व्यंग्य : चाटुकारिता के खुले समर्थन में ही सबका भला है!

-विवेक रंजन श्रीवास्तव-

प्रशंसा और चाटुकारिता में बड़ा बारीक अंतर होता है। प्रशंसा व्यक्ति के काम की होती है, और चाटुकारिता काम के व्यक्ति की होती है। जिन्हें काम के आदमी को कायदे से मक्खन लगाना आता हो उनकी हर जगह हमेशा से पूछ परख होती रही है। ऐसे लोग राजनीति में, सरकारी दफ्तरों में अफसरों के बीच लाइजनिंग का काम बड़ी सफलता से करते हैं। पुराने समय में राजाओं की चाटुकारिता में काव्य कहे जाते थे, चारण साहित्य आज भी उपलब्ध है जो और कुछ न सही किंचित इतिहास अवश्य बताता है। सफलता का मूलमंत्र तो परिश्रम और हुनर ही है किन्तु चापलूसी त्वरित सफलता पाने के शार्टकट के रूप में सुस्थापित कला है। दरअसल आत्म प्रशंसा हर किसी को पसंद होती है। कुशल चाटुकार, व्यक्ति की इसी कमजोरी की सीढी पर चढ़कर वांछित सिद्धि प्राप्त करते हैं।

बड़े बाबू हमारे कार्यालय के सुप्रसिद्ध चापलूस हैं। सच तो यह है कि बाबू से बड़े बाबू बनने की उनकी उपलब्धि ही प्रबंधक महोदय की चापलूसी का प्रतिफल है। चापलूसी में बड़े बाबू को परम आनंद आता है। इसके लिये वे साहब के इर्द गिर्द अतिरिक्त समय, श्रम, तथा अपनी संपूर्ण योग्यता का एकजाई निवेश करते हैं, पर अपने इन्ही गुणो के बल वे साहब के निकट होने का वातावरण बना पाने में सफल रहते हैं। हाल ही जब प्रबंधक महोदय का स्थानांतरण हुआ और नये साहब के आने से पहले ही उनके विषय में यह खबर आ गई कि वे कतई चापलूसी पसंद नही करते तो बड़े बाबू के सहकर्मियो को मन ही मन बड़ी प्रसन्नता हुई, नये साहब के ज्वाईन करते ही सब बड़े बाबू को बारीकी से आबजर्व करने लगे। लेकिन वह चापलूस ही क्या जो चापलूसी से बाज आ जाये। बड़े बाबू ने नये साहब से पहली ही मुलाकात में कहा ” सर, हमने आपकी तमाम उपलब्धियो के विषय में सुना है, पर मुझे आपकी सबसे अच्छी बात यह लगती है कि आपको चाटुकारिता बिल्कुल पसंद नही है “। इस डायलाग ने नये साहब पर पूरा असर किया और बड़े बाबू साहब को बड़े पसंद आ गये। बड़े बाबू का बंगले और दफ्तर का ओवरटाईम चल निकला। बड़े बाबू नये साहब के सामने खुद को जिम्मेदार,परिपक्व और कुशल होने के अहसास करवाने में प्राण पन से पूरी चाटुकारिता के साथ जुट गये।

बदलते जमाने के साथ साथ चाटुकारिता के फार्मूले भी बदल रहे हैं। साहब के बच्चो को चाकलेट दिलवाना, या मैडम को शापिंग पर ले जाना पुरानी बातें हो गई हैं, आजकल समझदार साहब लोग पत्नी बच्चो को मातहतो के ऐसे व्यवहार से बचने की ताकीद करने लगे हैं। चाटुकारिता के नये टूल्स के अंतर्गत सुबह दोपहर रात व्हाट्सअप पर गुडमार्निंग से गुडनाईट सर तक के मैसेज करना, साहब की संभावित आवश्यकता के प्रति उनसे पहले जागरुख रहना,साहब को स्वयं के कंपटीशन के अन्य छोटे बड़े चाटुकारो से आगाह करना, साहब के कार्यालय प्रवेश पर कमरे का पर्दा उठाने से लेकर साहब के कार्यालय छोड़ने तक पोर्च में कार लगवाने जैसे कार्य चाटुकारिता संस्कृति के आवश्यक अवयव हैं।

लोकतंत्र ने चाटुकारिता को नये आयाम दिये हैं। पहले सामान्यतः चापलूसी अफसरो के इर्द गिर्द ही पाई जाती थी पर अब नेता जी के आस पास राजनैतिक चाटुकारो का बड़ा जमावड़ा होता है। शाश्वत तथ्य यह है कि जहां भी पावर होगी वहां चाटुकारिता के फलने फूलने की संभावनायें बेहतर होंगी। हमें चाटुकारिता का समर्थन करना चाहिये क्योकि यह अनजान लोगो को पास लाती है, चाटुकार की क्षमताओ का विस्तार करती है, पावर फुल व्यक्ति की राह आसान बनाती है। यदि आप आदर्शवादी हैं और इस मुगालते में हों कि आपको चाटुकारिता पसंद नही है। आपको भ्रम हो कि आप किसी की चाटुकारिता नही करते हैं तो मैं स्पष्ट कर दूं कि हर विवाहित पुरुष और कुछ हो न हो उसे सुखद दामपत्य के लिये अपनी पत्नी का सबसे बड़ा चाटुकार बनना ही पड़ता है। अतः चाटुकारिता, चापलूसी, खुशामद के खुले समर्थन में ही सबका भला है। स्तरीय चाटुकार बने, प्रसन्न रहें और परिवेश में प्रसन्नता फैलाने में जुट जावें।

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