रंगोत्सव पर मिलावटी रंगों से रहें सावधान

रमेश ठाकुर-

होली का त्योहार नजदीक आते ही हर तरफ रंगों की फुहार बहने लगती है। करीब सप्ताह भर पूरा वातावरण रंगोत्सव में सराबोर रहता है। ग्रामीण अंचल से लेकर महानगरों तक दूसरे पर्व-त्योहारों के मुकाबले होली का क्रेज ज्यादा रहता है। फागुन के अंतिम दिनों में चारों तरफ रंगीली फुहारों की रसधारा होती है लेकिन अब रसधारा में रंग की जगह जहर का प्रयोग होने लगा है। रंग के नाम पर धड़ल्ले से जहरनुमा केमिकल का गोरखधंधा हो रहा है। यह रंग त्योहार के दिन ही सबको बेरंग कर देता है। क्या बच्चे, क्या बूढ़े और जवान, सभी इसके चपेट में आते हैं। केमिकल रंगों की ब्रिकी रोकने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें अपने स्तर पर प्रयास करती हैं लेकिन उसका खास असर नहीं पड़ता। चोरी-छिपे रंगों की ब्रिकी जारी रहती है। होली रंगों का पर्व है। सदियों की परंपरा के मुताबिक होली के दिन लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर आपस में खुशियां मनाते हैं। पिछले कुछ सालों से रंगोत्सव में खलल पड़ा है। खलल का कारण केमिकल रंगों का प्रयोग है। लोग अब देशी रंगों की जगह केमिकल से निर्मित खतरनाक रंगों का इस्तेमाल करने लगे हैं। केमिकल युक्त रंग शरीर पर विपरीत प्रभाव डालकर होली को बेरंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ती। पूर्व की कई खतरनाक घटनाएं इसका उदाहरण हैं। ज्यादा नहीं, बल्कि करीब पांच-छह वर्षों से केमिकल रंगों का प्रयोग ज्यादा बढ़ा है। होली बस आने को है और रंगों के बाजार सजकर तैयार हो गए हैं। देशी रंगों से लोग अब परहेज करने लगे हैं। एक जमाना था जब टेसू के फूलों और स्वयं निर्मित रंगों से होली खेली जाती थी। वक्त बदला, रिवायतें बदली और बदल गया रंगोत्सव का तरीका। पारंपरिक रंगों से खेली जाने वाली होली अब केमिकल रंगों से भर गई है। केमिकल रंगों ने अब स्वयं निर्मित रंगों की चमक को फीका कर दिया है। यह रंग बेहद खतरनाक होते हैं। कई बार इनका कुप्रभाव बीमारियों में तब्दील होकर सीधे अस्पतालों का रास्ता भी दिखा देता है। मिलावटी रंगों के गोरखधंधे को रोकने के लिए प्रशासन लाख दावे क्यों न करें लेकिन धरातल पर सब शून्य-सा लगता है। इस होली के लिए भी बाजार केमिकल रंगों से सजकर तैयार है। जो लोग इसके खतरे से अनजान हैं, वे बड़ी कीमत चुकाते हैं। चिकित्सीय आंकड़े गवाही देते हैं कि इन रंगों से कईयों की आंखों की रोशनी चली गई और कईयों के चेहरे की त्वचा खराब हुई। कुछ लोग यह जानने के बावजूद अनजान होते हैं। ऐसे लोगों के लिए मजा तब सजा बन जाती है जब इसके शिकार होते हैं। किसी जमाने में होली खेलने के लिए लोग महीनों से रंगों को तैयार करते थे। मसलन, पीले रंग के लिए हल्दी, लाल रंग के लिए गुड़हल के फूल का इस्तेमाल होता था। होली का बड़ा उमंग और क्रेज होता था। अब भी होता है लेकिन मायने बदल चुके हैं। बदलते वक्त ने रंगों में मिलावट का नया अध्याय शुरू कर दिया। प्रशासनिक लापरवाही कहें या लोगों की अज्ञानता, रंगों में अब केमिकल की मिलावट खुलेआम होने लगी है। दरअसल, यह रंग कुछ देर के लिए मजा तो देते हैं लेकिन कुछ घंटों बाद ही सेहत के लिए खतरनाक साबित होते हैं। दुकानदारों की मानें तो होली के दिनों में इन्हीं रंगों की डिमांड भी सबसे ज्यादा रहती है। विगत कुछ वर्षों से चाइना से केमिकल रंगों की सप्लाई बड़े स्तर पर होने लगी है। जबकि चाइना में होली खेली भी नहीं जाती लेकिन भारतीय रंगों के बाजार पर उसने कब्जा कर लिया है। हालांकि चाइना से रंगों और चाइनीस मांझे पर सरकार ने प्रतिबंध लगाया हुआ। इसके बावजूद भारतीय बाजारों में चाइना के रंग और मांझे पर्याप्त मात्रा में सहज उपलब्ध हैं। इन रंगों की भारी ब्रिकी का कारण, देशी रंगों के मुकाबले इनकी कीमतों का कम होना है। इनका भाव हमारे स्थानीय रंगों से कहीं कम होता है। इन सस्ते रंगों में केमिकल तो मिला ही होता है, गहरे रंगों जैसे नांरगी, काला और हरे रंग के लिए कॉपर सल्फेट, लाल रंग के लिए मरकरी सल्फाईट और लेड ऑक्साइड का प्रयोग किया जाता है। ऐसे रंग अब हमारे यहां भी निर्मित होने लगे हैं। होली पर सिल्वर रंगों की मांग सबसे ज्यादा होती है। सिल्वर रंगों के लिए एल्यूमीनियम ब्रोमाइड, नीले रंग के लिए पर्शियन ब्लू नाम के केमिकल का प्रयोग किया जाता है। कमोबेश यही सब रंग त्वचा के नुकसान का कारक बनते हैं। गौरतलब है कि होली के पंद्रह दिन पहले से ही बाजार रासायनिक रंगों से सज जाते हैं। सस्ते की लालच में ग्राहक जमकर इसकी खरीददारी भी करते हैं। अबीर और रंग की बिक्री खूब होती है। इस रंग को सबसे ज्यादा खतरनाक माना जाता है। यह रंग शरीर में लग जाने से त्वचा को शुष्क कर देता है जिससे त्वचा चटकने लगती है। इससे एलर्जी हो जाती है। चेहरे व शरीर पर लाल दाने पड़ जाते हैं। आंखों में रासायनिक रंग चला जाए तो रोशनी जाने का खतरा रहता है। मुंह में रंग जाने पर छाले पड़ जाते हैं। कई तरह के नुकसान होने का डर रहता है। इसके बावजूद लोग परहेज नहीं करते। खुलकर ऐसे रंग खरीदते हैं और इसी से होली खेलते हैं। हालांकि कुछ लोग इन रंगों के प्रति जागरूक भी हुए हैं लेकिन होली के समय पता नहीं कौन व्यक्ति किस तरह का रंग लगा दे। इसलिए घर से निकलने से पहले चेहरे पर क्रीम, शरीर व बालों पर तेल लगाकर ही निकलते हैं ताकि खुद का बचाव किया जा सके। जागरूक लोग होली के त्योहार पर हर्बल रंगों का प्रयोग करते हैं क्योंकि हर्बल रंगों से शरीर को किसी तरह का नुकसान नहीं होता। यह रंग कुछ महंगे जरूर हैं लेकिन इनका कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है। हर्बल रंग प्राकृतिक सामग्री चंदन, गुड़हल से मिलाकर बनाया जाता है, जिसमें ज्यादातर मेहंदी, पालक, धनिया, हरी पत्तियों का मिश्रण होता है। इनको बनाने में मेहनत ज्यादा लगती है इसलिए लोग बनाने की जगह बाजारों से सस्ते रंग खरीदना ही बेहतर समझते हैं।

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