संपादकों के संपादक दीनदयाल उपाध्याय

दीनदयाल उपाध्याय जी के जन्मदिवस 25 सितम्बर पर विशेषडॉ. प्रमोद कुमारदीनदयाल उपाध्याय भारत की ऐसी शख्सियत थे जो स्वयं कभी किसी समाचार पत्र-पत्रिका के औपचारिक संपादक अथवा संवाददाता नहीं रहे, कभी किसी समाचार पत्र के संपादक के रूप में उनका नाम प्रकाशित नहीं हुआ, कभी किसी कार्यालय में उनके लिए कुर्सी नहीं लगी, पत्रकारिता के किसी विद्यालय से उन्होंने कोई डिग्री/डिप्लोमा नहीं लिया, किसी समाचार पत्र या पत्रिका के प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने कभी सरकारी मान्यता नहीं ली, कभी किसी पत्र से लेखन का कोई पारिश्रमिक नहीं लिया, परन्तु वे अनगिनत पत्रकारों के लिए प्रेरणापुंज, मार्गदशक और गुरु समान रहे हैं। उन्होंने अनेक संपादकों को सजीव सान्निध्य एवं सहचर्य प्रदान किया। जिन संपादकों को उनका सान्निध्य प्राप्त हुआ उनमें प्रमुख नाम हैं अटल बिहारी वाजपेयी, राजीव लोचन अग्निहोत्री, केवलरतन मलकानी, महेन्द्र कुलश्रेष्ठ, देवेन्द्रस्वरूप, लालकृष्ण आडवाणी, भानुप्रताप शुक्ल, दीनानाथ मिश्र,अच्युतानन्द मिश्र, वचनेश त्रिपाठी आदि। दीनदयाल जी औपचारिक रूप से ‘पांचजन्य’ एवं ‘आर्गेनाइजर’ के नियमित स्तंभ लेखक थे। ‘पांचजन्य’ में वे ‘पराशर’ नाम से ‘विचारवीथि’ और ‘आर्गेनाइजर’ में ‘पाॅलिटिकल डायरी’ स्तंभ लिखते थे।भारत की बातउन्नीस सौ पचास के दशक से दीनदयाल जी का निकट सान्निध्य प्राप्त करने वाले ‘पांचजन्य’ के पूर्व संपादक स्व. देवेन्द्रस्वरूप अग्रवाल, दीनदयाल जी के पत्रकारिता से संबंधों का विस्तार से जिक्र करते हुए बताते थे कि उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह प्रांत प्रचारक रहते हुए दीनदयाल जी द्वारा 1946 में ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ और 1947 में ‘जगद्गुरु श्री शंकराचार्य’ पुस्तकें लिखने के बाद उनके लेखन की धाक जम चुकी थी। उनके लेखन की उसी श्रृंखला में से विचार उत्पन्न हुआ कि एक मासिक पत्र प्रारंभ किया जाए। उसका एक कारण यह भी था कि उस समय राष्ट्रवादी विचार को मुख्यधारा की पत्रकारिता में स्थान नहीं मिलता था। उसी चर्चा के परिणाम स्वरूप अगस्त 1947 में ‘राष्ट्रधर्म’ मासिक की शुरुआत हुई।हालांकि उससे पहले दिल्ली से अंग्रेजी साप्ताहिक ‘आर्गेनाइजर’ की शुरुआत हो चुकी थी। ‘आर्गेनाइजर’ के प्रकाशन में दीनदयाल जी की बहुत सक्रिय भूमिका के बारे में जानकारी नहीं है, परन्तु ऐसा नहीं हो सकता कि इस संबंध में उनसे विचार-विमर्श न हुआ हो। ‘राष्ट्रधर्म’ प्रारंभ करने के बाद सभी के मन में ख्याल आया कि एक माह का समय बहुत अधिक होता है, इसलिए कम से कम एक साप्ताहिक पत्र भी होना चाहिए। उसी चर्चा के बाद 1948 में मकर संक्रांति के दिन ‘पांचजन्य’ की शुरुआत हुई।औपचारिक रूप से ‘राष्ट्रधर्म’ के संपादक अटल बिहारी वाजपेयी और राजीव लोचन अग्निहोत्री थे और ‘पांचजन्य’ के संपादक अटल जी थे।दोनों ही दीनदयाल जी को अपना गुरू मानते थे। इस प्रकार यदि कहें कि दीनदयाल जी संपादकों के संपादक थे तो गलत नहीं होगा। बाद में दीनदयाल जी की प्रेरणा से एक हिन्दी दैनिक ‘स्वदेश’ का भी प्रकाशन प्रारंभ हुआ। गांधी हत्या के झूठे आरोप में जब संघ पर प्रतिबंध लगा तो उस दौरान दीनदयाल जी ने ‘हिमालय’ और ‘राष्ट्रभक्त’ नाम से दो अन्य प्रकाशन भी प्रारंभ किये, परन्तु वे अधिक समय तक नहीं चल सके। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रान्त प्रचारक होते हुए दीनदयाल जी को प्रवास करना पड़ता था। प्रवास के दौरान भी वे अध्ययन करते थे। वे कहीं भी जाते तो उनके झोले में दो-चार पुस्तकें अवश्य रहती थीं। अपनी बौद्धिक अभिरुचि के अनुसार उन्हें ‘राष्ट्रधर्म’ और ‘पांचजन्य’ बहुत प्रिय थे। इसलिए जैसे ही ये पत्र छपें सभी जगह समय से पहुंच जाएं, इसकी भी वे सदैव चिंता किया करते थे। वह आर्थिक अभावों का दौर था और साधन बहुत सीमित थे। इसलिए जरुरत के हिसाब से दीनदयाल जी लिखने से लेकर कंपोजिंग और मशीन चलाने तक में जुट जाते थे। यही नहीं, वे अखबार के बंडल हाथ में लेकर वितरण करने के लिए भी जाया करते थे। उनके लिए पत्रकारिता व्यवसाय नहीं, मिशन थी। पद या प्रतिष्ठा का उनके लिए कोई महत्व नहीं था।दीनदयाल रचना संसारदीनदयाल जी का साहित्य रचना संसार बहुत व्यापक है। समाचार पत्रों के संपादन, मार्गदर्शन और प्रबंधन के अलावा दीनदयाल जी एक उच्चकोटि के लेखक थे। उनके लेखन के बारे में टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ कांग्रेस नेता डा. संपूर्णानन्द ने दीनदयाल जी पुस्तक ‘पाॅलिटिकल डायरी’ की प्रस्तावना में लिखा है कि दीनदयाल जी जो भी कुछ लिखते थे उसे स्थायी वैचारिक अधिष्ठान प्रदान करके लिखते थे। यही कारण है कि उनके द्वारा लिखी गयी सामग्री आज भी पूरी तरह प्रासंगिक लगती है। उनकी सबसे पहली पुस्तक ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ 1946 में प्रकाशित हुई जो उन्होंने एक ही बार में बैठकर 16 घंटे में पूरी कर ली थी। दूसरी पुस्तक ‘जगदगुरु श्री शंकराचार्य’ 1947 में प्रकाशित हुई जो युवाओं के लिए उपयोगी उपन्यास है। संघ संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार के अधिकृत जीवन चरित्र का मराठी से हिन्दी में अनुवाद दीनदयाल जी ने ही किया था। उनके द्वारा लिखी गयी प्रमुख पुस्तकें हैंः सम्राट चन्द्रगुप्त (1946), जगदगुरु श्री शंकराचार्य (1947), अखंड भारत क्यों? (1952), टैक्स या लूट (1954), बेकारी की समस्या और उसका हल (1954), दो योजनाएं: वायदे, अनुपालन, आसार (1958), सिद्धांत और नीतियां (1964), एकात्ममानववाद (बंबई में दिये गये चार व्याख्यान) (1965), विश्वासघात (1965), वचनभंगः ताशकंद घोषणा की शवपरीक्षा (1966), अवमूल्यनः एक बड़ा पतन (1966), पाॅलिटिकल डायरी (1968), राष्ट्र जीवन की दिशा (1971)।ऐसे बचेगी मीडिया की गिरती साखजन सरोकारों से कटकर पत्रकारिता कितनी नुकसानदेह हो सकती है यह आज की मुख्यधारा की पत्रकारिता को देखकर समझ में आता है। मीडिया का एक वर्ग आज अपने लाभ के लिए देश विरोधी शक्तियों से भी समझौता करने में संकोच नहीं करता। राजनीतिक दलों तथा कुछ छुपी हुई वैश्विक ताकतों को लाभ पहुंचाने के लिए झूठी खबरें छापने का चलन भी जोरों पर है। ‘पेड न्यूज’ का मुद्दा करीब दो दशक से चर्चा में है। समाचार पत्र के प्रथम पृष्ठ से लेकर अंतिम पृष्ठ तक और न्यूज चैनल की पहली खबर से लेकर अंतिम खबर तक नकारात्मकता ही छायी रहती है। वर्तमान समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और न्यूज चैनलों एवं वेब पोर्टलों को देखकर लगता है कि आज देश में सिर्फ नकारात्मक घटनाएं ही घट रही हैं और समाज में कुछ भी सकारात्मक और रचनात्मक नहीं हो रहा है। समाज की उजली तस्वीर मीडिया से गायब है। ऐसे समय में दीनदयाल उपाध्याय की पत्रकारिता और उनके द्वारा रचित साहित्य हमें नयी दिशा प्रदान करता है।दीनदयाल जी ने सार्वजनिक जीवन के प्रति सचेत, सुरुचिपूर्ण एवं संस्कारक्षम पत्रकारिता को अपने कार्यकर्ताओं व समाचारपत्रों के माध्यम से विकसित करने का प्रयत्न किया। भाषा की शिष्टता, समाचार में भारत की अभिव्यक्ति, समाज को रचनात्मक दिशा देने के लिए लेखन आदि ऐसे मूल्य हैं जो दीनदयाल जी से सीखे जा सकते हैं। पेडन्यूज, फेकन्यूज आदि जिन विसंगतियों से भारतीय मीडिया जूझ रहा है उनके निराकरण में भी दीनदयाल जी का पाथेय उपयोगी है।

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