Lock-Down : अर्थव्यवस्था हो प्राथमिकता

देश में लॉकडाउन से हो रहीं परेशानियों से जूझते लोगों को राहत देने के लिए काफी सोच-विचार के उपरांत स्पेशल ट्रेनें चलाने और घरेलू उड़ानें शुरू करने का निर्णय किया गया। इससे जहां-तहां फंसे लोगों के चेहरों पर उम्मीद भरी मुस्कान आयी थी। लेकिन, दुखद रहा कि पहले दिन ही देशभर में लगभग 630 उड़ानें रद्द कर दी गयीं। सिर्फ दिल्ली एयरपोर्ट पर 80 फ्लाइट्स रद्द हुईं। मुंबई एयरपोर्ट पर 20 उड़ानें रद्द हुईं। बड़ी संख्या में लोगों को सपरिवार एयरपोर्ट पहुंच कर पुन: लौटना पड़ा। लॉकडाउन के चलते जब पब्लिक ट्रांसपोर्ट लगभग बंद हैं, तो एयरपोर्ट पहुंचने और फिर वापस होने में उन्हें कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ा होगा, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। ट्रेनें भी कोई बेहतर उदाहरण नहीं साबित हो रहीं। सबसे बुरी गत श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की है। न केवल उनकी दिशा और गंतव्य का कोई ठिकाना रह गया है, बल्कि उनके विलम्बित होते चले जाने की भी कोई सीमा नहीं रह गयी है। ये घंटों में नहीं, दिनों में लेट हो रही हैं। सूरत से सीवान के लिए चली ट्रेन न जाने कहां-कहां से भटकती हुई दो के बदले नौ दिन में अपने मुकाम तक पहुंची। खाना और पानी से वंचित यात्रियों का इतनी लम्बी यात्रा के दौरान बीमार पड़ना स्वाभाविक है। कुछ मौत की भी खबरें हैं। जले पर नमक छिड़कने जैसी बात यह कि ऐसी अव्यवस्था के दौरान भी मंत्रियों का ध्यान समस्या को हल करने से अधिक विरोधियों को नीचा दिखाने पर लगा हुआ है। रेलमंत्री पीयूष गोयल ट्विटर पर यह साबित करने में लगे हैं कि वह तो मुंबई से 200 ट्रेनें रोज चला सकते हैं, लेकिन महाराष्ट्र सरकार का प्रशासन इतना नकारा है कि समय पर यात्रियों की सूची ही नहीं दे रहा। बहरहाल, सभी कमियों को स्वीकार करते हुए भी इस सच को दरकिनार नहीं किया जा सकता कि हम एक असाधारण स्थिति का सामना कर रहे हैं। दो महीने से ठप पड़ी रेलवे और हवाई सेवा को फिर से शुरू किया जायेगा, तो वे अचानक अपनी पुरानी क्षमता से काम नहीं करने लग जायेंगी। इस पूरे तंत्र में किन-किन स्तरों पर किस-किस तरह की समस्याएं आ चुकी हैं, इसका अहसास काम आगे बढ़ने के साथ ही हो पायेगा। और, अभी तो इन्हें काम भी एक तिहाई स्टाफ के साथ ही करना पड़ रहा है। हमें यह भी याद रखना होगा कि वायरस से हमारी लड़ाई अभी चल ही रही है, जिसमें हम अभी तक इस महामारी को ऊपर चढ़ते ही देख रहे हैं। यहां से यह कितना आगे जायेगी और कब अपनी चोटी पर पहुंचेगी, यह कह पाना मुश्किल है। ऐसे में सभी के लिए अच्छा यही होगा कि हम न्यूनतम उम्मीदें लेकर अधिकतम सावधानी के साथ आगे बढ़ें। अपने संसाधनों की सीमाओं के साथ-साथ हमें यह भी समझना होगा कि हमारा सरकारी तंत्र अभी बहुत अधिक दबाव में है। मंत्रियों और आला अफसरों को भी स्थिति की गम्भीरता को समझना होगा। इन्हें जनता में अधिक उम्मीद जगाने से बचना चाहिए। व्यवसाय-व्यापार धीरे-धीरे खुलते जायें…अर्थव्यवस्था शीघ्र पटरी पर आ जाये, यही हमारी प्राथमिकता में सबसे ऊपर होना चाहिए। परेशानी की इस भीषण घड़ी में नेताओं को एक-दूसरे पर छींटाकशी से परहेज करना चाहिए…नीचा दिखलाने की कोशिशों से बाज आना चाहिए। उनकी हरकतें देश को बहुत आहत कर रही हैं।

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