सावधान : पैकेज्ड दूध के नाम पर मिल रहा है जहर,कैंसर व मस्तिष्क रोगों का बढ़ता है खतरा ।

भारतीय खाद्य नियामक व खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई ) ने देशभर में सर्वे के आधार पर यह चौंकाने वाला खुलासा तथ्यों के साथ किया है। भारत की कई प्रमुख ब्रांड के पैकेज्ड दूध यानि प्रोसेस्ड मिल्क और कच्चे दूध के नमूने निर्धारित गुणवत्ता और तय मानकों पर फेल हुए है ।

पैकेज्ड दूध के 10.4 फीसदी नमूने सुरक्षा मानकों पर फेल हुआ , जो की कच्चे दूध से 4.8 फीसदी की तुलना में काफी अधिक हैं। इनमें एफ्लाटॉक्सिन- एम 1, एंटीबायोटिक व कीटनाशक जैसे जहरीले पदार्थ मिले हैं। पैकेज्ड दूध में एफ्लाटॉक्सिन नमक केमिकल काफी अधिक मात्रा में मिला है जो खतरनाक है । एफ्लाटॉक्सिन का प्रयोग पशु आहार में किया जाता है।

कई प्रमुख ब्रांड के पैकेज्ड दूध यानि प्रोसेस्ड मिल्क और कच्चे दूध के नमूने निर्धारित गुणवत्ता और तय मानकों परफेल हुए है। जो खाद्य नियामक भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। कच्चे दूध के 3,825 नमूनों में से 47 फीसदी मानकों के मुताबिक नहीं थे। सुरक्षा मानकों की बात करें तो प्रोसेस्ड दूध के 10.4 फीसदी नमूने फेल रहे, जो कच्चे दूध (4.8 फीसदी) की तुलना में काफी अधिक है।

हालांकि कुल नमूनों में केवल 12 में ही मिलावट पाई गई, जिनमें से ज्यादातर तेलंगाना के थे। दूध में मिलावट ज्यादा समस्या से अधिक बड़ी गंभीर समस्या दूध का दूषित होना है और उससे खतरनाक बीमारी कैंसर व मस्तिष्क रोगों का बढ़ता खतरा है । पैकेज्ड दूध के 2607 नमूनों में से 37.7 फीसदी नमूनों में फैट, एसएनएफ, माल्टोडेक्सट्रिन और शुगर की मात्रा तय सीमा से ज्यादा मिली। विशेषज्ञों के मुताबिक पशु आहार में एफ्लाटॉक्सिन का लंबे समय से इस्तेमाल हो रहा है, जो कि

एफएसएसएआई ने नवंबर 2018 में राष्ट्रीय दुग्ध सर्वे 2018 की अंतरिम रिपोर्ट जारी की थी। इसमें मिलावटी दूध को लेकर कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए थे। शुक्रवार को एफएसएसएआई ने राष्ट्रीय दुग्ध सर्वे 2018 की अंतिम रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को भी सौंप दिया गया है। मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि रिपोर्ट के आधार पर मिलावटी दूध को रोकने के लिए जल्द ही कड़े कदम उठाए जाएंगे।

सोचने वाली बात है की सबसे अधिक दिल्ली में 60 से 65 फीसदी पैकेट दूध का इस्तेमाल होता है। बाहरी दिल्ली को छोड़ दें तो मध्य दिल्ली में करीब 95 फीसदी तक पैकेट दूध का ही इस्तेमाल होता है। दिल्ली के 262 नमूने लिए गए थे। इनमें 194 प्रोसेस्ड और 68 त्वरित दूध के नमूने थे। 262 में से 38 नमूनों की जांच में एफ्लाटॉक्सिन एम1 मिला। इन 38 में से सर्वाधिक 36 नमूने प्रोसेस्ड यानी पैकेट दूध के शामिल हैं। केवल 2 नमूने ऐसे थे, जो कि पशुओं से निकाले गए त्वरित दूध में मिले थे। ठीक इसी तरह चार नमूनों में एंटीबायोटिक्स मिला है।

एम्स के डॉक्टरों का कहना है कि इस रिपोर्ट के आधार पर सरकार को जल्द से जल्द सख्त फैसला लेना चाहिए। देश का हर परिवार इससे जुड़ा है। सरकार को ऐसे रसायनों के पशु आहार में इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। एफ्लाटॉक्सिन एम1 रसायन से कैंसर व मस्तिष्क रोगों का खतरा बढ़ता है। यह इंसानों के लिवर पर दुष्प्रभाव डाल सकता है। बच्चों के लिए ज्यादा हानिकारक है, क्योंकि उनके शारीरिक विकास को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकता है।

एफएसएसएआई ने मई से अक्तूबर 2018 के बीच 1,103 शहरों से 6,432 नमूने लिए थे। इनमें सबसे ज्यादा 227 पैकेट वाले दूध के सैंपल हैं। तमिलनाडु, दिल्ली, केरल, पंजाब, यूपी, महाराष्ट्र और ओडिशा से लिए सैंपल में ये घातक रसायन मिला है।

एंटीबॉयोटिक्स दवाओं की बात करें तो मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, आंध्रप्रदेश और गुजरात के सैंपल में इनकी मौजूदगी मिली। इनमें 3825 (59.5 फीसदी) कच्चे दूध और 2607 (40.5 फीसदी) प्रोसेस्ड दूध के हैं। जांच में 5976 नमूने (93 फीसदी) सुरक्षित मिले, जबकि 456 (7.1 फीसदी) नमूनों में कई तरह की मिलावट मिली। इनमें से 368 नमूने (5.7 फीसदी) एफ्लाटॉक्सिन एम-1 नामक रसायन मिला। दो में यूरिया, तीन में डिटर्जेंट पाउडर, छह में हाइड्रोजन ऑक्साइड और एक में न्यूट्रलाइजर के तत्व मिले हैं।

तामिलनाडु, दिल्ली, केरल, पंजाब, यूपी, महाराष्ट्र और उड़ीसा के लिए सैंपल में एफ्लाटॉक्सिन मिला है। मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र, यूपी, आंध्रप्रदेश और गुजरात के सैंपलों में एंटीबायोटिक अधिक मिले हैं।

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