Health : डॉ एस के निराला से समझें कोरोना क्या है

डॉ एस के निराला,
द्वारिका अस्पताल,
महिलौग (रांची)

कोरोना के नाम सुनकर कुछ लोगो के सांस फूलने लगते है और कुछ लोग सिगरेट के धुंए की तरह हवा मे उड़ा रहे है। यह सच है कि आधे मामले लक्षण विहीन यानी Asymptomatic है। किन्तु यह जरुरी नहीं की आपको तीन दिन गले मे खराश तीन दिन मे ठीक हो जाए और आपके भाई का शरीर का दर्द कामबीफेलेम से एक हफ्ते मे शमन हो जाए तो आपके पिताजी गम्भीर नही हो सकते है और उनके सांस मे तकलीफ नही आ सकती है। अलग-अलग लोगो मे लक्षण भिन्न होते है। सोशल साइट पढकरकोरोना को चवननी छाप बिमारी न समझे। उच्चतम बिन्दु पर पहुंचे बिना यह शैतान नीचे नही आएगा। दिल्ली, जयपुर और मुंबई मे ऐसा ही हुआ। थाली, ताली के ध्वनी और गौमूत्र से वायरस भगाने का आइडिया अवैज्ञानिक था।

पहले स्टेज मे कोरोना विषाणु नाक से प्रवेश करता है। रिकवरी का समय आधा दिन होता है, इसमें आमतौर पर बुखार नहीं होता है और इसे लक्षण विहिन यानी एसिमटोमेटिक कहते है। कारवोल प्लस को उबलते पानी मे डालकर स्टीम इन्हेलिंग यानी भाप दिन मे चार पांच बार ले।विटामिन सी या गर्म पानीमे नींबू डालकर पीने से यह समाप्त हो जाता है।

दूसरे स्थिति मे गले में खराश हो सकता है। रिकवरी का समय 1 दिन होता है। इसमें बेटाडिन को गर्म पानी मे डालकर चार पांच बार गरारा करें, गर्म पानी मे नींबू डालकर तीन चार पीए। बुखार हो तो पारासिटामोल और एंटीबायोटिक लें। एंटीबायोटिक वायरल इनफैकशन के बाद होने वाले इनफैकशन से बचाव के लिए लिया जाता है।

तीसरे स्टेज मे गले के खराश के बाद फेफड़े में खांसी होता है।4 से 5 दिन के बाद खांसी और सांस फूलना शुरु होता है।इसमें बीटाडीन डालकर गर्म पानी का गरारा, गर्म पानी मे नींबू,पारासिटामोल और एंटीबायोटिक लेना चाहिए। यदि सांस फूलने जैसा महसूस हो तो चिकितसक डेरिफायलीन और डेकशोना देते है। डेकशोना स्टेरॉयड है जिसे कोरोना के शमन मे काफी प्रभावी माना गया है। कोरोना मे खून गाढा हो जाने की बात कही जा रही है इसलिए चिकित्सक खून पतली करने वाली दवा भी देते है। इसी बीच ऑक्सिमीटर से अपने ऑक्सीजन लेवल को देखते रहे। पलस ऑक्सीमेटर छोटी उंगली के बराबर होती है। किसी भी दवा दुकान से खरीद सकते है।

ऑक्सिमीटर मे आक्सीजन यदि 92 या और नीचे दिखने लगे साथ मे बुखार, सांस भी फूल रहा हो तो किसी अस्पताल पहुंच कर आक्सीजन सिलेन्डर से आकसिजन ले।मामला और गम्भीर हो जाए तो वेंटिलेटर (यानी कृत्रिम सांस देने की मशीन) की जरुरत पड़ती है। यहाँ से मुश्किल शुरु होती है कयोकि वेंटिलेटर की सुविधा केवल बड़े प्राइवेट अस्पतालों या मेडिकल कालेज अस्पतालों मे होता है। किसी भी अस्पताल मे 8-10 से ज्यादा वेंटिलेटर नही होते है। काफी महंगा उपकरण होता है। 14 दिन तक डायबेटिज, किडनी और हृदय को बचाये रखा जाता है। इसके बिगड़ने का डर होता है। बाद कोरोना के विषाणु खुद बाहर निकल जाते है।

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