फ्रैक्चर में वरदान-आर्थोस्कोपी

दुर्घटना मे कोहनी और कन्धे का चोट को काफी खतरनाक माना जाता है।लुढकने और पटकाने के बाद बचने के लिए हमलोग कंधे और केहुना को सबसे पहले जमीन से लगाते हैं।जिसके कारण इन दोनो का चोटग्रसत और फ्रैक्चर होना स्वाभाविक है।

हाथ और पैर के फ्रैक्चर की तुलना में केहुनी या कंधा का फ्रैक्चर बिल्कुल भिन्न होता है। चूंकि कंधा और केहुना मे ज्वाइंट या जोड़ होता है।जिसके सहारे हम उसे दाहीने या बांए मोड़ते है।इसलिए इसके चोटग्रसत होने पर साधारण प्लास्टर लगाकर काम नही चलता है।

जोड़ पर यदि प्लास्टर लगा दिया जाए तो मरीज जीवन भर अपाहिज हो सकता है।जुड़ जाने बाद वो मुड़ेगे ही नहीं।चोटग्रसत जोड़ को आपरेशन द्धारा जोड कर ही दुरुस्त किया जाता है।इसे आरथोसकोपी कहते है।

आरथोसकोपी सर्जरी क्या है।आरथोसकोप दुरबीन लगा हुआ मशीन है।इस मशीन को सी आर्म भी कहते है।सी आर्म मे एक पतला धातु का ट्यूब होता है।जिसमे विडियो कैमरा और रोशनी लगा होता है। डाक्टर छोटा सा चिरा लगाकर इस टूयूब को कन्धे और केहुना के जोड़ तक ले जाते है।टीवी स्क्रीन पर छोटे से जोड़ का बड़ा चित्र आने लगता है।

विडियो मे डाक्टर टुटे फुटे कोशिकाओं और कारटीलेज को पहचानते है। फिर उसे रिपेयर कर दिया जाता है।कई बार हड्डी टुट कर जोड़ो के बीच फॅस जाता है।जिससे भयानक दर्द होता है।

कुछ मरीजो के जोड़ो मे सूजन या पानी आ जाता है।दवा से नही सूखता।चिकित्सक सभी सूजन को मशीन से बाहर कर देते है।जिससे मरीज का चलनाफिरना फिर समान्य आदमी जैसा हो जाता है।भटकना या मटकना बन्द हो जाता है।

मशीन से हड्डी के ऐसे आप्रेशन पुराने तरीके से बेहतर होता है।सी आर्म मे कम चीड़ा लगने कारण इनफैकशन कम होता है।कम एंटीबायोटिक की जरुरत होती है।मरीज आपरेशन के 12-24 घंटे मे घर जा सकता है। आपरेशन के बाद दर्द नहीं होता है।खून की कमी नहीं होती क्योंकि बड़ा चीरा नहीं लगता है।

सर्जरी के बाद मरीज 1-2 सप्ताह मे दैनिक काम करने लायक हो जाता है।सिर्फ भारी सामान उठाने और जोड़ो पर अधिक दबाब डालने से परहेज करना पड़ता है।

डा एस एन यादव
हड्डी और नस रोग विशेषज्ञ
रामप्यारी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल
बरियातु(रांची)

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