बोलने से लगता है डर

प्रख्यात उद्योगपति राहुल बजाज ने डर की आशंका व्यक्त की है। उन्हें भरोसा नहीं है कि मौजूदा सरकार की आलोचना की जाएगी, तो उसे पसंद आएगी। वह इसे उद्योगपतियों में व्याप्त डर बताते हैं। बीते दिनों जब दूसरी तिमाही की जीडीपी विकास दर 4.5 फीसदी सार्वजनिक की गई, तो प्रतिक्रिया में किसी भी बड़े उद्योगपति ने बोलना उचित नहीं समझा। हालांकि कोटक महिंद्रा बैंक के सीईओ उदय कोटक, महिंद्रा समूह के अध्यक्ष आनंद महिंद्रा, आरपीजी एंटरप्राइजिज के अध्यक्ष हर्ष गोयनका, इंफोसिस के अध्यक्ष नंदन नीलेकणि, संजीव बजाज, गौतम सिंघानिया, विजय शेखर शर्मा और हर्ष मरिवाला आदि उद्योगपति ट्विटर पर सक्रिय हैं, लेकिन उन्होंने आर्थिक सुस्ती या मंदी के इस दौर पर चुप रहना ही मुनासिब समझा। ऐसे में बजाज इंडस्ड्रीज के अध्यक्ष राहुल बजाज ने एक सार्वजनिक मंच पर बड़ी गंभीर और तल्ख टिप्पणी की है। उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के सामने ही अपनी बात रखी है। उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बजाज उद्योग जगत के शीर्ष प्रतिनिधियों में एक हैं। वह औद्योगिक चैंबर के अध्यक्ष रहे हैं और इंस्पेक्टर/लाइसेंस राज के दौरान ‘चेतक’ स्कूटर के जरिए ही उनकी कंपनी ने मोटी कमाई की थी। हालांकि राहुल बजाज अलग-अलग विषयों पर अपने विचार बयां करते रहे हैं, लेकिन सरकार की आलोचना से डरने वाली टिप्पणी मौजूदा आर्थिक परिदृश्य पर उनकी गंभीर चिंता को बयां करती है। बेशक देश के आर्थिक हालात अच्छे नहीं हैं। जो अर्थव्यवस्था 2015 में विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था मानी जाती थी, उसमें ऐसे बदलाव क्यों आए हैं कि अगले साल 2020 में राज्यों को आवंटित की जाने वाली राशि में कटौती करने पर मोदी सरकार सोचने को बाध्य हुई है। अभी तक जीएसटी संग्रह भी घट रहा था। नवंबर में एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का संग्रह किया गया है। राजस्व दर भी कम है। अर्थव्यवस्था के बुनियादी आठ मुख्य क्षेत्रों में भी विकास दर कम हुई है। अच्छा होता कि राहुल बजाज औद्योगिक विकास दर, आर्थिक सुस्ती या मंदी, ठंडे बाजार, घटते उत्पादन और कम होती उपभोक्ता दर पर बोलते, क्योंकि वह इन विषयों के गंभीर प्रवक्ता हैं। उनके भय का जवाब गृहमंत्री ने भी दिया और इससे भी स्पष्ट है कि वह सार्वजनिक सभा में बोल पाए हैं। मोदी सरकार को तो ‘उद्योगपति प्रिय’ आरोपित किया जाता रहा है, मीडिया और खासकर अखबारों में खबरें और संपादकीय मोदी सरकार की आलोचना और उसका आकलन करते रहे हैं। किसी ने भी भय बयां नहीं किया और सरकार किस-किस के पीछे सीबीआई और ईडी को लगाएगी। इस देश में सशक्त और तटस्थ न्यायपालिका है। बेशक अर्थव्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं है, क्योंकि बाजार में उपभोक्ता की मांग ही बेहद कम हो गई है। मांग नहीं होगी, तो उत्पादन घटेगा और नतीजतन नौकरियां भी जाएंगी। बेरोजगारी बढ़ेगी, जो फिलहाल अभी तक के चरम बिंदु पर है। सरकार अपने कर्मचारियों को वीआरएस देने को विवश है। ये हालात अपने आप पैदा नहीं हुए हैं, बल्कि सरकार के नीतिगत फैसलों के फलितार्थ हैं। सरकार इन्हें मानने को तैयार नहीं है। राहुल बजाज जब बोल ही रहे थे, तो ऐसे बिंदुओं पर बोलना चाहिए था, क्योंकि उद्योगपति अकसर बोलते नहीं हैं, बेशक सरकार किसी भी पक्ष की हो। बजाज के कथन में आर्थिक सुस्ती तो संबोधित नहीं हो सकी, लेकिन राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई। उससे ऐसा लगा मानो बजाज को राजनीतिक प्रवक्ता का काम दिया गया था! कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने तो यहां तक कह दिया कि ‘हमारा बजाज ने बैंड बजा दिया।’ कांग्रेस और वामदलों के नेता खुश दिखाई दिए कि चलो, मोदी सरकार के खिलाफ  कोई तो बोला, लेकिन मुद्दा यह नहीं है। बुनियादी चिंता आर्थिक हालात को लेकर है। भाजपा सांसद डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी का आकलन तो यह है कि विकास दर 4.5 फीसदी नहीं, दरअसल 1.5 फीसदी है। वह अर्थव्यवस्था को गंभीरता की हद तक समझते हैं और उनका आरोप है कि प्रधानमंत्री मोदी को अर्थव्यवस्था की जानकारी नहीं है। यह कथन राजनीतिक स्वार्थ के कारण भी दिया जा सकता है। देश राहुल बजाज सरीखे उद्योगपति के मुंह से सचाई सुनता, तो वह देशहित में ही होता। संभवतः सरकार की नींद टूटती और कोई कारगर कदम उठाए जा सकते थे।

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