व्यंग्य : चंदा रे चंदा

-प्रभात गोस्वामी-

आज रेडियो पर वर्ष 1971 की फिल्म- ‘लाखों में एक’ का गीत ‘चंदा ओ चंदा, किसने चुराई तेर -मेरी निंदिया’, सुन रहा था कि अचानक हमारे एक मित्र छम्मन जी, आ टपके. राजनीति के अखाड़े में एक ‘नवजात पार्टी’ के साथ जुड़कर छम्मन अपना भविष्य तलाश रहे हैं. बोले- भाई साहब क्या गाना है ? चुनाव आते ही हम सभी -जनप्रतिनिधियों की नींद इस ‘चंदा’ ने ही उड़ा रखी है. वो गुनगुनाने लगे ‘-तेरी और मेरी, एक कहानी/हम दोनों की कदर किसी ने ना जानी’. आजकल छोटी पार्टियों के कार्यकर्ताओं और चंदा लेने वाले की क़दर कौन करता है? अभी महाराष्ट्र, हरियाणा में पूरे व देश के विभिन्न हिस्सों में उप चुनावों की बिसात बिछी हुई है. मुआ ये चंदा भी क्या चीज़ है, हमारे जीवन का सबसे पुराना और विश्वास पात्र मित्र बनकर जीवन की डोलती नैया को पार लगाता है. हमारे देश में तो ‘चंदा’ हमारे मामा-सा प्यारा बना हुआ है. हमारी ‘मां’, तो राजनीति ही है और मां की देखभाल के लिए पैसा भी तो चाहिए. ये चंदा आखिर तो मां का भाई जो है. अब मामा को तो पटा के रखना ही पड़ता है. शादी में मायारा ले कर तो प्यारे मामा ही तो आते हैं. सो, मामा की चम्पी भी ज़रूरी होती है. बचपन में मामा ही तो हमें मेला दिखाने ले जाते थे. हमारी बेबस हालत को देख कर भी उनको दया नहीं आई. आगे बोले-भाई, आजकल तो हर बात पर ‘चंदा’ मामा को याद करना ही पड़ता है.’ चंदा’ मामा आदमी के जीवन को बनाने से लेकर पार्टी को सँवारने, बनाने तक में मदद जो करता है. चंदा मामा को हम अलग -अलग रूप में लेते हैं. कोई अपनी काली कमाई को ‘चंदा’ बनाकर आकाश में बड़ी शान से उड़ाता है तो कोई ग़रीबों, सूखा और बाढ़ पीड़ितों की मदद के नाम पर चंदा ले आता है. हम भी चंदा के दीवाने हैं. उसकी खूबसूरती के कायल हैं. कई -कई बार चंदा मांगने में दिन और साल निकल जाते हैं पर आखिर में ले कर ही मानते हैं. राजनीतिक के क्षेत्र के आलावा भी कभी हम स्कूल के गरीब बच्चों को भर पेट भोजन खिलाने तो कभी पूस की ठंडी रात में ठिठुरते गरीबों को कम्बल बांटने के लिए चंदा लेते हैं. कभी आग से घर नष्ट होने पर तो कभी बीमारी,कुपोषण के नाम पर चंदा लेते हैं. कभी मंदिर में पूजा तो कभी लंगर के नाम पर चंदा लेते हैं. भैया, ये चंदा मांगना भी एक कला है. हर कोई चंदा इकठ्ठा नहीं कर सकता. इसके लिए भी प्रशिक्षण की ज़रूरत होती है. आपमें गुलज़ार या आनन्द बक्षी जैसा गीत रचने और लक्ष्मी कान्त -प्यारे लाल, शंकर -जय किशन जैसा संगीतकार बनने की क्षमता होनी चाहिए. चंदा मांगने में गीत-संगीत का सदा महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है. चंदा मांगने के लिए सलीम -जावेद जैसे डायलोग लिखने की प्रतिभा भी ज़रूरी है. चंदा प्राप्त करने के लिए फिल्म जगत की सुप्रसिद्ध ‘मां’, निरुपा राय की तरह मौका पड़ने पर आँखों में आंसू भी लाने पड़ते हैं. इसके लिए जुमले गढ़ने और-लीचड़पन की कला भी चंदा मांगने वाले को आनी चाहिए. चंदा लेने वाले को लम्बा इंतजार करने की क्षमता भी बढानी पड़ती है. क्योंकि चंदा देने के लिए आम आदमी, उद्योगपति, दानदाता आपकी सभी क्षमताओं की कड़ी परीक्षा लेते हैं. तब जा कर चंदा मिलता है. धरती पर ‘चंदा’ पाने का-रास्ता भी आसमान के चंदा तक पहुँचने जैसा लम्बा और कठिन है. इसके लिए जप और तप की भी ज़रूरत होती है. कभी -कभी योगी भी बनना पड़ता है. अब मेरे सब्र का बांध टूटने वाला था. अपनी मित्र की ओर जब मैंने घूर कर गुस्से से देखा तो वो समझ गया. फिर क्या था, वो-चंदा रे चंदा, किसने चुराई तेरी-मेरी निंदिया गाना गुनगुनाते हुए चल दिया.

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