व्यंग्य : झगड़झिल्ल जन्मदिन की

-देवेन्द्र कुमार पाठक-

लल्लुओं-पंजुओं की किसी भी बात पर विवाद हो तो कौन सुनता, गुनता या उस पर सर धुनता है, लेकिन विवाद किसी राजनीतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, साहित्यिक, चित्रपट आदि कोटि की हस्ती को लेकर हो, तो बात ही क्या है! एक तो ‘वाद’ से जब से अपनी चीह्न-पहचान हुयी है, तब से विवाद कुछ ज्यादा ही सुखद और रुचिकर लगने लगा है. गयी-गुज़री भूत हो चुकी सदी में ‘वाद’ पर थोड़ा कायदे से पढ़-वढ़ कर, साक्ष्यों के साथ विवाद करनेवालों की खोज-खबर अब इस चालू सदी में कौन कब करता है और करे भी क्यों, जब इस तरह के भूतिया विवादों का कोई लाभ ही नहीं. तुलसी, कबीर, सूर दास आदि पर विवादों के सुदिन अब नहीं रहे; अब तो विवाद उन महापुरुषों से जुड़े हों, जिनकी लँगोटियों को लेकर विवाद करने से कुछ नाम होता और कुछ काम सधता है, तो कुछ रोमांचक सा लगता है. अब किसी भी ‘वाद’ को लें, वह निर्विवाद होने से रहा……. पश्चिम से लेकर पूर्व तक, मार्क्स से लेकर भगतसिंह, लोहिया और नेहरू तक ‘समाजवाद’ इतना विवादित रहा कि अब उसके नामलेवा जो बचे हैं, उन्हें कोई नहीं पूछता.नस्लवाद, नाजीवाद, फासीवाद, गांधीवाद आदि से होते हुये आतंकवाद, नक्सलवाद बहु चर्चित और विवादित हैं, अमरबेल की तरह इनकी जड़ों की तलाश ज़ारी रहती है. इधर मनुवाद, ब्राह्मणवाद, अम्बेडकरवाद, हिंदूवाद, राष्ट्रवाद से होते हुये अब गोडसेवाद अँखुआने लगा है, और सुर्ख़ियों में बना हुआ है.इसकी भी कई किस्में जब-तब देखने और देश की आम जनता को भुगतने को नसीब होती रहती हैं.

अभी-अभी एक नया विवाद हमारे आदरणीय के जन्मदिन को लेकर उभरा, अख़बारों की खबर है. सच तो वोई अख़बार वालों को पता होवेगा. जो भी ही हमको तो ये विवाद रत्ती भर भी न सुहाया. मरे-वरे के जन्म, मृत्यु को लेकर यदि कुछ झगड़झिल्ल हो, तो कुछ स्तरीय सा लगे. अब जो जिन्दा होकर सारी दुनिया में हमारे देश-संस्कृति और इधर की उपलब्धियों के जश -कीर्ति का झंडा फहराय रहे हैं, उनके जन्मदिन को लेकर विवाद कछु अच्छी बात न लगी हमें. बड़े लोगन की बड़ी बातें. साल में दो क्या, चार बार मनाएं जन्मदिन! किसी को काहे पिराय रहा है……. किसी ने अपना जन्मदिन देश के बाल-गोपालन के नाम कर दिया, किसी ने मास्टर नाम के प्राणी के नाम.अब मास्टर लोग अपने सम्मान के प्रमाण जुटाते हैं…..

अब हम आप लोगन से अपनई बताये देत हैं. हमारे भी दुई ठो की काय कहें, तीन ठो जन्मदिन हैं.हमारी माँ हमारी वरसगांठ हिंदी के महीना और तिथि के हिसाब से मानती-मनाती रहीं. हलछठ को यानी भादों माह के कृष्णपक्ष की षष्ठी, बलराम-जयंती को….. हम जब लेखक-कवि होने-कहलाने के मुग़ालते में पड़े, तो शहर में हलछठ को कोई कवि-लेखक हमारी जन्म वर्षगाँठ मनाने हमारे बुलौआ पर भी नहीं आये.कारण, सब कवि- लेखक बाल-बच्चेदार जो होते ठहरे. सबै के लरिका कै महतारी जो हलछठ को व्रत-उपास बेटा के खातिर रहती हैं.अब कौनो लेखक की मजाल है, लुगाई के व्रत-उपास के दिन, वह भी पराओ धन बिटिया नहीं कुलदीपक, वंशबीज बेटवा के नाम का व्रत ! लुगाई से सबै कोई डरै . लेखक तो अउर जियादा. अच्छे-अच्छे नामवरों की सद्गति लुगाइयों के डर और हड़क से हुयी है…… हम खुद भी डरत हंय. अब जिनकी लुगाई नहीं है, उन खुशनसीब रड़वों की क्या कहें पर जिनकी बाकायदा बियाह कर के आई है,   वो भी मारे डर के भाग खड़े हुये. वोई अपने दुबे बाबा ! अरे हाँ, वोई तुलसीदास के बारे में सुने होंगे. हाँ, वे भी रत्नावली के आर्डर से रामकथा लिखबे को बाध्य हुये.रत्नावली स्वयं कविताई करत रहीं. एक से एक दोहा उनने लिखे. पाठक कुल की बिटिया जो रहीं न………

हाँ, तो जब हमारी हलछठ वाली वर्षगाँठ पर कोई नहीं आया, तो हमने हिंदीमाता को छोड़ अंग्रेजी आंटी की छाँव गही. हफ्ता दस बारह दिन के हेर-फेर से अंग्रेजी में सत्ताईस अगस्त को हम अपना बर्थडे सेलिब्रेट करने लगे. हम हिंदी वालों का यह आम चरित्र है, जब हिंदी से काम न बने, तो अंग्रेजी की राह पकड़ लेते हैं. वैसे मेरा तीसरा जन्मदिन भी है.स्कूल वाला.हमारे गुरुजी लोगन भी अपनी सुविधा से सराहनीय काम करते हैं. हमारे वक़्त में ज्यादातर बच्चों को जुलाई में ही जन्मा मान कर दाखिले में जन्मतिथि लिख दिया करते थे. ये अब की बात नहीं है. भूत सदी की बात है. अब तो अस्पताल, पंचायत, नगरनिगम एक ही जन्मदिन का प्रमाणपत्र देकर विवाद होने ही नहीं देते. होना भी नहीं चाहिये.

अतः कोई के यदि दो-चार जन्मदिन हैं, तो विवाद काहे करते हो भाई. आप भी मनाया करो. उन्हें भी मनाने दो. अख़बार-चैनल वालों को अयस्क मिलता रहता है. कुछेक दशक बाद एक से अधिक जन्मतिथि के विवाद की गुंजाईश ही न रहेगी. अब सबके जन्मप्रमाणपत्र बनने लगे हैं.

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