व्यंग्य : रूसी भाषा में शपथ लूं, तो चलेगा?

-अशोक मिश्र-

बंगाल में बड़े भाई को कहा जाता है दादा। ऐसा मैंने सुना है। उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में दादा पिताजी के बड़े भाई को कहते हैं। बड़े भाई के लिए शब्द दद्दा प्रचलित है। समय, काल और परिस्थितियों के हिसाब से शब्दों के अर्थ बदलते रहते हैं। आज दादा का मतलब क्या है, यह समझाने की नहीं, समझने बात है। वैसे अब दादा का समानार्थी कहिए, पर्यायवाची कहिए, नेताजी हो गया है। मेरे गांव नथईपुरवा में रहते हैं मुसद्दी लाल। पहले वे दो-चार चेले-चपाटों के बल पर दादा बने, फिर नेता बन गए। कुछ रुतबा और ओहदा बढ़ा, तो ग्राम पंचायती का चुनाव लड़ गए। अपने चेले-चपाटों की दबंगई और मतदाताओं की कायरता की कृपा से वे जीत भी गए। वे जब भी मुझसे मिलते हैं, तो विनम्रता की साक्षात प्रतिमूर्ति बन जाते हैं। जिस दिन ग्राम पंचायत चुनाव का परिणाम निकला, तो उनके समर्थकों ने हवा में ही दनादन सौ-पांच सौ फायरिंग की और उन्हें कंधे पर उठा लिया। इससे पहले वे फूल-मालाओं से लादे जा चुके थे।

यह जुलूस जब गांव की सीमा में घुसा, तो संयोग से मैं अपने घर के बाहर बैठा गन्ना चूस रहा था। मुझे देखते ही मुसद्दी लाल अपने चेले-चपाटों के कंधे से कूद पड़े और लपककर साक्षात दंडवत प्रणाम किया। बोले, दादा..आप आशीर्वाद दीजिए, हम ग्राम पंचायत का चुनाव जीत गए हैं। यह बताइए, चुनाव जीतने के बाद शपथ-वपथ भी लेना पड़ेगा क्या? मैंने फौरन से पेशतर जवाब दिया, हां..शपथ तो लेना ही होगा।

मुसद्दी लाल ने पूछा, हिंदी में लेना होगा या अंग्रेजी में? मैंने कहा, नहीं जिस भाषा में आप चाहें..। वे मेरी बात सुनकर मुस्कुराए, रूसी भाषा में शपथ ले सकता हूं? मैंने कहा, हां ले सकते हो? लेकिन रूसी भाषा तुम्हें आती कहा हैं? मुसद्दी लाल ने कान खुजाते हुए कहा, अरे… मुझे नहीं आती है, आपकी यह बात मैंने मान ली। लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि जो ससुरा शपथ-वपथ दिला रहा होगा, उसे भी रूसी आती ही होगी। बात यह है दादा… रूसी में अपेक्षित, उपेक्षित, सम्यक, संपर्क, संसूचित, सूचित जैसे शब्द तो नहीं होंगे न… । फिर रूसी में चाहे जो कुछ पढ़ लो, बोल दो, कौन जानेगा कि सही है या गलत। और फिर मन ही मन पढने का आप्शन भी तो होगा कि नहीं।

इतना कहकर मुसद्दी लाल ने अपने समर्थकों की ओर देखा, तो कुछ समर्थकों ने तालियां बजानी शुरू कर दी, तो कुछ जिंदाबाद के नारे लगाने लगे। लग रहा था कि हर कोई मुसद्दी लाल की निगाह में अपना नंबर बढ़ाना चाह रहा हो। थोड़ी देर लोगों के चुप होने का इंतजार किया, फिर मैंने कहा, मन ही मन शपथ पढने का आप्शन नहीं है। बोलना पड़ता है माइक के सामने। वैसे जोर से पढने या मन ही मन बोलने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। अब अगर आपने अपेक्षित को उपेक्षित पढ़ भी लिया, तो क्या फर्क पड़ेगा। आपके मतदाताओं की अपेक्षा होगी कि आप अपने इलाके का विकास करेंगे, लेकिन होगा यह कि आप उनके हितों की उपेक्षा ही करेंगे। सबसे पहले अपने हित देखेंगे कि लोगों के? आप रूसी, जापानी, अंग्रेजी का झंझट छोड़िए। किसी अच्छे ट्यूटर का बंदोबस्त करके थोड़ी बहुत हिंदी लिखना पढना सीख लीजिए। शब्दों का सही-सही उच्चारण भी सीख लीजिए। आज पंचायती का चुनाव जीता है, कल विधायकी का भी जीत सकते हैं। अगर खुदा मेहरबान हो, तो गधा पहलवान हो ही जाता है। विधायकी जीत गए, तो कल सीएम, डिप्टी सीएम, मंत्री, संतरी कुछ भी बन सकते हैं। तब भी शपथ लेना ही पड़ेगा, तो क्यों न अभी से सारे कील-कांटे दुरुस्त कर लें। दोस्तो! मुझसे बस सलाह देने की यही गलती हो गई। मेरी बात सुनकर मुसद्दी लाल पसर गए। बोले, दादा..आपसे बेहतर कौन हिंदी पढ़ाएगा और देखिए..इनकार मत कीजिएगा। अब पिछले पंद्रह दिन से मुसद्दी लाल को हिंदी पढ़ा रहा हूं। आंगन में मुसद्दी लाल कुर्सी डाल हिंदी पढ़ते हैं और उनके समर्थक हाथों में पिस्तौल-राइफल लिए घर को चारों ओर से तब तक घेरे रहते हैं, जब तक मुसद्दी लाल हिंदी पढ़कर चले नहीं जाते। कुपात्र को सलाह देने का नतीजा भुगत रहा हूं।

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