व्यंग्य : फर्जी है सब फर्जी है, देखो भई मनमर्जी है

अगर फर्जी को फर्ज समझ लिया जाए और दुनियावालों पर एक कर्ज समझ लिया जाए तो बताइए हर्ज क्या है। कुछ सिरफिरों का कहना है कि दुनिया क्रांति से बेहतर होगी। अरे भइया, जब फर्जी से ही काम चल सकता है तो फिर क्रांति की क्या जरूरत है। मसलन, देखिए सबके लिए शिक्षा नहीं होगी, सबके लिए रोजगार नहीं होगा तो क्या? सबके लिए डिग्रियां तो होंगी। बल्कि सरकार चाहे तो देश की समृद्धि भी फर्जी ही दिखा दे। एक जरा सी कोशिश से अगर हमारे सुपर पावर बनने का रास्ता खुलता है तो सौदा बुरा नहीं है। और जनाब विकास के क्या फर्जी आंकड़े होते नहीं? जब फर्जी देशभक्ति हो सकती है तो फर्जी समृद्धि क्यों नहीं हो सकती? वैसे भी अगर फर्जी डिग्री न हो तो कोई मुन्नाभाई नहीं बन सकता, एक टपोरी दुनिया वालों का लाड़ला नहीं बन सकता। बल्कि फिल्म दर्शकों का लाड़ला होने के लिए तो हीरो का टपोरी होना आवश्यक योग्यता होती है। इसमें फर्जीपन का छौंक लग जाए तो सोने में सुहागा हो जाता है। अगर मुन्ना भाई की डिग्री फर्जी न होती तो मेडिकल एजुकेशन को नयी राह कौन दिखाता और जादू की झप्पी का कमाल दुनिया को कौन बताता? अगर वह फर्जी प्रोफेसर न बनता तो बताइए आज के जमाने में गांधीजी की प्रासंगिकता कैसे स्थापित होती? पर मामला सिर्फ फर्जी डिग्रियों का ही नहीं है। हमारे यहां फर्जी मुठभेड़ें भी फेमस रही हैं। फर्जी मुठभेड़ों में पुलिस ने ही वाहवाही नहीं लूटी, नेताओं ने भी काफी नाम कमाया है। पर सिर्फ डिग्रियां और मुठभेड़ें ही फर्जी नहीं होतीं साहब। यहां तो जिधर नजर डालो, सब फर्जी नजर आता है। अब आप ही बताइए, हमारे बाबाओं में कौन ज्यादा हैं-फर्जी या जेनुइन। बल्कि कई फर्जी बाबा तो भगवान तक बन जाते हैं। फर्जी डॉक्टर, फर्जी वकील का मूल तो मान लिया कि फर्जी डिग्रियां ही हैं। पर यहां तो कर्मचारी तक फर्जी होते हैं। दिल्ली में ही न जाने कितने घोस्ट कर्मचारी पाए गए। पुलिस मुकदमे तक फर्जी बना देती है। गवाह तो फर्जी होते ही हैं-यह सर्वज्ञात है। तो साहब, यहां फर्ज कम है, फर्जी ज्यादा हैं। रिश्ते फर्जी, प्यार-मोहब्बत फर्जी, जमीन-जायदाद फर्जी, दावे फर्जी,वादे फर्जी। फर्जीपन समझ लो एक तरह का हिट होने का नुस्खा है। इससे सिर्फ मुन्नाभाई श्रंखला की फिल्म ही हिट होती, नयी राजनीति का टोटका भी हिट हो जाता है। कहां तो यही लोग कहते थे कि नेता लोग अनपढ़ होते हैं। अब डिग्रियां दिखा रहे हैं तो इस पर भी ऐतराज है। अरे भइया अनपढ़ होने से तो अच्छा ही है ना। डिग्री तो है ना। भले फर्जी है। और जैसे फर्जी डिग्रियों के बिना नेता मंत्री पद नहीं पा सकता, वैसे ही अगर फर्जी मुठभेड़े न हों तो अफसर होईप्रोफाइल नहीं बनता। चर्चा में नहीं रहता। जनाब हालत यह है कि ढंग की पोस्टिंग तक के लिए फर्जी मुठभेड़ जरूरी है, प्रमोशन की तो बात छोड़िए। सच पूछो तो फर्जी मुठभेड़ें ना हो तो स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर हर कोई देशभक्ति का इनाम पाने के लिए हाथ बढ़ा दे। न कोई तस्कर मरे और न आंतकवादी। बिना फर्जी मुठभेड़ के बहादुरी का तमगा तक नहीं मिलता। यूं कई बार जेल भी मिलती है पर यूं तो किसी को देना पड़े न पड़े, जितेंद्र तोमर को इस्तीफा भी देना पड़ता है। अपवाद तो नियमों को साबित करने के लिए ही होते हैं ना। तो जैसे फर्जीपन के बिना जिंदगी अधूरी है, वैसे ही फर्जीपने के बिना देश अधूरा सा, पिछड़ा सा लगेगा और इस चरण में देश के पिछड़ेपन का जोखिम हम नहीं ले सकते। और फर्जीपन के बिना राजनीति तो सचमुच अधूरी सी हो जाएगी। कहते हैं कि दिल्ली में ही कोई बीसियों विधायक फर्जी डिग्रीवाले हैं। आप ही बताइए कि कथित फर्जी डिग्री न होती तो ये सीन हो पाता जो आज नजर आ रहा है।

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