कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा होने के कारण हमारे लिए भावनात्मक मुद्दा भी हैः डाॅ.पाठक

गोपेश्वर : कश्मीर पाकिस्तान के लिए राजनीतिक अस्तित्व तो चीन के लिए वर्चस्व का मुद्दा है लेकिन भारत का अभिन्न हिस्सा होने के कारण यह भारत के लिए भावनात्मक मुद्दा है। यह बात श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय परिसर, गोपेश्वर और जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र, नई दिल्ली की ओर से संयुक्त रूप से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार के दूसरे दिन गुरुवार को मुख्य वक्ता डॉ शिव पूजन पाठक ने कही।
डाॅ. पाठक ने कहा कि पाक अधिकृत एवं चीन अधिकृत भूमि को वापस लाने के लिए भारत को न सिर्फ राजनीतिक दृढ़ता दिखानी चाहिए बल्कि सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करते हुए वैश्विक स्तर पर जनमत संग्रह कराना चाहिए। द्वितीय सत्र के मुख्य अतिथि चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय  मेरठ के कुलपति प्रो. एनके तनेजा ने कहा कि कश्मीरी जनता को भारतीय शासन एवं कानून व्यवस्था पर पूर्ण विश्वास है लेकिन अलगाववादी शक्तियों ने कश्मीर की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल किया है। ब्रिगेडियर रवि गुप्ता ने कहा कि चीन अपने व्यावसायिक हितों को साधने के लिए पाकिस्तान को भारत के खिलाफ उकसाता है, इसलिए चीन के उत्पादों का जनता की ओर से विरोध करना चीन की आर्थिक कमर तोड़ने का काम कर सकता है।
प्रो. गोविंद सिंह बिष्ट ने कहा कि कश्मीर भारत की सांस्कृतिक राजधानी रही है लेकिन यह लंबे समय से केंद्रीय हुक्मरानों की उपेक्षा का शिकार रहा है। कश्मीर से कश्मीरी पंडितों के पलायन के साथ-साथ वहां से पत्रकारों का भी पलायन हुआ। इस कारण जम्मू-कश्मीर की वास्तविक स्थिति का पता देश की बाकी जनता को नहीं मिल पाया। वहां पर पाकिस्तान की ओर से प्रायोजित फेक न्यूज़ का प्रसारण किया जाता है, जिससे खासतौर पर युवा पीढ़ी में भारत के खिलाफ घृणा पैदा की जाती है। इसलिए आवश्यकता है कि जम्मू और कश्मीर में भारत की तरह बेहतरीन संचार सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और वहां पर राष्ट्रीय मीडिया को स्थापित किया जाए ताकि शेष भारत सहित दुनिया में कश्मीर के बारे में वहां के लोगों की भावनाओं को सही तरीके से पहुंचाया जा सके।
जम्मू कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ डॉ. निधि बहुगुणा ने कहा कि चीन ने न सिर्फ भारत के खिलाफ पाकिस्तान को उकसाने का काम किया है, बल्कि चीन ने हमारी भूमि के साथ साथ सामरिक और धार्मिक पर्यटन की महत्वपूर्ण स्थल जैसे कैलाश मानसरोवर को कब्जा कर भी हमारे आर्थिक गतिविधियों को बाधा पहुंचाने का काम किया है। उत्तराखंड क्षेत्रीय बौद्धिक प्रकोष्ठ प्रभारी श्री सुशील भाई साहब ने कहा कि जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 एवं 35ए को खत्म किए जाने से जम्मू कश्मीर में एक बेहतरीन शासन एवं निर्भय सामाजिक जीवन की शुरुआत हो चुकी है और भारतीय नागरिकों को जम्मू कश्मीर में निरंतर भ्रमण कर वहां के लोगों के साथ भावनात्मक संबंध स्थापित करने चाहिए।
वेबिनार के निदेशक प्राचार्य प्रो. आरके गुप्ता ने पिछले दो दिनों की रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि कश्मीर में आर्थिक पूंजी के निवेश के साथ-साथ सामाजिक पूंजी का निवेश किया जाना भी आवश्यक है, जिससे वहां की युवा पीढ़ी में भारतीय संस्कृति परंपराएं एवं संस्कारों का बीजारोपण किया जा सके और वह भावनात्मक रूप से भारत के साथ जुड़ सके।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र के उत्तराखंड प्रभारी बलदेव पाराशर ने कहा कि इस तरह की संगोष्ठी जम्मू कश्मीर को लेकर लोगों की विभिन्न नकारात्मक धारणाओं को तोड़ने का काम करेगी।  इस अवसर पर  आयोजक सचिव डॉ. जगमोहन सिंह नेगी, अजय शर्मा, प्रो. विशाल शर्मा, डॉ..सूरज कुमार पारचा, डॉ. सूर्यभान सिंह, डॉ. हेमलता नौटियाल, मीडिया कोऑर्डिनेटर डॉ. दर्शन सिंह नेगी आदि मौजूद थे। 

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