उच्च शिक्षा में उत्कृष्टता की चुनौती

गिरीश्वर मिश्र

भारत के लिए प्रस्तुत नई शिक्षा नीति देश की ऐसी महत्वाकांक्षी पहल है जो शिक्षा के कलेवर को आमूलचूल बदलने के लिए प्रतिश्रुत दिख रही है। इस तरह की जरूरत बहुत दिनों से अनुभव की जा रही थी परंतु जिस तरह से वर्तमान सरकार ने इसकी योजना बनाने में गम्भीरता दिखाई और इसके कार्यान्वयन के प्रति रुचि व्यक्त की है, यह उसकी प्रतिबद्धता और संकल्प की दृढ़ता को व्यक्त करती है। सरकार द्वारा यह संकेत दिया जा रहा है कि आत्मनिर्भर, उद्यमी और कुशलतायुक्त युवा शक्ति भारत की स्थानीय और वैश्विक समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकेगी।

ऐसा नहीं है कि संरचना, विषयवस्तु और शिक्षा पद्धति को लेकर उच्च शिक्षा का जो ढांचा अबतक चलता चला आ रहा था, उसे लेकर कोई असंतोष नहीं था या उसकी आलोचना नहीं हुई थी परंतु सरकार की ओर से छिटपुट बदलाव के अलावा कोई कारगर उपाय नहीं हुआ। समस्याएं बढ़ती गईं या फिर उनके रूप बदलते गए। धीरे-धीरे अधिकांश विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रवेश, परीक्षा और डिग्री देने की यांत्रिक प्रक्रिया ही मुख्य कार्य बनता गया। शिक्षा की गुणवत्ता प्रश्नांकित होती गई और डिग्रीधारी बेरोजगारों की संख्या बढ़ती गई जो अपनी अकुशलता के कारण समाज पर भार बनते गए। यह भारतीय लोकजीवन का दुखदायी पक्ष है कि शिक्षा अपनी अपेक्षाओं की दृष्टि से कमजोर साबित हुई। नालंदा और तक्षशिला जैसे उन्नत विश्वविद्यालयों के अतीत वाले भारत के वर्तमान विश्वविद्यालय दु:स्वप्न सरीखे हो रहे हैं। इनकी समस्याओं के समाधान के लिये नई शिक्षा नीति में बहु आयामी प्रयास का वादा किया गया है।

नई शिक्षा नीति में विद्यार्थियों की अभिरुचि, योग्यता और तत्परता को देखते हुए अध्ययन विषय के चयन और शिक्षण-अवधि की दृष्टि से अनेक विकल्प दिये जाने का प्रावधान किया गया है। साथ ही सीखने की प्रक्रिया पर विशेष बल दिया गया है ताकि अध्ययन का कार्य विद्यार्थियों के निजी अनुभव का हिस्सा बन सके। अबतक अध्यापक पुस्तक और परीक्षा की वैतरणी के बीच सेतु का काम करते थे जिनकी सहायता से विद्यार्थी पार उतरता था। साथ ही पुस्तक और परीक्षा के बीच ऐकिक सम्बन्ध बना रहता था। पिछले कुछ वर्षों के प्रश्नपत्र हल करना सफलता की गारंटी होता था। रटन की प्रचलित परम्परा से अलग हटकर अनुभव, चिंतन और सृजन को महत्व देना, विद्यार्थियों को सशक्त और योग्य बनाने की दिशा में बड़ा कदम होगा।

प्रस्तावित व्यवस्था में व्यावसायिक, मानविकी, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कला और समाज विज्ञान आदि विषयों में से चुनने की छूट क्रांतिकारी पहल है। इस तरह का लचीलापन विद्यार्थी में जिज्ञासा की भावना, प्रयोगधर्मिता, सृजनशीलता को बढ़ावा देने के साथ-साथ छात्र संख्या के दबाव को कम करने, विद्यार्थियों की रुचि की विविधता को सम्मान देने और शिक्षा प्रक्रिया की अतिरिक्त यांत्रिकता से उबरने में निश्चय ही सहायक सिद्ध होगी। इसके लिए संस्था के स्तर पर बहु अनुशासनात्मकता को प्रश्रय देना होगा। साथ ही पाठ्यक्रमों को समुचित आकार देना होगा ताकि उनमें संरचनात्मक दृष्टि से पूर्णता और कौशलगत उपादेयता का समुचित सन्निवेश हो सके।

उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर होने वाले छात्रों के लिए चार वर्ष का स्नातक पाठ्यक्रम निश्चय ही उपयुक्त होगा। कहना न होगा कि इसके लिए पाठ्यक्रम को अद्यतन करने के साथ अध्यापकों के लिए प्रशिक्षण भी आवश्यक होगा, जिसमें शिक्षण विधि के साथ मूल्यांकन व्यवस्था विकसित की जाय। नई व्यवस्था की प्रामाणिकता और उपयोगिता की स्वीकार्यता के लिए प्राध्यापकों के लिए गहन अभिविन्यास (ओरियेंटेशन) की आवश्यकता होगी। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अध्यापक प्रशिक्षण का प्रश्न पेचीदा है क्योंकि इसमें शिक्षण विधि, शिक्षण की टेक्नोलॉजी के साथ विषयगत अनुसंधान में भी अद्यतन होते रहने की जरूरत है। इनके बीच सामंजस्य और संतुलन बिठाना बड़ा आवश्यक है और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इसे अनिवार्यत: सतत होते रहना चाहिए। नई शिक्षा नीति कई तरह की उच्च शिक्षा संस्थाओं की संकल्पना के साथ प्रत्येक जिले तक उनकी स्थापना की बात करती है। यह सब पर्याप्त आर्थिक संसाधनों की अपेक्षा करता है। यह शुभ लक्षण है कि इसके लिए सरकार जीडीपी का छह प्रतिशत खर्च करने के लिए तत्पर है।

वस्तुत: उच्च शिक्षा में सुधार बहुत दिनों से प्रतीक्षित है। कहां तो सा विद्या या विमुक्तये कहकर शिक्षा को मनुष्य की मुक्ति का प्रमुख साधन स्वीकार किया गया था और कहां आज शिक्षा को अंदर से जर्जर व्यवस्था में कैद पा रहे हैं। आज की स्थिति बहुत बदल चुकी है और मात्र खानापूर्ति हो पा रही है। यदि निकट से देखा जाय तो प्रचलित व्यवस्था शनै:-शनै: ज्ञान-निर्माण, कुशलता-प्रशिक्षण, सामाजिक दायित्व-बोध के विकास और मानवीय मूल्यों को आत्मसात करने की दृष्टि से खोखली होती जा रही है।

यद्यपि हर बात के लिए शिक्षा पर दोष मढ़ना ठीक नहीं और न शिक्षा को हर रोग की दवा (राम बाण!) मानना उचित होगा। परंतु इस बात के पर्याप्त प्रत्यक्ष और परोक्ष संकेत हैं कि शिक्षित वर्ग अपनी भूमिका में खरा नहीं उतर पाया। इसकी परिणति देश के गिरते सामाजिक, नैतिक, राजनैतिक और आर्थिक स्वास्थ्य में देखी जा सकती है। आशा और अपेक्षा तो यह थी कि उच्च शिक्षा के परिसरों में सृजनशीलता, मौलिकता, उत्कृष्टता, प्रासंगिकता, सांस्कृतिक चैतन्य और मूल्यवत्ता का जीवंत रूप मिलेगा और स्वतंत्र चिंतन तथा स्वायत्तता की प्रतिष्ठा होगी, पर ऐसा हो न सका। स्वतंत्र भारत में शिक्षा के लोकतंत्रीकरण के तहत उच्च शिक्षा की संस्थाओं का बड़ी तेजी से और अनियंत्रित सा प्रसार हुआ। हालांकि भारत की कुल जनसंख्या की दृष्टि से वह अभी भी अपर्याप्त कहा जायगा।

शिक्षा के स्तर का जो क्षरण शुरू हुआ तो सारे मानक टूटने लगे। उच्च शिक्षा की संस्थाओं को अंग्रेजों के जमाने में जो स्वायत्तता प्राप्त थी वह स्वाधीन भारत में लुप्त होती गई। सामाजिक-राजनैतिक समीकरणों के भंवरजाल में फंसकर उच्च शिक्षा का आत्म-नियंत्रण जाता रहा और अब वह लगभग पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में है जो अंतत: राजनैतिक प्रकृति का होता है। साथ ही शिक्षा संस्थाओं के बढ़ते निजीकरण से कई नए आर्थिक और नैतिक आयाम भी जुड़ गए हैं जो गुणवत्ता और साख के सवाल खड़े करते रहे हैं।

प्रसन्नता की बात है कि नई शिक्षा नीति में संस्थाओं को अधिक स्वायत्तता मुहैया करने का प्रस्ताव किया गया है परंतु इसकी प्रकृति और प्रक्रिया को लेकर बहुत स्पष्टता नहीं है। संस्थाओं पर भरोसा करते हुए इसपर मुक्त मन से विचार की अपेक्षा है ताकि शिक्षा जगत में फैले संशय दूर हो सकें।

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