छत्तीसगढ़ सरकार ने की एनआईए कानून को असंवैधानिक घोषित करने की मांग

रायपुर । प्रदेश में कई मामलों की जांच में एनआईए की दखल को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सरकार ने अपनी याचिका में एनआईए कानून 2008 को असंवैधानिक घोषित करने की मांग करते हुए कहा है कि यह कानून केंद्र सरकार को मनमाना अधिकार देता है। इस लिहाज से छत्तीसगढ़ के किसी भी मामले में जांच का अधिकार एनआईए को न दिया जाए।

उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम, नान सहित कई अन्य मामलों एनआईए जांच कर रही थी। वहीं लोकसभा चुनाव के दौरान हुए नक्सली हमले में दंतेवाड़ा के पूर्व विधायक भीमा मंडवी का निधन हो गया था। इस मामले में भी भाजपा एनआईए जांच की मांग कर रही है। इस कानून को 26/11 हमले के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने लाया था, उस समय इस सरकार के गृहमंत्री पी. चिदंबरम गृहमंत्री थे। जब इस कानून को बनाया जा रहा था उस समय भी इसके खिलाफ कई राज्य सरकारों ने आवाज उठाई थी लेकिन किसी भी राज्य ने अब तक न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटाया है। पहली बार छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने इस कानून को राज्यों के विवेकाधीन शक्तियों पर मनमाने तरीके से अंकुश लगाने वाला बताया है। उसने यह भी कहा है कि यह कानून राज्य के हितों पर बेवजह अतिक्रमण करता है। इस कानून में प्रावधान है कि एनआईए किसी भी राज्य में जाकर किसी भी तरह की करवाई को अंजाम दे सकती है इसके लिए उसे राज्य सरकार की किसी भी तरह की अनुमति की आवश्यकता नहीं है। छत्तीसगढ़ सरकार को इसीलिए लगता है कि इस कानून का गलत इस्तेमाल भी किया जा सकता है। राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत इस याचिका में उल्लेख किया गया है कि एनआईए एक्ट को एक ऐसी जांच एजेंसी बनाता है जो किसी राज्य की पुलिस के उपर अधिकार प्राप्त करती है।

 एनआईए एक्ट उस संघीय भावना के खिलाफ है जिसमें केंद्र और राज्य अपने संबंधित अधिकार क्षेत्र में स्वतंत्र माने जाते हैं।छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार ने याचिका में एनआईए एक्ट को राज्य के अधिकारों पर अतिक्रमण माना है और इसे लेकर याचिका दायर की है।महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में एनआईए एक्ट को चुनौती दिए जाने की पुष्टि करते हुए कहा कि कि 2008 में केंद्र सरकार ने एनआईए एक्ट बनाया था। हमारा कहना है कि संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत एनआईए के प्रावधान दिखाई पड़ते हैं।

 संविधान की अनुसूची-2 के भाग दो में इस बात का साफ जिक्र है कि पुलिसिंग व्यवस्था राज्य सरकार से संबंधित होगी, जबकि एनआईए एक्ट को आधार बनाकार केंद्र राज्य में चल रहे कई मामलों को जांच किए जाने का फैसला केंद्र सरकार अपनी रूचि से ही कर लेती है।सतीश चंद्र वर्मा ने कहा कि संविधान में लाॅ एंड आर्डर, पुलिसिंग जब राज्य के अधीन है, राज्य पुलिस जांच करने में सक्षम है, बेहतर जांच कर अपराधी को पकड़ सजा दिलाने की काबिलियत है, ऐसे में राज्य के इस अधिकार को एनआईए एक्ट के जरिए छिनने की कोशिश केंद्र को नहीं की जानी चाहिए।

उल्लेखनीय है कि भारत में आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए भारत सरकार द्वारा स्थापित एक संघीय जांच एजेंसी है। यह केन्द्रीय आतंकवाद विरोधी कानून प्रवर्तन एजेंसी के रूप में कार्य करती है। एजेंसी राज्यों से विशेष अनुमति के बिना राज्यों में आतंक संबंधी अपराधों से निपटने के लिए सशक्त है। एजेंसी 31 दिसम्बर 2008 को भारत की संसद द्वारा पारित अधिनियम राष्ट्रीय जांच एजेंसी विधेयक 2008 के लागू होने के साथ अस्तित्व में आई थी।राष्ट्रीय जांच एजेंसी को 2008 के मुंबई हमले के पश्चात स्थापित किया गया क्योंकि इस घटना के पश्चात् आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए एक केंद्रीय एजेंसी की जरूरत महसूस की गई। आतंकी हमलों की घटनाओं, आतंकवाद को धन उपलब्ध कराने एवं अन्य आतंक संबंधित अपराधों का अन्वेषण के लिए एनआईए का गठन किया गया। जबकि सीबीआई आतंकवाद को छोड़ भ्रष्टाचार, आर्थिक अपराधों एवं गंभीर तथा संगठित अपराधों का अन्वेषण करती है।

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