शहर के विद्वान रौशन झा ने लिख डाली गीता, शीघ्र होगी आपके समक्ष

रघुबंश तोमर

जमशेदपुर। कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान योगेश्वर कृष्ण के श्रीमुख से निकली गीता मानव जाति के लिए वह पद्धति है कि जिसका अनुसरण कर कोई भी व्यक्ति अपने सामान्य जीवन को जीते हुए मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। गीता भारतीयता एवं हिंदुत्व की आत्मा है और अपनी इसी विशेषताओं के कारण गीता पूरे विश्व में जानी जाती है। गीता के 18 अध्याय में 700 श्लोक है जो संस्कृत में लिखा गया है। अनेक पुस्तकों में गीता के इन श्लोकों का हिंदी एवं अन्य भाषाओं में अर्थ एवं भाव उपलब्ध है। अनेक ही विद्वानों ने, परम आत्माओं ने गीता के इन श्लोकों के अर्थ एवं भाव को श्री भगवत कृपा से विस्तार से लिखा है। किंतु जिस प्रकार बाल्मीकि रामायण को गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित्र मानस की सहज भाषा और चौपाई में लिखा जिस से की राम जनमानस तक बहुत ही सहजता से पहुंचते रहे एवं वो सामान्य लोग जो संस्कृत के ज्ञाता वह विद्वान नहीं थे वह भी राम चरित्र मानस के माध्यम से भगवान राम को प्राप्त करने में सक्षम हो सके। उसी प्रकार गीता के इन 700 श्लोकों का भी सहज भारतीय हिंदी भाषा की चौपाई, छंद या दोहे में कोई रूप होना चाहिए, ताकि गीता भी जन-जन तक बहुत ही आसानी से पहुंच पाए और सभी लोग इसका लाभ ले सकें। रौशन झा द्वारा रचित पुस्तक दिल्ली से प्रकाशित हो रही है जो शीघ्र ही आपके समक्ष होगी।
इसी विचार के साथ जन्म हुआ “सहज गीतामृत” का। इसी विचार को लेकर लेखक ने सन 1995 में एक यात्रा आरंभ की और उस यात्रा को नाम दिया “सहज गीतामृत” का लेखक ने यह यात्रा आरंभ करते समय गीता को साक्षी मान यह संकल्प धारण किया कि गीता में कहे गए कृष्ण के भाव एवं उद्देश्य से शुन्य मात्र भी हेरफेर किए बिना 700 श्लोकों को चौपाई के रूप में लिखना है। और 25 वर्ष की यात्रा के बाद 700 श्लोकों को 700 चौपाइयों में 18 अध्यायों को 18 अध्याय में अपने उस संकल्प को पूरा करते हुए की जिसमें गीता को साक्षी मानकर यह संकल्प धारण किया गया था की गीता में भगवान श्री कृष्ण के उद्देश्य एवं भाव से शुन्य मात्र भी हेरफेर नहीं किया जाना चाहिए का पूरी तरह निर्वहन करते हुए लिखा। लेखक का एकमात्र उद्देश्य है कि गीता में अधिक से अधिक लोगों की रुचि हो और संपूर्ण विश्व में अधिक से अधिक लोग इससे लाभान्वित हो। लेखक का दावा है कि जिनके पास गीता उपलब्ध हो वह लोग गीता के एक एक श्लोक के अर्थ से एक एक चौपाई को मिला लें और वह पाएंगे कि लेखक द्वारा लिया गया संकल्प पूरी तरह निभाया गया है। सहज गीतामृत की कुछ चौपाइयों को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।

पहला अध्याय
धृतराष्ट्र बोले हे संजय, युद्ध हेतु कुरुक्षेत्र में पहुंचे।
पांडव के व पुत्र हमारे, कहो देख करते क्या सारे।१।
इस पर संजय बोले राजन, पांडव सैन्य देख दुर्योधन।
बोले द्रोणाचार्य से जाकर, आदर के संग शीश नवाकर।२।
देखिए गुरुवर सेन्य अपारा, व्यूह रचित धृष्टद्युम्न के द्वारा।
आपके पुत्र द्रुपद का बालक, इस व्यूह का है संचालक।३।
खड़ा देख संबंधी जन को, कष्ट हुआ कुंती नंदन को।
करुणा से भर अर्जुन डोला, श्री कृष्ण से तब ये बोला।२७।
हे माधव इस युद्ध में आए, सब है अपने नहीं पराए।
देख के इनको सामने आया, सूखे मुख और कांपे काया।२८।
मुझ नीहत्थे को यह सारे, धृतराष्ट्र के पुत्र जो मारे।
बिन प्रतिरोध भी मारा जाऊं, उसने भी कल्याण ही पाऊं।४६।
रणभूमि में तब हे राजन, शोक से व्याकुल होकर अर्जुन।
धनुषबाण से किया किनारा,रथ आसन का लिया सहारा।४७।

दूसरा अध्याय
हे राजन अर्जुन को ऐसे, देख शोक में व्याकुल जैसे।
अश्रु भी थे नेत्र में आए, तब श्रीकृष्ण ने वचन सुनाए।१।
अर्जुन यह अज्ञान है कैसा, श्रेष्ठ आचरण के ना जैसा।
अपयश ही यह फैलाएगा,स्वर्ग न इससे मिल पाएगा।२।
जैसे वस्त्र त्याग हम सारे, नव वस्त्रों को फिर से धारे।
आत्मा भी तो यही है करता, छोड़ पुराना नया है धरता।२२।
हे अर्जुन तुम जीतो हारो, इन दोनों को सम स्वीकारो।
ऐसे कर्म जो करता जाता, वही कर्म है योग कहाता।४८।

इसी प्रकार लेखक ने गीता के सभी 700 श्लोकों को सहज हिंदी चौपाई में लिखा है।
लेखक को आशाआशा एवं पूर्ण विश्वास है कि यह पूरी सृष्टि में भगवान कृष्ण के भाव एवं उद्देश्यों को जन जन के जीवन में सम्मिलित होने में सहायक होगा।

लेखक का संक्षिप्त परिचय

लेखक का सांसारिक नाम रौशन झा है
लेखक का जन्म 1980 में बिहार के मधुबनी जिले में साधारण किसान परिवार में हुआ एवं प्रारंभिक शिक्षा भी गांव के ही एक स्कूल से आरंभ हुई। बच्चों की शिक्षा एवं पारिवारिक उन्नति के उद्देश्य से लेखक का परिवार 1990 में दिल्ली पहुंचा। और आगे की शिक्षा भी लेखक ने दिल्ली से ही हासिल की। लेखक अपने प्रारंभिक दिनों से ही हिंदी साहित्य में विशेष रूचि रखता था एवं अनेक साहित्यकारों की किताबें पढ़ता था। लेखक के पिता श्री भोलानाथ झा कर्मकांड एवं ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता थे जिस कारण धार्मिक पुस्तकों विशेष रूप से राम चरित्र मानस एवं भगवत गीता में लेखक की रुचि निरंतर रहती थी। लेखक अपने स्कूल के दिनों से ही कविता लेखन एवं पाठन में विशेष रूचि रखता था इसी अंतराल में अनेकों अनेक बार गीता को लेकर लेखक के मन में यह विचार उमड़ता रहा की गीता का भी कोई रूप रामचरित्र मानस की तरह सहज चौपाई में होना चाहिए, और 22 अक्टूबर 1995 की वह रात जब लेखक ने यह संकल्प धारण कर की गीता में कहे गए श्री कृष्ण के भाव एवं उद्देश्य से बिंदु मात्र भी छेड़छाड़ किए बिना मैं गीता के श्लोकों को हिंदी चौपाई में परिवर्तित करने का प्रयास करूंगा सहज गीतामृत लिखना आरंभ किया। और 25 सालों की कठिन परिश्रम एवं लगन के साथ दिल्ली से आरंभ हुई यह यात्रा झारखंड के जमशेदपुर शहर में आकर संपन्न हुई। इस यात्रा के दौरान लेखक को अनेक परिस्थिति और कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा, क्योंकि लेखक एक गृहस्थ आश्रम व समाजसेवी विचारधारा का व्यक्ति है तो सभी दायित्व को निभाते हुए लेखक ने इस यात्रा को पूरी निष्ठा व लगन के साथ संपूर्ण किया। कई बार ऐसा भी समय आता रहा कि जब एक श्लोक का रूपांतरण करने के लिए 1 माह से अधिक भी लग गया, दिन भर के अपने जीवन यापन हेतु कार्यों की थकान, परिवार एवं बच्चों की दैनिक जिम्मेदारी, अनेक प्रकार के समाजसेवी क्रियाकलापों में सहभागिता, और इन सब के साथ केंद्र में वह लक्ष, किंतु लेखक लक्ष विमुख नहीं हुआ और यह भगवान श्री कृष्ण की भगवत कृपा का ही देन है।

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