैक में जा कर दोबारा जीने का अवसर मिलता तो शायद मैं अलग ढंग से जीता। प्रणव ज्यादा बोलने की वजह से हांफ रहा था। स्मिता ने सोचा कि कहीं प्रणव हाई ब्लडप्रैशर का रोगी तो नहीं। इस से पहले कि स्मिता कुछ अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती, होटल का एक कर्मचारी आया और प्रणव से बोला, सर, बाहर मेहमान लोग आना शुरू हो गए हैं, उन्हें लौबी में बिठाऊं या कन्वैंशन हौल में?

प्रणव ने घड़ी देख कर कहा, अरे, समय का पता ही नहीं लगा। तुम उन्हें लौबी में ही बिठाओ। पानी सर्व करवाओ, मैं अभी आता हूं। इतना कह कर प्रणव स्मिता से बोला, तुम्हें भी मैं अन्य कवियों के साथ छोड़ देता हूं। मुझे सभागार की व्यवस्था दोबारा चैक करनी है। तुम्हारी कविताएं अवश्य सुनूंगा, पक्का वादा। सम्मेलन के बाद मिलते हैं। प्रणव ने स्मिता को लौबी में छोड़ा और तेजी से सभागार की ओर बढ़ गया। स्मिता अन्य कवियों से नमस्ते, आदाब वगैरह कहने लगी। उन में अशोक चक्रधर की स्मिता बहुत बड़ी प्रशंसक थी। उन से बातचीत कर वह बहुत प्रसन्न हुई। इतने में सभी कविगणों को सभागार में बैठाया गया। इस के बाद विपिन चंद्र, होटल के मालिक, विश्वनाथ के साथ पधारे तो सभी ने उठ कर उन दोनों का अभिवादन किया। विश्वनाथ ने मंच पर जा कर अतिथि कवियों का स्वागत किया और कवि सम्मेलन शुरू करने की घोषणा अपनी एक छोटी सी कविता से की। कवियों में सर्वप्रथम जानेमाने कवि गौरव को बुलाया गया। गौरव मूलतः हास्य कवि हैं जो अपनी छोटीछोटी कविताओं में व्यंग्य के रूप में बड़ीबड़ी बात समझा जाते हैं। उन्होंने आते ही अपनी आत्महत्या की योजना के बारे में व्यंग्यात्मक ढंग की कविता सुनाई। वातावरण पूरा हास्यमय हो गया। इस के बाद दिल्ली के उभरते कवि विनय विनम्र ने नेताओं की देशभक्ति पर एक गीत प्रस्तुत किया तो श्रोताओं ने तालियों से उन का जोरदार समर्थन किया। ऐसे ही कार्यक्रम बढ़ता रहा पर स्मिता का मन कहीं और भटक रहा था। उसे यह खयाल बारबार परेशान कर रहा था कि प्रणव जैसा मेधावी छात्र अपनेआप को समाज में प्रतिष्ठित न कर पाया। मां से बचपन में सुनी कहावत पढ़ोगे, लिखोगे तो बनोगे नवाब… उसे झूठी लग रही थी।

इसी बीच जलपान करने के लिए सभी कवियों और श्रोताओं को पास ही के हौल में बुलाया गया। स्मिता ने देखा कि विश्वनाथ और विपिन चंद्र बैठे बातचीत कर रहे थे। स्मिता ने मन ही मन साहस बटोरा और उन दोनों के पास पहुंच गई। उस ने अभिवादन कर विपिनजी से कहा, सर, मैं आप से थोड़ी देर बात करना चाहती हूं। विपिनजी स्मिता को जानते थे, बोले, हां जी, कहिए, आप को चैक तो मिल गया है न? स्मिता ने मुसकरा कर कहा, जी, वह तो मिल गया है। पर आज मैं आप से इस होटल के मैनेजर प्रणव के बारे में बात करना चाहती हूं। इतना कह कर स्मिता ने कालेज के सब से प्रतिभावान छात्र प्रणव की कहानी संक्षेप में कह डाली। उस ने फिर कहा, आप जैसे कलापारखी शायद प्रणव की प्रतिभा का उचित मूल्य दे सकेंगे। क्या आप उसे अपने व्यवसाय में किसी प्रकार का कार्य दिला सकते हैं? विपिनजी बोले, अरे स्मिताजी, आप के सहपाठी को हम भी अच्छी तरह जानते हैं। दरअसल, अभी विश्वनाथ भी हमें यही बता रहे थे कि आर्थिक तंगियों की वजह से यह होटल बंद होने की कगार पर था कि तभी प्रणव ने जौइन किया। कर्मचारी कम होने की वजह से प्रणव ने हर तरह का काम किया। आज फिर से यह होटल चल पड़ा है। मेरी एक फैक्टरी, जिस में साबुन, शैंपू वगैरह बनते हैं, ऐसे ही हालात से गुजर रही है। ठीक है, देखते हैं, प्रणव वहां भी अपनी जादू की छड़ी घुमा सकता है या नहीं।

स्मिता खुश हो कर बोली, धन्यवाद, सर, मुझे उम्मीद थी कि आप मेरी विनती का मान जरूर रखेंगे। विपिनजी बोले, अरेअरे, इस में धन्यवाद कैसा? भई, हमें भी तो कर्मठ और ईमानदार स्टाफ की जरूरत पड़ती है या नहीं? स्मिता थोड़ा सोच कर बोली, एक और बात है सर, प्रणव को यह मालूम नहीं होना चाहिए कि मैं ने आप से उस की सिफारिश की है। इस से उस के आत्मसम्मान को ठेस लग सकती है। मुझे विश्वास है प्रणव स्वयं ही अपनी काबिलीयत साबित कर पाएगा। आप को निराशा नहीं होगी। अच्छा सर, अब मैं चलती हूं। सब लोग जलपान हौल से वापस आ रहे हैं। इतना कह कर स्मिता तेजी से सभागार की अपनी सीट पर जा बैठी। कवि सम्मेलन जलपान के अल्पविराम के बाद फिर से शुरू हुआ। कई जानेमाने गीतकार भी आए। हमारे फिल्म संगीत की एक विचित्र परंपरा यह है कि गीतकार का गीत चाहे जनजन की जबां पर आ जाए पर उस के पीछे गीतकार को कोई जानता ही नहीं है। कोई जानना चाहता भी नहीं है। गीत के गायक या बहुत हुआ तो संगीतकार, जिस ने धुन बनाई है, पर आ कर बात थम जाती है। फिल्म शोर का गाना इक प्यार का नगमा है, मौजों की रवानी है… इसे गुनगुनाते समय कितने लोग भला उस गीत के गीतकार संतोष आनंद को याद करते होंगे। ऐसे में गीतकारों को अपने गीत कह कर, गा कर सुनाते देख अच्छा लगा। इतने में स्मिता का नाम पुकारा गया तो वह भी साड़ी संभालती हुई, हाथ में कविता की डायरी लिए पहुंच गई। सभी को नमस्कार कर उस ने प्रसिद्ध गीतकार गोपालदास नीरज की कुछ लाइनें पढ़ीं। इस के बाद स्मिता ने उड़ान नामक अपनी कविता, जिस में एक पंछी के माध्यम से जीवन की वास्तविकता और उस से समझौता कर कैसे अपनी उड़ान जारी रखी जा सकती है, का सस्वर पाठ किया। इस के बाद उस ने अपनी मधुमेह रोग पर लिखी हास्य कविता का पाठ किया। उस ने मंच से देखा, प्रणव श्रोताओं में पीछे खड़ा था और उस की कविता सुन कर वाहवाह कहता हुआ तालियां बजा रहा था।

अंत में अशोक चक्रधरजी की सारगर्भित, व्यंग्यात्मक कविताओं का रसास्वादन सभी ने किया। तत्पश्चात विपिन चंद्र ने सभी अतिथियों का धन्यवाद किया व सभा की समाप्ति अपनी कविता के साथ की। सभा समाप्ति के बाद स्मिता ने देखा विपिनजी ने प्रणव को बुलाया। स्मिता उत्सुकतावश वहीं पड़े एक बड़े से टेबल के पीछे छिप गई। उस ने सुना, विपिनजी कह रहे थे, प्रणव, विश्वनाथजी तुम्हारे काम की बड़ी तारीफ कर रहे थे। क्या तुम मेरी फैक्टरी में मैंनेजिंग डायरैक्टर का पद संभालना चाहोगे? 80 हजार प्रति माह वेतन के साथ मकान और गाड़ी भी दी जाएगी। प्रणव को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ। उस ने बड़ी मुश्किल से कहा, ये…ये आप क्या कह रहे हैं? क्या यह सच है? स्मिता ने देखा, विपिनजी और विश्वनाथजी दोनों मुसकरा कर हामी भरते हुए सिर हिला रहे थे। विपिनजी ने कहा, बिलकुल सच कह रहे हैं। विश्वनाथ को जब तक नया मैनेजर नहीं मिल जाता, तुम इन का कार्यभार भी रोज कुछ समय के लिए आ कर संभाल देना। कंप्यूटर पर भी इन का औफिशियल काम कर सकते हो। हां, यदि तुम्हें कोई आपत्ति है तो बता सकते हो।

प्रणव बोला, आपत्ति क्या सर, बस, यही लग रहा है कि ऐसा काम पहले कभी किया नहीं है तो… अब विश्वनाथजी ने उस से कहा, प्रणव, तुम ने हर तरह का काम किया है। यही तुम्हारी काबिलीयत का सुबूत है। आज तुम्हें अच्छा अवसर मिल रहा है। जाओ, खूब मेहनत करो और अपने परिवार को एक अच्छी जिंदगी दो। प्रणव के कानों में अपनी ही कही बातें गूंजने लगीं, जिंदगी अचानक घटी घटनाओं का क्रम है। उस ने भावातिरेक में विपिन व विश्वनाथजी को झुक कर प्रणाम किया। स्मिता ने देखा पास ही एक दरवाजा है, वह बैठेबैठे ही टेबल के पीछे से दरवाजे तक पहुंच गई और एक ही झटके में दरवाजे से निकल पड़ी। इस के बाद लौबी पार कर वह सीधी होटल के बाहर निकल गई। इधर, थोड़ी देर बाद प्रणव स्मिता को ढूंढ़ते हुए रिसैप्शनिस्ट के पास पहुंचा। रिसैप्शनिस्ट ने बताया, स्मिता सहाय, वे मैडम तो अभी 5 मिनट पहले होटल से निकल गई हैं। बहुत जल्दी में लग रही थीं। शायद उन की गाड़ी का समय हो गया होगा।

प्रणव ने स्मिता को याद किया और मुसकरा दिया। सोचा, स्मिता की कन्नी काटने की आदत अभी गई नहीं है। थोड़ी देर रुकती तो बताता कि उस से दोबारा मिलना हसीन यादें ही नहीं दे गया बल्कि उस की जिंदगी में आर्थिक बदलाव की बहुत बड़ी सौगात ले कर आया। प्रणव ने पदोन्नति की  खबर देने के लिए तुरंत घर पर फोन किया और अपनी पत्नी मोना से बातें करने लगा। मन ही मन सोचने लगा, जीवन के सफर में ऐसे खूबसूरत मोड़ आते रहे तो सफर अब आसान हो जाएगा। होटल से बाहर आ कर स्मिता ने एक अजीब हलकापन महसूस किया। उसे विवेकानंद की कही बातें याद आ गईं। उन के अनुसार, जब किसी दूसरे की भलाई के लिए व्यक्ति कुछ काम करता है तो उस में किसी सिंह की तरह अपार शक्ति का संचार हो जाता है। शायद इसी कारण स्वभावतः चुप रहने वाली स्मिता आज मुखर हो पाई थी। उस ने मन ही मन विपिनजी को धन्यवाद दिया। हालांकि सच्चे प्यार में बदला लेना या देना संभव नहीं है। तब भी कालेज में प्रणव से ली गई छोटीछोटी मदद के बदले आज उस का उपकार कर आंतरिक खुशी हुई। मनमयूर जैसे नाच उठा। शायद प्रणव से दोबारा मुलाकात न हो, इस से कोई फर्क भी नहीं पड़ता। जिंदगीभर के लिए आज की यादें उस के तनहा पलों को गुदगुदाने के लिए काफी थीं। स्मिता आंखों में आंसू और होंठों पर मुसकान लिए चलती रही। आखिरकार स्टेशन की बैंच पर बैठ कर दिनभर की घटनाओं को याद करने लगी। उसे लगा प्रणव से उस का प्रेम किसी भी आशा अपेक्षा से परे था। बिलकुल निस्वार्थ, बंधनहीन।

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